सिसकता हुआ गोरक्षनाथ पीठ कहता है कि मेरी दुआएं भी नहीं बचा सकीं मासूमों को….

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

अस्पताल के बिस्तर पर पड़े मासूम जनाज़े पूछते हैं, बताओ मेरी धड़कती हुई सांसों को किसने रोका है, किसने कसा है मेरी सांसों पर फंदा, के हम अभी मरना नहीं चाहते हैं.अरे अरे देखो मम्मी, नहीं आ रही है मेरे सीने में सांस, पापा तुम कहां ले जा रहे हो मुझे हाथों पर लादे, कि मैं अभी और जीना चाहता हूं.

रोती हुई मांए पुकार रही हैं अपनों लालों को, के अब कहां से लाएंगे अब्दुल, जुनैद… कहां से लाएंगे शिवानी, अरूषी, कोई लौटा दे लवकुश, ज्योति को, कहां चली गई मेरी खु्शबू, चीखती आह चीरती चली गई दिलों की दीवारें…मिटा दो स्कूल की बेंचों से ये नाम, के मासूम चले गए आखिरी सफ़र पर, बस सरकार के एक करार में, हस्ता हुआ गुलशन गोरखपुर, आज श्मशान हो गया है।

रोती हुई हवा कहती है, फरिश्ते मरे नहीं हैं, उन्हें मारा गया है, हर गली से निकलते मासूम जनाज़े एलान करते हैं, मौला कुबूल कर मेरी कुर्बानी, के हम कुर्बान हुए हैं, हुकुमत की लाचारी पर, अफसरों की कारगुज़ारी पर सुना है सरकार ने कंपनी की आक्सीजन की कीमत नहीं चुकाई थी, तो बच्चों की सांसें कुर्बान कर दी गईं.

अपनी उखड़ती हुई सांसों के बीच पूछ रहा है मासूम, सुनों मेरे सूबे के हाकिम, जवाब दो मेरे सवाल का, बताओ कौन होगा मेरी मौत का ज़िम्मेदार के मैं अब आखिरी… सांस ले रहा हूं… हम तो ज़िन्दगी मांगने आए थे अस्पताल, लेकिन अफसोस हमारे माथों पर मौत लिख दी गई…

एक लम्हा कह के चला गया के नहीं रहे दुनिया में मासूम लेकिन माएं कहती हैं, कितनी मुश्लिक के पाला था मैंने मेरे लाल को, पूछो मेरी आंखों से मेरी नींद की कुर्बानी, पूछो गीले बिस्तर से मेरी रात की कहानी…झुलस गई इनकी परवरिश में मेरी जवानी…

सिसकता हुआ गोरखनाथ मंदिर कहता है, मेरी दुआएं भी नहीं बचा सकीं मासूमों को, ये सुनकर दर्द और बढ़ जाता है, के जनाज़ों का ये कारवां सूबे के हाकिम योगी जी के घर का है, सीएम साहब महज़ कुछ दिन पहले इसी अस्पताल का हाल जानकर गए थे, लेकिन अफसोस…

खामोश गोरखपुर गूंज रहा है, माओं की चीख से…कपकपाते होठों से कहता है बीआरडी मेडिकल कालेज, माफ करना मुझे मेरे बच्चों, कि हम तुम्हें सांसे नहीं दे पाए…

उठो… के… अब देर हो गई है बच्चों…..बुलाता है तुम्हें तिरंगा…पुकारता है राष्ट्रगान के अब उठ जाओ, तुम्हें देना है आज़ादी को सलामी…गाना है जनगणमन…के अब कौन लगाएगा भारत ज़िन्दाबाद के नारे, रोते हैं आसमान के सितारें…कहां चले गए तुम बच्चों प्यारे….

गोरखपुर हादसे पर शायर, लेखक और पत्रकार मुज़म्मिल अय्यूब के मार्मिक शब्द

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Share
Share