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कानूनविदों और पत्रकारों ने कहा, अमित शाह का केस देख रहे जज लोया की मौत, पूर्व नियोजित हत्या

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

सुप्रीम कोर्ट के चार जजों द्वारा सीजेआई दीपक मिश्रा पर गंभीर आरोप लगाने के बाद जस्टिस लोया की मौत का मुद्दा फिर से गर्मा गया है। हर तरफ न्यायपालिका की कार्यप्रणाली और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार पर सवाल उठने लगे हैं।

एक तरफ जस्टिस लोया के बेटे की प्रेस कांफ्रेंस कराकर सब कुछ ठीक होने का ढोल पीटा गया दूसरी तरफ दिल्ली में पत्रकारों और कानूनविदों ने सभा करके मौत पर आशंका जताई।

अमित शाह से जुड़े सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले में सुनवाई करने वाले सीबीआई जज बृजगोपाल लोया की ‘संदिग्ध’ परिस्थितियों में मौत पर कानूनविदों और पत्रकारों ने सोमवार 15 जनवरी को दिल्ली में सभा कर मामले की जांच मांग की।

जज लोया के दोस्त ने उठाए सवाल – 

ऑल इंडिया पीपुल्स फोरम (एआईपीएफ) के बैनर तले एक सभा में जज लोया के दोस्त और लातूर बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष उदय गवारे ने जज लोया की मौत को संदिग्ध बताया और कहा उन्हें यकीन है कि यह पूर्वनियोजित हत्या है.

कार्यक्रम में जज लोया की मौत पर पहली रिपोर्ट करने वाले द कारवां के पत्रकार निरंजन टाकले, पत्रिका के पॉलिटिकल एडिटर हरतोष सिंह बल, बॉम्बे हाईकोर्ट के पूर्व जस्टिस बीजी कोल्से पाटिल के साथ सुप्रीम कोर्ट की वकील इंदिरा जयसिंह भी शामिल हुए थे। इन सभी ने मामले को संवेदनशील और न्यायपालिका की प्रतिष्ठा का सवाल बताया।

जानकारी रहे कि सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले की सीबीआई की विशेष अदालत में सुनवाई कर रहे जज लोया की मौत 1 दिसंबर 2014 को नागपुर में हुई थी, जिसकी वजह दिल का दौरा पड़ना बताया गया था। वे नागपुर अपनी सहयोगी जज स्वप्ना जोशी की बेटी की शादी में गए हुए थे।

क्या है पूरा मामला- 

बीते नवंबर में द कारवां पत्रिका में जज लोया की बहन और पिता के हवाले से छपी एक रिपोर्ट में उनकी मौत से संबंधित संदिग्ध परिस्थितियों पर सवाल उठाया गया था. यह रिपोर्ट निरंजन टाकले की जज लोया की बहन और पिता से बातचीत पर आधारित थी।

निरंजन से बातचीत में जज लोया की बहन अनुराधा बियानी ने कहा था कि उनके भाई से सोहराबुद्दीन शेख एनकाउंटर मामले में मनचाहा फैसला देने के लिए उन्हें बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस मोहित शाह द्वारा 100 करोड़ रुपये का प्रस्ताव दिया गया था।

कार्यक्रम में आए टाकले ने कहा कि मैं एक स्टोरी के सिलसिले में पुणे गया था और जहां मैं रुका, वहां मुझे एक दोस्त ने कहा कि उनकी एक दोस्त मुझसे मिलना चाहती है. वो नूपुर बियानी थी जो जज लोया की भांजी हैं और उसने मुझे इस मामले के बारे में बताया.

मैंने सोचा कि यह जो बोल रही है यह तो सुनी हुई बातें है, इसलिए मैं उसकी मां से बात करना चाहता था, क्योंकि वे हर जगह मौजूद थी और लोया उनसे बात भी करते थे.’

टाकले ने बताया कि जब उन्होंने अनुज से बात करने की कोशिश की तो जज लोया के पिता ने कहा कि ये किसी से बात नहीं करता और इसे किसी पर भी भरोसा नहीं है. न मीडिया, अदालत न ही सरकार.

अनुज की प्रेस कांफ्रेंस पर सवाल- 

अनुज द्वारा किये गए प्रेस कॉन्फ्रेंस पर टाकले ने कहा, ‘अनुज को परिवार की तरफ से बोलने के लिए किसने कहा। पहले तो वो कुछ भी नहीं बोल रहा था और एक पत्र भी लिख चुका था।

उसके मीडिया में आकर बयान देने से ऐसा नहीं है मामला ख़त्म हो गया, बल्कि अब और सवाल खड़े हो गए हैं. पहले के सवाल भी है, लेकिन अब और ज्यादा प्रश्न है, जिसका उत्तर तब ही मिल सकता है, जब मामले की सही से जांच हो और सच सबके सामने आए.’

तीन साल पहले हुई लोया की मौत की जांच क्यों नहीं ?

लातूर बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष उदय गवारे ने जज लोया की मौत को संदिग्ध बताया और कहा उन्हें यकीन है कि यह पूर्वनियोजित हत्या है. गवारे ने लोया के साथ वकालत की पढ़ाई की थी, साथ ही कुछ समय साथ काम भी किया.

उन्होंने बताया, ‘जिस दिन लोया का निधन हुआ, उसी दिन कई न्यायाधीशों सहित कई लोगों ने मुझे कहा कि लोया को धोखा दिया गया है. यह मामला इतना संवेदनशील था कि कोई भी शिकायत दर्ज करने की हिम्मत नहीं करता. अब मुझे लगता है, हमें इतना डरना नहीं चाहिए था. लोया की मृत्यु एक पूर्वनियोजित हत्या थी.’

10 हजार पन्नों की चार्जशीट थी अमित शाह केस में- 

सोहराबुद्दीन फ़र्ज़ी एनकाउंटर मामले पर उदय ने कहा, ‘उस मामले में 10,000 हजार पन्नों चार्जशीट थी और लोया बिना पढ़े फैसला नहीं देना चाहते थे इसलिए उन्होंने अध्ययन कर आगे बढ़ने का फैसला किया, लेकिन उनके बाद जो जज गोसावी आए उन्होंने इतने पन्नों की चार्जशीट 15 दिनों के भीतर पढ़कर फैसला सुना दिया.’

उदय ने कहा, ‘बेहद सामान्य परिवार से आने के बाद वो इतने बड़े पद पर पहुंचे. उन्होंने मौत को गले लगाया, लेकिन ईमान नहीं बेचा. मुझे उन पर गर्व है.’

उदय का कहना है कि पूरा सिस्टम ख़राब है. जिला अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में गड़बड़ियां हैं. कोई इस पर बात नहीं करना चाहता है, लेकिन अब लोग बोल रहे हैं और बोलते रहना होगा.

उदय ने लोया के अंतिम संस्कार के समय के बारे में बताया कि जब उनका अंतिम संस्कार हो रहा था, तब बहुत सारे न्यायपालिका से जुड़े लोग आए थे. वहां सब कह रहे थे कि लोया के साथ धोखा हुआ है.

उदय के न्यायपालिका के बारे में कहा कि एक सीबीआई जज जो इतना बड़ा मामला देख रहा था और जब उसकी मौत हुई, तो अदालत को खुद जांच के आदेश देने चाहिए थे. जनता का आख़िरी में सबसे ज्यादा विश्वास अदालत पर है और अगर अदालत ठीक से काम नहीं करेगा, तो लोकतंत्र को लकवा मार जाएगा।

लोया की मौत राजग पर कलंक- 

द कारवां के पॉलिटिकल एडिटर हरतोष सिंह बल भी इस कार्यक्रम में शामिल थे. उन्होंने बताया कि जब एक जज की मौत पर प्रश्न खड़ा होने लगे और उसकी जांच न हो यह बिल्कुल भी स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए. खासकर तब जब वो व्यक्ति सोहराबुद्दीन एनकाउंटर जैसा मामला देख रहा हो, तो बिल्कुल भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता.

उन्होंने कहा, ‘सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले के ट्रायल पर पहुंचने से पहले आपको 2002 मुस्लिम विरोधी दंगों को देखना होगा और यह कड़ी वहीं से जुड़ी है. इसकी शुरुआत राज्य के गृहमंत्री हरेन पंडया की मौत से हुई क्योंकि वो व्यक्ति सब जानता था कि 2002 दंगों में प्रशासन की क्या भूमिका थी.

उनकी मौत पर आज भी सवाल हैं. इसके बाद सोहराबुद्दीन और तुलसीराम प्रजापति की मौत और फिर जज लोया की मौत, जो और भी महत्वपूर्ण है. इन सब के मौत पर सवाल कायम है. अदालत अगर इन मामलों में न्याय नहीं दे सकती तो लोकतंत्र के मूल्यों पर सवाल खड़ा हो जाएगा.’

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