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“पूर्व IAS पीएस कृष्णन को याद करके साबित करना है कि पिछड़ों के लिए जाति नहीं कर्म प्रधान है”

नई दिल्ली, नीरज भाई पटेल।

ब्राह्मण समाज में जन्म लेने के कारण मंडल मसीहाओं में से एक पीएस कृष्णन के साथ भी सामंतवादियों ने वही सलूक किया जो पिछड़ों को आरक्षण देने की वजह से पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह व पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह के साथ हुआ था…

जिंदगी भर वंचितों के हक की लड़ाई लड़ने वाले 1956 बैच के IAS अधिकारी रहे पीएस कृष्णन का बीते 10 नवम्बर 2019 को निधन भी उन दोनों नेताओं की तरह गुमनामी के साथ हुआ…

वंचित तबके के लोगों की ये जिम्मेदारी है कि हर साल 10 नवंबर को उनके कार्यों को याद करके जातिवादियों को उनके महान कामों की याद दिलाते रहेंगे और ये भी साबित करके कि हम अपने नायक जाति के आधार पर नहीं कर्मों के आधार पर तय करते हैं…..

गलती से पीएस कृष्णन ब्राह्मण समाज में जन्मे थे तो जातिवादी मानसिकता के लोगों के लिए वो समाजद्रोही टाइम के हो गए थे दूसरी तरफ उन्होंने पिछड़े समाज के उत्थान के लिए काम करके गलती कर दी थी क्योंकि ये ऐसा समाज है जो नौकरी पाने पर मंडल आयोग के मसीहाओं को याद करने के बजाए बजरंग बली को प्रसाद चढ़ाने पहुंचता है….

पीएस कृष्णन से अपनी जिंदगी के करीब 65 साल एससी, एसटी, ओबीसी वर्ग के हितों की लड़ाई में लगाए। 1990 में वीपी सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में समाज कल्याण मंत्रालय में सचिव रहते हुए मण्डल कमीशन रिपोर्ट लागू कराकर ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिलान में IAS कृष्णन ने न सिर्फ अहम भूमिका निभाई, बल्कि जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में गया तो पिछड़ों को आरक्षण दिए जाने के पक्ष में ऐसे अकाट्य तथ्य पेश किए कि सुप्रीम कोर्ट को भी मण्डल रिपोर्ट लागू करने के पक्ष में फैसला देना पड़ा।

आरक्षण के बार में वो कहा करते थे –

“आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है , यह शासन प्रशासन में हुई ऐतिहासिक भूलों को सुधारने का जरिया है “

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के पहले सदस्य सचिव थे और लगातार दो बार रहे। मंडल आयोग की रूप रेखा कृष्णन के समाज कल्याण मंत्रालय में सचिव रहते हुए ही तैयार की गई थी। जिलाधिकारी से लेकर भारत सरकार में सचिव रहने के दौरान उन्होंने 1978 में अनुसूचित जातियों (एससीपी) के लिए विशेष घटक योजना और राज्यों की एससीपी और केंद्रीय सहायता के लिए विशेष केंद्रीय सहायता जैसी पहल की कल्पना की।

1990 में संविधान (65 वां) संशोधन अधिनियम, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए राष्ट्रीय संवैधानिक दर्जा, दलित बौद्ध, SC और ST को एससी का दर्जा प्रदान करने वाले कानून को लागू करने के पीछे उनका का ही दिमाग और हाथ था।

जब तक जीवित रहते विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में वंचित वर्ग के समर्थन में लेख लिखकर आवाज बुलंद करते रहे।।

वंचित तबके के प्रति उनकी सोच को नेशनल जनमत का सैल्यूट…

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