पंजाब-हरियाणा के करिश्माई बाबाओं के डेरो में आखिर दलित-वंचित समाज जाता ही क्यों है ?

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

लोग डेरों में क्यों जाते हैं? किसी श्रद्धालु के डेरे जाने के आध्यात्मिक मूल्य को कमतर आंके बिना यह कहना गलत नहीं होगा कि इसके पीछे कुछ बेहद दुनियावी कारण हैं, जो कम अहमियत नहीं रखते.

मिथकीय मूल्यों और बाबाओं की निजी करिश्माई अपील के अलावा पंजाब के डेरे अपने अनुयायियों में एक किस्म की सुरक्षा की भावना भी जगाते हैं.

डेरे में जाने का सबसे बड़ा कारण बेटे की लालसा- 

डेरों में जाने का सबसे बड़ा कारण यह बताया जाता है कि यहां जाने से किसी इंसान की मन्नत पूरी होती है. ‘अगर आप में पूरा विश्वास है’ तो आपकी मनोकामना ज़रूर पूरी होगी. बेटे का जन्म इन मनोकामनाओं में सबसे महत्वपूर्ण है.

कृषि आधारित पंजाब में गहरे तक धंसे पितृसत्तात्मक मूल्य के कारण आज भी वहां न सिर्फ जन्मपूर्व लिंग परीक्षण क्लीनिक खूब फल-फूल रहे हैं, बल्कि इसने बाबाओं और डेरों को भी जिलाए रखने में मदद की है.

समान रूप से एक अहम कारण यह भी है कि डेरे के गुरु अपने अनुयायियों से एक आचरण संहिता का पालन करने की मांग करते हैं. इनमें से सबसे आकर्षक है, शराब और दूसरे मादक पदार्थों का सेवन छोड़ने के लिए कहना. लगभग सभी मामलों में घर की औरतें डेरा जाने की जिद करती हैं.

और इस बात को आध्यात्मिक रूप से इतना पवित्र माना जाता है कि वे अपने पति और घर के दूसरे पुरुष सदस्यों को भी अपने साथ ले जाने में कामयाब रहती हैं.

लेकिन एक बार जब वे पर्याप्त ढंग से प्रभावित कर लिए जाते हैं, तो उन पर गुरु से ‘नाम’ लेने के लिए जोर डाला जाता है. नाम लेने का मतलब है कि श्रद्धालु को शपथ लेनी होती है कि उसे एक अनुशासित जीवन बिताना पड़ेगा, जिसमें शराब न पीना और कुछ मामलों में अपनी जातिगत पहचान छोड़ना भी शामिल है.

हालांकि इस बात को निर्णायक ढंग से साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है कि ऐसे बाबाओं की बढ़ती लोकप्रियता ने ग्रामीण पंजाब की शराब और ड्रग्स की संस्कृति में कोई परिवर्तन लाने का काम किया है.

अनपढ़ समाज में सुरक्षा की भावना जगाते हैं- 

मिथकीय मूल्यों और बाबाओं की निजी करिश्माई अपील के अलावा ये डेरे अपने अनुयायियों में एक किस्म की सुरक्षा की भावना जगाने का काम भी करते हैं. साथ ही इसमें एक किस्म का व्यक्तिगत रिश्ता (पर्सनल टच) भी रहता है, जो मुख्यधारा के गुरुद्वारों और मंदिरों में पूरी तरह से नदारद है, जहां कोई व्यक्ति अपनी हैसियत भीड़ के हिस्से जितनी ही पाता है.

डेरों पर अध्ययन करने वाले जगरूप सिंह के मुताबिक, ‘ये डेरे अपने अनुयायियों में एक किस्म की सुरक्षा और अपनापन का भाव भरते हैं. एक बार डेरे के भीतर दाखिल होने पर लोगों में समुदाय का हिस्सा होने की भावना आती है. उनको किसी न किसी तरह यह लगता है कि डेरा एक सुरक्षित जगह है और इस पर हर किसी का हक है. उन्हें यहां कोई परेशान करने नहीं आएगा. जब हम चारों तरफ की असुरक्षाओं के संदर्भ में इस बात को देखते हैं, तो यह एक महत्वपूर्ण कारक नज़र आता है.’

ये डेरे अपने चरित्र में ग़ैर-सांप्रदायिक हैं. भले इन्होंने लगभग एक पंथ का दर्जा हासिल कर लिया है, फिर भी ये अपने अनुयायियों पर किसी ख़ास पंथ पर चलने के लिए जोर नहीं डालते.

डेरे से मिलनेवाली पहचान, परंपरागत रूप से एक अतिरिक्त पहचान है, जिससे अपनी पहचान छोड़े बिना जुड़ा जा सकता है. कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या मुसलमान बने रहकर भी डेरे के बाबा या पीर का आशीर्वाद हासिल कर सकता है. एक साधारण श्रद्धालु अपने-अपने धर्मों के पूजास्थलों पर भी जाता है और एक या एक से अधिक डेरों में भी जा सकता है. उसके एक से ज़्यादा गुरु भी हो सकते हैं.

जमीन, पैसा और ताकत डेरो की पहचान- 

बाबाओं और डेरों की आध्यात्मिक आत्मछवि और पहचान के बावजूद ये ज़्यादा दुनियावी चिंताओं से मुक्त नहीं हैं जैसे ज़मीन, पैसा और ताकत. इनमें से कुछ डेरों के पास काफी ज़मीन है.

गुरदासपुर के धियानपुर गांव के जिस डेरे में मैं गया, उसके पास 600 एकड़ ज़मीन थी. सारे स्थानीय काश्तकार डेरा के किराएदार थे. उसी जिले के एक दूसरे डेरे के पास कथित तौर पर 4,000 एकड़ ज़मीन थी.

वहां के एक निवासी ने बताया, ‘यह डेरा एक छोटे साम्राज्य की तरह है. यहां से आपकी नज़र जहां तक जाती है, वह सारी ज़मीन डेरे की है. सबसे पहले हमें कुछ मुगल शासकों ने ज़मीन दी, उसके बाद रणजीत सिंह से हमें ज़मीन मिली.’

राधास्वामी और सच्चा सौदा जैसे डेरों के पास और ज़्यादा ज़मीन होगी. डेरे की ज़मीन पर हदबंदी कानून लागू नहीं होता है. राधास्वामी डेरे के पास तो अपना एक भूमि अधिग्रहण अधिकारी ही है. और अगर देशभर में उनके विस्तार को देखा जाए तो इसकी संपत्ति कितनी बड़ी होगी, इसका केवल अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

अचल संपत्ति के अलावा इन डेरों को दर्शनार्थियों के चढ़ावे और दान से भी नियमित कमाई होती है. गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी के इतिहासकार सुखदेव सिंह सोहाल कहते हैं, ‘एक बार किसी डेरे का नाम हो जाए तो पैसा खुदबखुद आने लगता है. हालांकि इनके अनुयायियों में ज़्यादा संख्या गरीबों की है मगर ज़्यादातर डेरे अमीर हैं.’

यहां तक कि कम मशहूर डेरों को भी काफी दान मिल सकता है. गुरुनानक देव यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान की छात्रा देविंदर कौर, जो एक सूफी पीर बाबा शेख फट्टा के एक ऐसे ही डेरे पर अपना लघु शोध-प्रबंध लिख रही थीं, ने अनुमान लगाया था कि इस डेरे की रोज की कमाई 1 लाख रुपए है.

इस डेरे का प्रबंधन स्थानीय उद्यमियों के एक समूह के द्वारा किया जा रहा है, जो वक्फ बोर्ड को ठेका राशि के तौर पर 80 लाख रुपए सालाना चुकाता है. डेरे का प्रबंधन करने के ठेके की हर साल नीलामी होती है और सबसे ज़्यादा बोली लगाने वाले को इसका ठेका दे दिया जाता है.

राजनीतिक हस्तक्षेप डेरे को मजबूत बनाते हैं- 

इनके आर्थिक संसाधनों और लोगों पर असर को देखते हुए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि इन डेरों ने राज्य में राजनीतिक प्रक्रिया को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है. गुरदासपुर जिले में डेरों पर काम कर रहे एक और जानकार भूपिंदर सिंह ठाकुर ने बताया, ‘हालांकि इनमें से ज़्यादातर डेरे खुलकर किसी राजनीतिक पार्टी का समर्थन नहीं करते, लेकिन निश्चित तौर पर वे अपनी पसंद से अनुयायियों को अवगत करा देते हैं.’

राज्य के बड़े राजनीतिक खिलाड़ियों के लिए नियमित अंतरालों पर डेरों में जाकर उनके बाबाओं का ‘आशीर्वाद’ लेना एक तरह से अनिवार्य हो गया है. ज़ाहिर है कि इससे बाबाओं के अंदर एक किस्म की सत्ता और रसूख की भावना आती है.

इन बाबाओं के बढ़ते हुए प्रभाव से मुख्यधारा का सिख नेतृत्व काफी चिंतित है, जो अपनी पहचान शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति (एसजीपीसी) से जोड़ता है. 19वीं सदी के अंत में सिख सभा आंदोलन का उभार और 1920 के दशक में गुरुद्वारा सुधार आंदोलन, सिखों और समकालीन पंजाब के धार्मिक इतिहास के महत्वपूर्ण मील के पत्थर माने जाते हैं.

एसजीपीसी के गठन के साथ न सिर्फ इस क्षेत्र के ऐतिहासिक गुरुद्वारे एक ही संस्था के नियंत्रण में आ गए, बल्कि इसने सिखों के लिए संहिता/कोड का भी निर्माण किया.

सिखो ने डेरो के कारण खुद को संगठित करना शुरू कर दिया है- 

इससे पहले पंजाब के किसान और आम लोग एक मिलावटी और अलग-अलग आस्थाओं पर चला करते थे, जिसको कम आंका जाता था. पर इस नए बदलाव के बाद एक नई पहचान उभर कर आई, जहां सिखों ने खुद को एक ऐसे धार्मिक समुदाय के तौर पर देखना शुरू किया, जिसके पास गर्व करने को अपना विशिष्ट इतिहास, प्रतीक, स्थान और परंपराएं थे. इसके बाद तरह-तरह की गतिविधियों के माध्यम से यह अभिजात्य तबका एक ‘आस्थावानों के रोजमर्रा के जीवन’ की नई परिभाषा गढ़ने में कामयाब रहा.

वर्तमान समय के लोकप्रिय श्रद्धा या धर्म परायणता की व्याख्या किस तरह से की जा सकती है? क्या इसे एक ऐसी सच्चाई के तौर पर देखा जा सकता है, जो हमेशा से मौजूद थी?

या हमें वर्तमान समय में बाबाओं और डेरों की लोकप्रियता को उत्तर आधुनिक समय में लोकप्रिय धार्मिकता के पुनरुत्थान के इशारे के तौर पर देखना चाहिए कि सामुदायिक जीवन के तेजी से बिखरने के कारण डेरों के प्रति आकर्षण बढ़ा है और ये फैशन में आ गए हैं?

क्या हम डेरों को एक खुली और जातिमुक्त जगहों के तौर पर देख सकते हैं, जहां दलित और वंचित किसान जाति हिंसा और कृषि संकट की शत्रुतापूर्ण वास्तविकताओं के परे खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं और थोड़ी राहत की सांस लेते हैं?

किसी ज़माने में वंचितों के असंतोष और महत्वाकांक्षाओं को आवाज देनेवाले सेकुलर संस्थान और सामाजिक आंदोलन आज पंजाब की ज़मीन पर नहीं दिखाई देते. पंजाब में शायद ही कहीं आपको कोई नागरिक संगठन या कोई एनजीओ मिले. यह मुमकिन है कि इन प्रक्रियाओं में से कुछ या इनमें से तमाम स्थितियों का मौजूदा हालात को जन्म देने में योगदान रहा हो.

(सुरिंदर एस. जोधका जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर हैं. यह लेख 2008 में सेमिनार में प्रकाशित एक आलेख का संपादित अंश है इसे द वायर हिन्दी डॉट कॉम से लिया गया है.)

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