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समझिए पूरा मामला, जिसकी वजह से चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा ने लोकतंत्र को ताक पर रख दिया !

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

लोकतान्त्रिक देश में जनता की अदालत ही सबसे बड़ी अदालत होती है, शायद इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम न्यायधीशों नें मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ अपनी कुछ गंभीर शिकायतों को लेकर हाल ही में प्रेस कांफ्रेस किया है।

इस प्रेस कान्फ्रेंस से एक बात तो साफ हो गयी है कि भले ही सर्वोच्च न्यायालय देश का सबसे बड़ा न्यायालय हो, लेकिन जनता की अदालत ही सबसे बड़ी अदालत है। उक्त न्यायधीशों की प्रेस कान्फ्रेंस के बाद देशभर में इस बात पर बहस छिड़ी है कि चारों न्यायधीशों को ऐसा करना चाहिए था या फिर नहीं।

बहस का एक बिन्दु यह भी है कि इससे न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर कितना प्रभाव पड़ा है। सब लोग अपनी-अपनी सुविधानुसार किसी ना किसी पक्ष की गलती ढूंढ रहे हैं।

लेकिन इस बहस के बीच से यह मुद्दा गायब है कि इस विवाद की शुरुआत क्यों और कैसे हुई? बिना विवाद के केंद्र बिन्दु की पड़ताल किए हुए, यह कहना मुश्किल है कि किस हद तक गलती किसकी है?

न्यायधीशों की प्रेस कान्फ्रेंस से एक बात साफ तौर पर निकलकर आई है कि सीनियर न्यायधीश, चीफ जस्टिस द्वारा महत्वपूर्ण मुकदमों की सुनवाई में बेंच बनाने में अपनी अनदेखी से नाराज हैं।

इस तथ्य का यह मतलब कतई ना निकाला जाए ये न्यायधीश खुद कुछ खास मुकदमों की सुनवाई करना चाहते है, बल्कि कुछ खास न्यायधीशों को अतिमहत्वपूर्ण मुद्दों से जुड़े मुकदमों को लेकर नाराजगी है।

अगर हम इन न्यायधीशों पर सवाल ना उठा के यह सवाल पूछें कि क्यों मुख्य न्यायधीश कुछ खास मुद्दों की सुनवाई कुछ खास जजों से ही करवा रहे हैं, और उनके ऐसा करने से समस्या क्या है? तो हमें यह पूरा विवाद काफी अच्छे से समझ में आ जाएगा।

दरअसल इस पूरे विवाद की शुरुआत एक मुकदमे की सुनवाई में पैसे के लेन देन के अारोपों से जुड़ी है, जिसमें सितंबर महीने में सीबीआई नें उड़ीसा हाईकोर्ट के एक रिटायर्ड जज आईएम कुदैशी समेत कुछ लोगों को दो करोड़ रुपये के साथ गिरफ्तार किया है।

1. 2015 में प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट ने केंद्र सरकार के पास एक नया मेडिकल कॉलेज खोलने की अर्ज़ी दी। सरकार ने मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया को अर्जी थमा दी। काउंसिल ने मना कर दिया।

2. मई 2016 में सुप्रीम कोर्ट की ओवरसाइट कमेटी ने काउंसिल से अपने फ़ैसले पर पुनर्विचार के लिए कहा। केंद्र सरकार ने इस आधार पर मंजूरी दे दी।

3. इस साल मई में काउंसिल ने कॉलेज का जायज़ा लिया और देखा कि कॉलेज सुनसान है और अस्पताल में ताले बंद हैं। काउंसिल ने केंद्र सरकार को रिपोर्ट दी। सरकार ने कॉलेज की मान्यता रद्द कर दी।

4. केंद्र सरकार ने काउंसिल से कहा कि वो कॉलेज की तरफ़ से जमा बैंक गारंटी को इनकैश कर सकता है।

5. ट्रस्ट ने सुप्रीम कोर्ट में फिर से अपील की। दीपक मिश्रा, अमिताभ रॉय और एएम ख़ानविलकर की खंडपीठ ने केंद्र को फिर से विचार करने को कहा। पीठ ने कहा कि ट्रस्ट के साथ अन्याय हुआ है।

6. प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के एक ट्रस्टी बी पी यादव ने ओडीशा हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज आईएम क़ुद्दुसी से संपर्क साधा। क़ुद्दुसी को सेट किया। क़ुद्दुसी के कहने पर सुप्रीम कोर्ट से मामला वापस लिया और इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील की।

7. 25 अगस्त को हाईकोर्ट ने बैंक गारंटी भुनाने पर रोक लगा दी और आदेश सुनाया कि मेडिकल कॉलेज में दाख़िले होंगे।

8. चार दिन बाद मेडिकल काउंसिल सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

9. 18 सितंबर को मामला सेटल करने के लिए ट्रस्ट फिर से सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। फैसला फिर से ट्रस्ट के पक्ष में गया। फिर से दीपक मिश्रा इसकी अगुवाई कर रहे थे।

10. अगले दिन CBI ने इस मामले में FIR दर्ज की। पांच लोग गिरफ़्तार हुए।

सीबीआई की वजह से तो जज दवाब में नहीं- 

सीबीआई की गिरफ्तारी में यह बात सामने आई कि जो पैसा इकट्ठा हुआ है, वह कुछ जजों को दिया जाने वाला था, परंतु किन जजों को दिया जाने वाला था, इसका खुलासा नहीं हुआ। सीबीआई इस मामले की जांच कर रही है।

सीबीआई द्वारा जांच में हो रही देरी की वजह से इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक अन्य जनहित याचिका दायर हुई, जिसमें यह मांग की गयी कि कोर्ट इस मामले को सीबीआई से लेकर किसी स्वतंत्र जांच आयोग को दे दे।

क्योंकि सीबीआई सरकार के इशारे पर काम करती है, और सरकार या फिर सरकार से जुड़े प्रभावशाली लोग सीबीआई की जांच का हवाला देकर अपने से जुड़े कुछ मामलों में कुछ जजों को प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए प्रशांत भूषण जैसे वकीलों नें सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर करके यह मांग की कि उक्त मामला सीबीआई से लेकर एक उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच आयोग बना दिया जाए।

सीनियर को दरकिनार कर कनिष्ठों की बेंच बना दी- 

खैर याचिका सुनवाई के लिए कोर्ट के दूसरे वरिष्ठतम जज, जस्टिस जे चेलमेश्वर की बेंच में आई। सुनवाई के दौरान जब इस तथ्य का जिक्र हुआ कि इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस की बेंच कर रही थी, तो मामले की गंभीरता को देखते हुए, जस्टिस चेलमेश्वर ने सुप्रीम कोर्ट के पांच वरिष्ठ जजों की एक पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी और मामला दुबारा चीफ जस्टिस के पास भेज दिया।

इस मामले की आगे की सुनवाई के लिए चीफ जस्टिस नें पांच जजों की एक नयी बेंच तो बनाई, लेकिन उसमें जस्टिस जे चेलमेश्वर समेत उक्त किसी भी सीनियर जज शामिल नहीं किया, जबकि सुप्रीम कोर्ट की परंपरा रही है कि जब भी कोई संवैधानिक पीठ बनाई जाती है, तो उसमें जजों को वरिष्ठतानुसार शामिल किया जाता है।

यदि मामला किसी जज ने रेफर किया होता है, तो भी उसको बड़ी बेंच में शामिल किया जाता रहा है। जस्टिस जे चेलमेश्वर वरिष्ठता में भी दूसरे नंबर पर हैं, और उक्त मामले को बड़ी बेंच के पास भेजने का आदेश भी इन्होने ही दिया था, ऐसे में सीजेआई का इनको नयी बेंच में शामिल ना करना संदेहास्पद बन गया।

प्रशांत भूषण क्यों चिल्लाए थे सीजेआई पर- 

सुनवाई के दौरान प्रशांत भूषण ने चीफ जस्टिस से इस बात की डिमांड की थी कि वो अपने को इस मामले से अलग कर लें, क्योंकि घूस के जिस मामले की सुनवाई हो रही है, उस मुकदमे का निपटारा उन्हीं की पीठ ने किया था।

सीजेआई ने यह कहते हुए ये मांग ठुकरा दी कि सीबीआई की एफआईआर में उनका नाम नहीं है, और इसके साथ ही यह आदेश पारित किया कि किस मामले की सुनवाई कौन-कौन जज करेगा, इसका निर्धारण करने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ सीजेआई को है।

सीबीआई जज लोया की मौता का संदिग्ध प्रकरण- 

इसी बीच सीबीआई जज लोया की संदिग्ध मृत्यु का हाई प्रोफाइल मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया और मुख्य न्यायधीश ने इस मामले को भी एक जूनियर जज को भेज दिया। इस पूरे घटनाक्रम नें आग में घी का काम किया और चार वरिष्ठतम जजों नें मिलकर मुख्य न्यायधीश के खिलाफ प्रेस कान्फ्रेंस कर दी।

इस प्रेस कान्फ्रेंस के बाद सरकार कह रही है कि यह न्यायपालिका का आंतरिक मामला है, इसलिए वह बीच में नहीं पड़ेगी। लेकिन इस तथ्य पर गौर करने की बात है, कि पूरे विवाद की जड़ में सीबीआई की करप्शन मामले में जांच है।

इसलिए सरकार को यह जवाब देना चाहिए कि सीबीआई जांच की आड़ में उसने सरकार या सरकार से संबन्धित किसी प्रभावशाली व्यक्ति के मुकदमे किसी तरह का कोई दबाव तो नहीं बनाया है और एक सवाल जिसका जवाब मुख्य न्यायधीश को भी देना चाहिए कि महत्वपूर्ण मुकदमों की सुनवाई में उन्होने वरिष्ठ जजों की अनदेखी क्यों की ?

चूंकि अनदेखी हुई है, इसलिए चीफ जस्टिस होने के नाते जस्टिस दीपक मिश्रा को कम से कम देश को यह विश्वास तो दिलाना ही चाहिए कि उन्होने जो बेच बनाई हैं, वो किसी दबाव में नहीं अपने विवेक से बनाई हैं।

( लेखक अरविन्द कुमार, सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज़ जेएनयू में शोधार्थी हैं )

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