पढ़िए, कैसे गुजरात से अहमद पटेल का जीतना BJP अध्यक्ष अमित शाह के कूटनीतिक मंसूबों की हार है?

नई दिल्ली/अहमदाबाद। नेशनल जनमत  ब्यूरो 

जोड़तोड़, जुगाड़, सौदेबाजी, धमकी से भरे गुजरात के राज्यसभा चुनाव में मंगलवार को हुए तीन राज्यसभा सीटों के मतदान के नतीजो की देर रात चुनाव आयोग ने घोषणा कर दी। तीन राज्यसभा सीटों में से दो सीटें बीजेपी जीतने में कामयाब रही तो वहीं एक सीट कांग्रेस की झोली में गिरी।

कांग्रेस के पास तीसरी सीट पर बतौर उम्मीदवार अहमद पटेल को जीताने के लिए पर्याप्त 57 विधायक थे लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में तेजी से बदले घटनाक्रम के बाद उनका जीतना मुश्किल लग रहा था। लेकिन आखिरकार मंगलवार देर रात 44 वोट पाकर वो राज्यसभा पहुंचने में कामयाब रहे।

मतदान वाले  दिन चले नाटकीय घटनाक्रम में तेजी से बदलाव आते रहे। कांग्रेस के खिलाफ मतदान करने वाले दोनों कांग्रेस विधायकों के मत रद्द कर दिए गए। क्योंकि उन्होंने मतदान के बाद अपने बैलेट पेपर दिखा दिए थे। जिसके बाद कांग्रेस ने अपनी पार्टी के दो विधायकों का वोट सस्पेंड करने की मांग की।

जिसे देर रात चुनाव आयोग ने स्वीकार कर लिया। इस तरह कांग्रेस उम्मीदवार अहमद पटेल लगातार पांचवी बार राज्यसभा पहुंचने में कामयाब रहे। अहमद पटेल की जीत के बाद कांग्रेस के खेमे में खुशी की लहर है। वहीं बीजेपी की तरफ से अमित शाह और स्मृति ईरानी राज्यसभा में पहुंच चुके हैं।

अब इस जोड़ तोड़ के समीकरण में अमित शाह की कूटनीतिक विफलता और अहमद पटेल की जीत के मायने की पड़ताल की है रंगकर्मी, लेखक, राजनीतिक विश्लेषक मृत्युंजय प्रभाकर ने। पढ़िए-

अहमद पटेल के जीतने के मायने- 

गुजरात के हालिया राज्यसभा चुनाव में जिस तरह की चीज़ें देखने में आईं वो न सिर्फ अप्रत्याशित हैं बल्कि इन्हें भूतो न भविष्यति भी कहा जा सकता है. राज्यसभा चुनावों में क्रॉस वोटिंग कोई नई चीज़ नहीं है. यही कारण है कि कई छोटे-बड़े राज्यों से अमीर और मजबूत शख्सियत वाले नेता अक्सर क्रॉस वोटिंग के बल पर जीतकर संसद की शोभा (धज्जियाँ) बढ़ाते (उड़ाते) रहे हैं.

वैसे महारथी भी जीतते रहे हैं जिनकी पार्टी का अपना कोई वोट भी नहीं था. इस सन्दर्भ में विजय माल्या से बड़ा उदाहरण कोई और क्या हो सकता है. वहीँ पिछले ही साल ऐसे ही खरीद-फरोख्त के माहौल में बीजेपी के महेश पोद्दार झारखण्ड से राज्यसभा पहुँच गए थे. वहीँ हरियाणा से सुभाष चंद्रा का राज्यसभा पहुँच जाना भी थैली की ही जीत मानी जाएगी.

राज्यसभा की सीट वैसे भी ज्यादातर बड़ी-छोटी पार्टियों के लिए धन कमाने या अपने बड़े-बुजुर्ग नेताओं को सेट करने का औजार बनकर रह गई है. ऐसे में न सिर्फ निर्दलीय विधायक बल्कि पार्टी के विधायक भी राज्यसभा चुनाव को कमाई के एक मौके के तौर पर देखते हैं. यही कारण है कि राज्यसभा चुनावों में थैलीशाहों की हमेशा पौ बारह नज़र आती है.

लेकिन गुजरात विधानसभा में हुए राज्यसभा चुनाव के मद्देनज़र जिस तरह की चीज़ें सामने आईं वो अप्रत्याशित हैं बल्कि कई मामलों में लोकतंत्र और प्रजातंत्र के ऊपर एक बदनुमा दाग की तरह हैं. आम तौर पर राज्यसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए जोड़-तोड़ का खेल खेला जाता रहा है.

अमित शाह ने पूरी ताकत झोंक दी थी अहमद पटेल को हराने में-

यहां पहली बार यह देखने में आ रहा है कि बीजेपी की पूरी घेराबंदी अपने उमीदवार की जीत से ज्यादा कांग्रेस के उम्मीदवार अहमद पटेल को हराने के लिए थी. वह किसी भी सीमा तक जाकर कांग्रेस उम्मीदवार अहमद पटेल को राज्यसभा जाने से रोकना चाहती थी.

अब सवाल यह उठता है कि अहमद पटेल क्या राज्यसभा में बीजेपी के ऊपर इतने भारी पड़ने वाले हैं कि उन्हें चुनने से रोका जाना जरूरी था. अहमद पटेल का राज्यसभा का अब तक का कार्यकाल तो यही बताता है कि वो शायद ही कभी राज्यसभा में अपनी उपस्थिति ढंग से जता पाते हैं. फिर क्या कारण है कि बीजेपी के लिए अहमद पटेल का हारना नाक का सवाल बन गया है.

राजनीति पर नज़र रखने वाले सारे लोग जानते हैं कि अहमद पटेल कांग्रेस नेता सोनिया गाँधी के आँख-नाक-कान रहे हैं. कांग्रेस की पिछली दो केन्द्रीय सरकारों में उनकी भूमिका बेहद निर्णायक रही है. इस तरह से देखें तो उन्हें कांग्रेस में गाँधी परिवार के बाहर सबसे कद्दावर नेता माना जा सकता है. शायद यही कारण है कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह उनकी हार सुनिश्चित कर कांग्रेस मुखिया को निजी धक्का देना चाहते हैं.

लेकिन बात सिर्फ इतनी ही हो यह कहीं से भी संभव नहीं दिखता. इसके पीछे का कारण यह है कि हम सब जानते हैं कि सोनिया गाँधी राजनीति में अब बहुत दिनों कि मेहमान नहीं हैं. आज न कल कांग्रेस कि बागडोर राहुल गाँधी को मिलनी तय है. ऐसे में कांग्रेस और राहुल गाँधी के लिए अहमद पटेल बहुत काम के नहीं रह जाएंगे क्यूंकि राहुल के मार्गदर्शक पार्टी के भीतर दूसरे लोग हैं.

वहीं राजनीतिक जानकार इस बात से भी अपरिचित नहीं हैं कि अहमद पटेल के बारे में यह भी कहा जाता रहा है कि अंदरखाने में उनकी तब के गुजरात के मुख्यमंत्री और वर्तमान में भारत के माननीय प्रधानमंत्री के साथ अच्छी जुगत रही है. ऐसे में उनकी राज्यसभा चुनाव में हार सुनिश्चित करने के लिए बीजेपी का इस कदर जुट जाना और सारे दांव-पेंच अपनाना कहीं से भी समझ से परे है.

पैसे, सौदेबाजी का खेल- 

गुजरात की कांग्रेस पार्टी के विधानमंडल दल को जिस तरह पैसा, सौदेबाजी और सत्ता का डर दिखाकर तोड़ा-मरोड़ा गया है वैसा इतिहास में कभी देखने में नहीं आया. कांग्रेस विधायकों को यहाँ तक एक दूसरे राज्य में जाकर शरण लेनी पड़ी. आम तौर पर ऐसे दृश्य केवल राज्यों में बहुमत साबित करने के दौरान देखने में आते हैं.

तो क्या मान लिया जाए कि अहमद पटेल को राज्यसभा जाने से रोकना ही बीजेपी का सबसे बड़ा दांव था? और इसी के लिए उसने यह सब किया था? ऐसा सोचने वाले वही हो सकते हैं जिन्होंने गुजरात के हालात पर पिछले दिनों नज़र न बनाए रखी हो. बीजेपी की हालत गुजरात में दिन प्रति दिन बुरी होती नज़र आ रही है. और यह पिछले तीन साल से लगातार होता आ रहा है.

आनंदीबेन पटेल को डैमेज कण्ट्रोल के लिए मुख्यमंत्री की गद्दी से हटाना भी पड़ा है. ऐसे में राज्यसभा चुनाव के जरिए बीजेपी अपनी मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस और जनता दोनों पर एक तरीके का मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने कि कोशिश में है कि गुजरात की राजनीति में अभी भी उनका कोई तोड़ नहीं है. अहमद पटेल कि जीत के मायने इसलिए एक राज्यसभा सीट से बहुत ज्यादा है.

5 Comments

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