पाठक के ‘जातिवाद’ और एक BJP नेता के ‘भ्रष्टाचार’ के गठजोड़ से बनी सरकारी वकीलों की लिस्ट पर रोक

नई दिल्ली/लखनऊ। नेशनल जनमत ब्यूरो 

उत्तर प्रदेश में सरकारी वकीलों की नियुक्ति में कानून मंत्री बृजेश पाठक की ब्राह्मण जाति के वकीलों का वर्चस्व और प्रदेश स्तरीय संगठन की बागडोर संभाल रहे एक बीजेपी नेता के भ्रष्टाचार की खबरों को ‘नेशनल जनमत’ ने प्रमुखता से उठाया था। अब सामाजिक संगठनों और सोशल वेबसाइट्स की ताकत का ही असर है कि सरकार को इस जातिवाद और भ्रष्टाचार के गठजोड़ से तैयार की गई सराकारी वकीलों की नियुक्तियों पर रोक लगानी पड़ी है।

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परम जातिवादी लिस्ट जारी करने वाले कानून मंत्री ब्रजेश पाठक का कहना है कि “सरकारी वकीलों की सूची में अनियमितताओं की जानकारी हमारे पास आई है। यह बहुत चिंता का विषय है। इस मामले की जांच कराई जा रही है।”

311 सरकारी वकीलों में 282 सवर्णों की नियुक्ति हुई थी- 

दरअसल इसी 7 जुलाई को 311 सरकारी वकीलों की नियुक्ति की गई। जिनमें से 282 सरकारी वकील सवर्ण हैं और उसमें भी 151 ब्राम्हण है , और 65 क्षत्रिय। इस लिस्ट में स्थायी अधिवक्ता (उच्च न्यायालय), मुख्य स्थाई अधिवक्ता, अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता और ब्रीफ होल्डर (क्रिमिनल) और ब्रीफ होल्डर सिविल के पद हैं। इसमें  311 में से अकेले 216 पद ठाकुर- ब्राह्मणों को दे दिए गए। यानि 70 फीसदी ब्राह्मण-ठाकुरों को सरकारी वकाली बनाया गया।

देखिए जातिवाद का खेल-  

4 मुख्य स्थाई अधिवक्ता-  ब्राह्मण- 3

25 अपर मुख्य स्थाई अधिवक्ता-  ब्राह्मण -12, ठाकुर- 7

103 स्थाई अधिवक्ता –   ब्राह्मण- 60, ठाकुर- 17

65 ब्रीफ होल्डर  सिविल-  ब्राह्मण-34,  ठाकुर- 8

114 ब्रीफ होल्डर क्रिमिनल-  ब्राह्मण-42,  ठाकुर-33

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 प्रदेश स्तर के एक बड़े संगठन नेता के भ्रष्टाचार में लिप्ट होने की खबर- 

बीजेपी प्रदेश कार्यालय के एक बड़े प्रभावशाली प्रदेश स्तर का संगठन संभाल रहे नेता का नाम इस पूरे भ्रष्टाचार में सामने आया है। नाम ना छापने की शर्त पर सरकारी वकील के दावेदार एक अधिवक्ता ने बताया कि उक्त नेता के एक आदमी ने मुझसे कहा था 10 लाख रूपये दो काम सेटल करवा दूंगा। इसके बाद मैं उन नेताजी से मिला भी लेकिन मैंने देखा वहां तो बड़े स्तर पर लेनदेन चल रहा है और इतने पैसे की व्यवस्था ना कर पाने के कारण मैं दबे पांव वापस आ गया।

ये कहानी सिर्फ एक वकील की नहीं है बल्कि पूरे प्रदेश में वकीलो और पत्रकारों के बीच सरकार आने के बाद कद्दावर हो चुके प्रदेश के बाहर से आए इस नेता की लेनदेन की खबरें आम हो चुकी हैं। लोगों का तो यहां तक कहना है कि अधिकारियों की ट्रांसफर-पोस्टिंग में भी जमकर जातिवाद और भ्रष्टाचार चल रहा है। सपा के समय में मलाई मार रहे अधिकारी यहां नतमस्तक होकर पैसा पहुंचा दें समझो उनकी मलाईदार पोस्टिंग फिर से पक्की।

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कानून मंत्री के जातिवाद का खुला खेल- 

311 वकीलों की लिस्ट में 151 यानि अकेले तकरीबन पचास प्रतिशत ब्राह्मण जाति के वकीलों की नियुक्ति पर कानून मंत्री और बसपा से बीजेपी में आए नेता ब्रजेशपाठक पर भी जातिवाद के आरोप लगे हैं। खुद की स्वीकृति से जार हुई लिस्ट पर हंगामा मचने के बाद कानून मंत्री का कहना है कि “सरकारी वकीलों की सूची में अनियमितताओं की जानकारी हमारे पास आई है। यह बहुत चिंता का विषय है। इस मामले की जांच कराई जा रही है।”

कई अधिवक्ताओं के नाम एओआर में दर्ज नहीं-

खबर ये भी आ रही थी कि योगी सरकार ने जिन वकीलों को सरकारी वकील का ओहदा दिया है, उनमें से कई का हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में एडवोकेट ऑन रोल (एओआर) में नाम ही दर्ज नहीं है। इसलिए राज्य सरकार की ओर से नियुक्त 311 नए सरकारी वकीलों में दर्जनों वकीलो को शासकीय अधिवक्ता अधिष्ठान ने ज्वाइन करवाने से मना कर दिया है।

हाईकोर्ट में किसी भी वकील के वकालत करने का प्रथम सबूत होता है कि उसका नाम एओआर सूची में दर्ज हो। इन नवनियुक्त सरकारी वकीलों में गिरीश तिवारी, प्रवीण कुमार शुक्ला, शशि भूषण मिश्र, दिवाकर सिंह, वीरेंद्र तिवारी एवं दिलीप पाठक शामिल हैं जिनको सरकारी वकील तो बना दिया है लेकिन इनका नाम एओआर में था ही नहीं।

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नींद से जागी सरकार- 

भ्रष्टाचार और जातिवाद का गठजोड़ सामने आने के बाद सरकार को सरकारी वकीलों की नियुक्तियों पर रोक लगानीी पड़ी है। स्टैंडिंग कौंसिल से लेकर ब्रीफ होल्डर तक वकीलों की जारी सूची पर रोक लगा दी गई है। सूची में शामिल उन सभी तीन दर्जन स्टैंडिंग कौंसिल के दैनिक पारिश्रमिक पर रोक लगा दी है, साथ ही उनकी ज्वाइनिंग भी रोक दी गई है, जिनका हाईकोर्ट में वकालत करने के लिए रजिस्ट्रेशन ही नहीं है और वहां के स्टैंडिंग कौंसिल बना दिए गए।

शासकीय अधिवक्ता की नियुक्ति का फैसला फिलहाल टाला- 

वकीलों के गुस्से को देखते हुए पार्टी ने फिलहाल शासकीय अधिवक्ता नियुक्ति किए जाने का फैसला टाल दिया है। सपा – बसपा सरकार में सरकारी वकील रहे लोग  भी सैटिंग करके स्टैंडिग कौंसिल में अपना नाम रिपीट करवा लिए थे। वरिष्ठता में जूनियर वकीलों को अपर महाधिवक्ता और चीफ स्टैंडिंग कौंसिल नियुक्त कर दिया गया था तो सीनियर वकीलों को स्टैडिंग कौंसिल और ब्रीफ होल्डर के पद दे दिए गए थे।

2 Comments

  • धीरज भाई पटेल , 16 July, 2017 @ 12:20 pm

    मैं संघ कार्यालय में यदाकदा जाकर बैठा रहता हूं और वहां पर आने-जाने वालों की गतिविधियों पर नजर डालता हूं मुझे बहुत ही अटपटा और अजीब सा लगता है कि यह देश और इस देश की बागडोर एक कट्टरवादी संगठन जिसको हिंदू संगठन हिंदू संगठन के नाम से जानते हैं वहां पर सवर्णों का बोलबाला रहता है….. मुझे कोई भी बहुतायत में एससी-एसटी या पिछड़ा वर्ग के लोग नहीं दिखते हैं….

    इलाहाबाद में गर्मियों की छुट्टियों में अधिकांशतया संघ कार्यालय में ही जा कर के बैठ जाता था वहां पर मैंने जो देखा वर्तमान में हो रही खबरों को सच साबित करता है इलाहाबाद हाईकोर्ट के वकील जो सवर्ण जाति के थे संघ कार्यालय में सुबह से लेकर देर रात तक दुम हिलाते रहते थे …

    स्वान प्रवृत्ति का यह समूह आपके सामने भले ही दुम हिलाता हुआ नजर आए लेकिन मौका मिलते ही काटेगा जरूर……
    धीरज भाई पटेल

  • Pramod , 16 July, 2017 @ 1:56 pm

    Desh me samanat kabhi eeshe nahi aaeegi
    Ab open categories ko 15% reservation de dena chahiye
    Ya obc ko 60%

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