‘अर्जक संघ’ और ‘महामना रामस्वरूप वर्मा’ का चिंतन: रामजी यादव के नजरिए से

लखनऊ, रामजी यादव

भारत का सबसे बड़ा सामाजिक समूह होने के नाते पिछड़ों के बीच तमाम मुद्दों पर रस्साकशी स्वाभाविक है और वह लगातार होती रहती है। सदियों से होती आई है। कहा जा सकता है कि पिछड़े समाजों के बीच क्रांति और प्रतिक्रांति का सिलसिला कभी कम नहीं हुआ। बेशक क्रांतिकारी हिस्से के मुक़ाबले प्रतिक्रांतिकारी हिस्से की ताकत अधिक रही है और उसने क्रांतिकारी हिस्से को अपने स्तर पर अप्रासंगिक बना दिया।

पिछड़ों में अनेक क्रांतिकारी व्यक्ति हुए और उन्होंने अपने समय में अनेक स्तरों पर महान भूमिकाएँ निभाई हैं लेकिन उनके विचार अपने ही सामाजिक समूहों के प्रतिक्रांतिकारी हिस्से की चोट खाकर इतिहास में गुम हो गए। विडम्बना यह है कि जिन लोगों के व्यक्तित्व और कृतित्व से समाज में उजाला होना चाहिए स्वयं वे ही गुमनामी के अंधेरे में डूब गए।

सच यह है कि पिछड़ों का प्रतिक्रांतिकारी हिस्सा अंततः ब्राह्मणवाद में जाकर विलीन हो जाता है और तन-मन-धन से इसकी सेवा करता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि पिछड़ों के बीच पैदा हुए महापुरुषों, उनके विचारों और उनके कृतित्व पर ब्राह्मणवाद जितनी बेरहमी से हमला करता है उससे कहीं ज्यादा घातक रूप में पिछड़े ही उन पर हमला करके उन्हें तबाह करते हैं। बक़ौल राजेंद्र यादव, उन्हें गुलामी में जितना आनंद आता है उससे कहीं अधिक आज़ादी से खतरा महसूस होता है।

पिछड़े और शूद्रवाद-

पिछले कुछ वर्षों से पिछड़ों के एक हिस्से के बीच शूद्रवाद का बोलबाला है और वे चाहते हैं कि हिन्दू समाज के अधिकतम लोग शूद्र हो जाएँ तो वे ब्राह्मण पर बढ़त हासिल कर लेंगे। मुंबई में रहने वाले शूद्र आंदोलन के महत्वपूर्ण सिपाही देवेंद्र यादव कहते हैं कि ‘अगर लोग बड़ी संख्या में निस्संकोच शूद्र होने के लिए तैयार हो जाएंगे तो सैकड़ों जातियों के बीच का उनका बिखराव खत्म हो जाएगा और वे अपने जीवन को बदलने तथा अपने अधिकारों को पाने के लिए अधिक ज़ोरदार तरीके से एकजुट होंगे।’

गौरतलब है कि भारतीय शूद्र संघ के बैनर तले संयोजित शूद्र संगठन में अनेक जातियों के लोग हैं और वे आपस में खान-पान और आंदोलन का संबंध बनाए हुए हैं। देवेंद्र पूर्वाञ्चल के अनेक जिलों में शूद्र संगठन की अवधारणा और महत्ता बताने के लिए काडर कैंप लगा चुके हैं और भारी संख्या में लोगों के रक्षासूत्र काटकर उनसे ब्राह्मणवादी कर्मकांड न करने की कसम ले चुके हैं।

जौनपुर में मड़ियाहूँ के ब्लॉक प्रमुख लाल प्रताप यादव ने और आगे बढ़कर काम किया। उन्होंंने अपने इलाके के गांवों में स्त्री-पुरुषों के बीच हिन्दू धार्मिक व्यवस्था पर चर्चा की और लोगों से अपने घरों में रखी गई देवी-देवताओं की तस्वीरें मँगवाकर फाड़ा और आग के हवाले किया। इसके लिए उन्होंने गालियां खाईंं और मुकदमे झेले लेकिन उन्हें देश के अनेक हिस्सों में लोग जानने लगे।

पिछले दिनों लाल प्रताप ने इस आंदोलन को एक ऊंचाई देने के प्रयास में आजमगढ़ के पूर्व सांसद रमाकांत यादव के घर में जाकर उनका कलावा कटवाया और उन्हें अपने नाम के पहले शूद्र लिखने पर सहमत कर लिया। यह खबर बहुत तेजी से फैली और अनेक जगहों पर हिंसक विचार-विमर्श और मान-मनौवल का दौर चला।

दरअसल, यादवों का एक बड़ा समूह शूद्रवाद की इस सैद्धांतिकी से इत्तफाक नहीं रखता। मसलन, जौनपुर के युवा कवि कमलेश यादव कहते हैं कि ‘यह कौन सी नई बात हुई बल्कि यह तो ब्राह्मणवाद को और मजबूती देने की ही बात है। उन्होंने मेहनतकश वर्ग को शूद्र कहकर अपमानित किया और उनको हर तरह के अधिकारों से वंचित किया फिर आप भी अपने आप को शूद्र कह रहे हैं। इसका मतलब आप भटक गए हैं और बदलाव के नाम पर वर्ण व्यवस्था को सही मान रहे हैं। आज जबकि जातिवाद और वर्ण व्यवस्था को सिरे से नकारने की जरूरत है तब आप शूद्र शूद्र किए हैं।’

दूसरे लोग और भी हिंसक हुए और उनका मानना है कि यादवों के खिलाफ ब्राह्मणों ने हजारों अपमानजनक टिप्पणियाँ की हैं और उन्हें गर्त में धकेलने का कुत्सित काम किया है। आज जब यह समाज एक सम्मानजनक हैसियत प्राप्त कर रहा है तो शूद्रवाद के पोषक उसे फिर उसी गर्त में ले जाना चाहते हैं। अत्यंत विनम्र अध्येता सुमंत यादव शूद्रवाद को एक प्रतिगामी विचार मानते हैं। उनका कहना यह है कि ‘केवल कुछ यादव लोग उत्साह में शूद्रता ग्रहण कर रहे हैं जबकि उनके मुक़ाबले अन्य पिछड़ी जातियों के लोग भी नाम के पहले शूद्र लिखने में दिलचस्पी नहीं रखते।

इससे होगा क्या कि जो अनुराग कश्यप अपनी फिल्म में ठाकुर के डर के मारे अहीर को पैंट में पेशाब करा देता है वह हो सकता है अगली फिल्म में उन्हें नंगा दौड़ा दे। इसलिए जो स्टेटस वर्षों के संघर्ष के बाद हासिल हुआ है और जिसके बल पर हम ब्राह्मणों-ठाकुरों को घुटने के बल ला सकते हैं उसे यह शूद्रवाद नैतिक रूप से कमजोर कर रहा है।’

अपने को क्षत्रिय के रूप में प्रतिष्ठित मानने वाले यादवों ने भारतीय शूद्र संघ के लोगों को चुन-चुन कर गालियाँ दी हैंं और व्हाट्सएप समूहों में उन्हें अपमानित किया। यहाँ तक कि उनका घेराव करके उन पर एक विकल्प चुनने का दबाव बनाया। अगर अपने नाम के आगे शूद्र लिखोगे तो पीछे यादव नहीं लिखोगे। अभी जनता नहीं समझ पा रही है कि वास्तव में किसके साथ चलना है अलबत्ता आरएसएस दोनों हाथों में लुभावना पाहुर लेकर लगातार उसे ललचा रहा है।

इन तमाम बातों के बीच मुझे अर्जक संघ के संस्थापक महामना रामस्वरूप वर्मा की याद आई कि पिछड़े वर्ग के लोग उनके महान विचारों और अवधारणाओं  को अपनाकर क्यों नहीं समाज को बदलने के लिए आंदोलन करते हैं। वर्मा जी ने वृहत्तर भारतीय समाजों में मानववादी संवेदना और चेतना के सूत्र देखे और उन्हें इकट्ठा करने के लिए अर्जक जैसा सम्मानजनक नाम और अर्जक संघ जैसा क्रांतिधर्मी मंच दिया, लेकिन पिछड़ी जातियाँ उसे अपनाने से कतरा रही हैं।

मैं अक्सर देखता हूँ कि विभिन्न मौकों पर लोग रामस्वरूप वर्मा की तस्वीर पर माला-फूल चढ़ाते हैं और उन पर ज्ञान बघारते हैं लेकिन उनके निहितार्थों और वास्तविक संघर्षों को समझने में अधिक दिलचस्पी नहीं लेते। संयोग से 22 अगस्त को उनकी सत्तानबेवीं जयंती थी। मुझे लगता है कि शूद्रवाद बनाम क्षत्रियवाद के अंधकूप में गिरने से बचाने के लिए उत्तर प्रदेश में इतने महान विचारक और अध्येता बहुत अधिक नहीं हैं। उन्होंने ब्राह्मणवाद के मूल पर प्रहार करने का साहस किया और अगर जनता ने उनका साथ दिया होता तो इस देश में सामाजिक चेतना और सामाजिक न्याय की तस्वीर कुछ दूसरी होती।

उन्होंने मेहनतकश समाजों के लिए एक नाम दिया अर्जक। बहुत से लोग अर्जक का अभिप्राय उस समूह से लगाते हैं जो अपने परिश्रम से आजीविका कमाता है लेकिन वर्मा जी अर्जक का अर्थ मानववादी लिखते हैं और इस अवधारणा के पीछे उनका भारतीय समाज, राजनीति, संस्कृति और अर्थव्यवस्था का अत्यंत विशद अध्ययन और चिंतन है। वे लिखते हैं– ‘पुनर्जन्म और भाग्यवाद पर टिकी विषमतामूलक ब्राह्मणवादी संस्कृति का विनाश अब अवश्यंभावी हो गया है। इसका सबसे बड़ा कारण पदार्थ और उसकी स्वाभाविक गतिशीलता से निर्मित सृष्टि सिद्धान्त पर आधारित समतामूलक अर्जक (मानववादी) संस्कृति का उदय होना है। वैसे क्रांतिदर्शी विद्वानों ने इसकी झलक अपने काल में कुछ वर्ष पूर्व देखी थी जिनमें विवेकानंद जी का नाम लिया जा सकता है, जिन्होंने यह मत व्यक्त किया था कि उच्चवर्णीय लोगों को निम्नवर्णीय लोगों पर अत्याचार बंद करके उनसे बराबरी का व्यवहार करना चाहिए और अस्पृश्यता जैसे गंदे विचारों को समाप्त करना चाहिए अन्यथा बराबरी आकर रहेगी और उच्चवर्णीय लोगों को उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।

रामस्वरूप वर्मा समग्र, भाग 1, संपादक : भगवान स्वरूप कटियार, सम्यक, 2014

रामस्वरूप वर्मा के बारे में प्रायः समग्रता में बात नहीं की जाती और यह बात तो हमेशा छूट जाती है कि वे केवल राजनीति में ही नहीं बल्कि संस्कृति, समाज और अर्थव्यवस्था में घुन की तरह लगे ब्राह्मणवाद के खिलाफ वे आजन्म एक योद्धा की भाँति लगे रहे और अपने विचारों को कभी हतप्रभ नहीं होने दिया। कभी भी अवसरवादी नहीं बने बेशक वे और उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की तरह कम सुनाई पड़ रही हो।

असल में उनका जीवन एक विरल और बेमिसाल दृढ़ता का प्रतीक है। वे एक सीमांत किसान के परिवार में जन्मे (22 अगस्त 1923, कानपुर देहात ) और पारिवारिक विवरणों से पता लगता है कि उनके सभी बड़े भाई अधिक पढ़-लिख नहीं पाये और जल्दी ही खेती-किसानी में लग गए लेकिन उन्होंने अपने छोटे भाई को आगे पढ़ने के लिए प्रेरित किया और हरसंभव सहयोग किया।

मेधावी वर्मा जी ने बड़ी लगन से अपनी शिक्षा पूरी की लेकिन उनका ध्येय पढ़-लिखकर पैसा कमाना और समृद्ध होना बिलकुल नहीं था बल्कि अपने मूक और गरीब वर्ग की आवाज बनना था। इसलिए उन्होंने राजनीति का रास्ता चुना और पहली (1952 ) ही बार में फर्स्ट रनर साबित हुये।

एक अंजान और साधनहीन युवा को राजनीतिक पटल पर अपना निकटतम प्रतिद्वंद्वी पाकर उस समय के विजयी उम्मीदवार रामस्वरूप गुप्ता को भविष्य में खतरा महसूस हुआ और उन्होंने वर्मा जी को अनेक मीठी सलाहें और प्रलोभन दिये। वर्मा जी हिन्दी साहित्य में एमए कर चुके थे। गुप्ता जी ने अध्यापकी दिलाने का आश्वासन दिया लेकिन वर्मा जी ने राजनीति का इरादा नहीं छोड़ा। अगले चुनाव में अंततः उन्होंने विजय हासिल की।

वे निरे विधायक नहीं थे और न ही उन्होंने कभी विधायकी का दरबार लगाया। वे जनप्रतिनिधि को कतई विशिष्ट नहीं मानते थे। इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि उन्होंने विधायकों का वेतन और सुविधाएं बढ़ाए जाने का सदैव विरोध किया। स्वयं कभी बढ़ा हुआ वेतन और कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं ली।

जब वे संविद सरकार में वित्तमंत्री थे तो अपने दफ्तर से अंग्रेजी टाइपराइटर हटवा दिया और सारा शासकीय काम-धाम हिन्दी में करवाने लगे। वो पहले वित्त मंत्री थे जिन्होंने 1967 में फायदे का बजट पेश किया था। वे मानते थे कि जनता को जो भाषा समझने में कठिनाई हो उसमें शासकीय काम नहीं होना चाहिए।

वर्मा जी डॉ. राम मनोहर लोहिया के अभिन्न साथियों में थे। दोनों की पटरी इसलिए भी बैठती थी कि दोनों के पास अपने मौलिक विचार थे। दोनों राजनीतिज्ञ ही नहीं सिद्धहस्त लेखक भी थे। लेकिन यह साफ-साफ समझ लेना चाहिए कि वर्मा जी डॉ. लोहिया की तरह लिजलिजे हिन्दू नहीं थे कि क्रांति और समाजवाद के बीच रामायण मेलों के आयोजन की कल्पना करते।

वे रामचरित मानस जैसे प्रतिगामी काव्य को देश के सांस्कृतिक परिवेश के लिए घातक मानते थे। इस संदर्भ में 6 अगस्त 1970 को उन्होंने भारत के तत्कालीन महामहिम राष्ट्रपति श्री वी वी गिरि को एक लंबा पत्र लिखा जिसमें तुलसीदास के घोर सांप्रदायिक और मनुवादी चरित्र और जातिवादी तथा ब्राह्मणवादी दृष्टि की बेबाक आलोचना की है।

महानुभाव, मैंने 18 जून, 1970 को आपके पास एक पत्र भेजा और देश के करोड़ों अर्जकों के मन पर चोट करने वाले तुलसीदास कृत रामचरित मानस चतुश्शताब्दी समारोह को संरक्षण न देने की आपसे विनम्र प्रार्थना की थी। मैंने आपसे उस पत्र में यह भी आग्रह किया था कि उक्त समारोह की अध्यक्षता करने से अपने प्रधानमंत्री को भी रोकें और एक भी पैसा सरकारी धन का उक्त रामचरित मानस के चतुश्शताब्दी समारोह में न लगने दें। इसका कारण रामचरित मानस का संविधान विरोधी होना बताया था। तुलसीदास कृत रामचरित मानस के दिये गए पुष्ट प्रमाणों के आधार पर ही मैंने उक्त निवेदन किया था किन्तु खेद है कि आपने अब तक उक्त पत्र का उत्तर नहीं दिया। पत्र प्राप्ति की स्वीकृति अवश्य आई किन्तु उससे तो कोई तात्पर्य निकलता नहीं है। अतः यह दूसरा पत्र लिखना पड़ रहा है। रामचरित मानस का चतुश्शताब्दी समारोह केवल ब्राह्मणवाद का प्रचार है और ब्राह्मणवाद का स्वरूप पूर्णतया सांप्रदायिकता को उभारने वाला रामचरित मानस में दिया गया है। इतना तो पिछले पत्र से ही स्पष्ट है पंडित तुलसीदास न तो राष्ट्रीय कवि थे और न उनकी पुस्तक रामचरित मानस राष्ट्रीयता का ग्रंथ। इसके विपरीत रामचरित मानस ‘भारत का संविधान’ विरोधी ग्रंथ अवश्य है। ऐसी स्थिति में आपका या आपके प्रधानमंत्री या अन्य किसी मंत्री का इस समारोह में भाग लेना ‘भारत का संविधान’ का उल्लंघन होगा। ‘भारत का संविधान’ के प्रति निष्ठावान रहने की कसम आपने और मंत्रियों ने खाई है। अतः आपके लिए किसी प्रकार भी ऐसे ग्रंथ की प्रतिष्ठा में किए गए आयोजन में सम्मिलित होना अनुचित होगा जो राष्ट्रीयता और ‘भारत का संविधान के विपरीत विचार का प्रचार होगा। आपने उस पत्र को पढ़ा अवश्य होगा। शायद आपके मन में परंपरा से व्याप्त विचारों के कारण निर्णय लेने में कुछ हिचक हो। इसलिए मैं रामचरित मानस के संबंध में और अधिक जानकारी करा देना उचित समझता हूँ ताकि आपको तुरंत निर्णय लेने में सुविधा रहे।

यह पत्र दस पृष्ठों का है। इसमें रामचरित मानस के हर उस दोहे-चौपाई को उद्धृत किया गया है जो तुलसीदास ने भारत की श्रमजीवी जातियों और समाजों को लज्जित किया है। ऐसे ही पत्र उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री को दो बार लिखे।

आज के दौर में जब भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय से जुड़े चेहरे घुटनों के बल झुके जा रहे हैं और देश के अमीर पिछड़ों के घरों में रामचरित मानस का पाठ का चलन बढ़ता जा रहा है वैसे में आज से ठीक पचास साल पहले एक मुहिम के रूप में रामचरित मानस को संविधान विरोधी करार देना कितने बड़े कलेजे की बात है।

इसे समझने के लिए थोड़ी मेहनत की जरूरत पड़ेगी। आज जब पिछड़े भगवा और त्रिशूल की राजनीति में धँसे जा रहे हैं तब रामस्वरूप वर्मा की कितनी आवश्यकता है इसे सहज ही समझा जा सकता है। यह सवाल तो स्वाभाविक रूप से उठता है कि वर्तमान समय की तमाम संविधान विरोधी गतिविधियों के विरुद्ध राष्ट्रीय और क्षेत्रीय किस पार्टी ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर अपना विरोध जताया?

रामस्वरूप वर्मा अपने दौर के असाधारण और तेजस्वी सामाजिक चिंतक थे जिन्होंने बेहद आत्मीयता और अभिन्नता के बावजूद जो डॉ. राममनोहर लोहिया से न केवल भिड़े बल्कि उनको वैचारिक रूप से बौना भी साबित कर दिया। वे अपनी ब्राह्मणवाद विरोधी वैचारिकता से जौ भर भी पीछे नहीं हटे। एक जगह वे ‘अर्जक दिमागी गुलामी से छुटकारा पाएँ’ शीर्षक लेख में लिखते हैं:

हर साल स्वतन्त्रता दिवस मनाया जाता है और उसमें कुछ निश्चय किए जाते हैं। राजनीतिक नेतागण स्वतन्त्रता को प्राणपण से कायम रखने की बात कहते हैं और खुशियाँ मनाते हैं। फिर भी यह सत्य है कि भारत के करोड़ों अर्जक और शायद देश का विशाल बहुमत इस स्वतन्त्रता दिवस में सही मानी में स्वतन्त्रता का अनुभव नहीं करता। राजनीतिक नेतागण इसे आर्थिक अभाव की संज्ञा देकर यह सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि जब सब लोगों की आर्थिक बराबरी आएगी तब सारा देश सच्ची स्वतन्त्रता का अनुभव करेगा। आज भुखमरी और बेकारी के कारण देश में इतनी दरिद्रता व्याप्त है कि स्वतन्त्रता का अहसास करना असंभव हो जाता है। क्या आज कोई इन राजनीतिक नेताओं से पूछता है कि आखिर बेरोजगारी और भुखमरी क्यों?

इस प्रश्न का उत्तर खोजते हुये वर्मा जी अनेक नए प्रश्नों से टकराते हैं। वे वर्ण व्यवस्था, जाति-व्यवस्था और ब्राह्मणवाद के घटाटोप को भेदते हैं और उसके सर्वग्रासी प्रभावों की पड़ताल करते हैं। जनता के बीच पसरी वैचारिक जड़ता के उत्स को तलाशते हुये वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि बिना हिन्दुत्व से मुक्ति के भारत में वास्तविक स्वतन्त्रता आना असंभव है।

जिस जमाने में उत्तर प्रदेश में ललई सिंह, पेरियार को उत्तर प्रदेश के घर-घर तक पहुँचने की कोशिश कर रहे थे उस दौर में इस संघर्ष के दूसरे मोर्चे पर रामस्वरूप वर्मा पूरी सक्रियता से डटे हुए थे। ललई सिंह की ही तरह वर्मा जी सामंती तौर-तरीकों के सख्त खिलाफ थे। वर्मा जी ने अर्जक आंदोलन को देश के बड़े हिस्से में पहुंचाने का प्रयास किया लेकिन वे झोलाटांग अर्जकों के सख्त खिलाफ भी थे।

उन्होंने शोषित समाज दल की स्थापना की और एक नयी राजनीतिक इबारत गढ़ने की कोशिश की। वे एक पत्रकार और संपादक थे। वर्षों ‘अर्जक’ नामक अखबार निकालते रहे। नयी पीढ़ी को उनके उपलब्ध साहित्य का गहन अध्ययन करना चाहिए ताकि वह जान सके कि उसके एक पुरोधा पूर्वज ने किस प्रकार अपने देश की मानवता के भविष्य को आज़ाद बनाने का सपना देखा। वर्मा जी के साक्षात्कारों में उनकी वैचारिक दृढ़ता का पता चलता है। उनकी किताबें आज बहुजन वैचारिकी की सबसे ताकतवर रचनात्मक उपलब्धियों में हैं।

आज नई पीढ़ी उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में अधिक नहीं जानती लेकिन जब भी वह अपनी आज़ादी की वैचारिकी बनाने का प्रयास करेगी तब उसके लिए वर्मा जी का व्यक्तित्व और कृतित्व प्रकाश स्तम्भ साबित होगा। वर्मा जी एक किसान के घर से निकले थे और उनके भीतर चातुर्वर्ण, जाति व्यवस्था, शूद्र और क्षत्रिय जैसी बरगलाने वाली अवधारणाओं से पूरी तरह नफरत करते थे। वे सच्चे मानववादी थे और यह सब उनकी रक्त-मज्जा में था। लोकप्रियता और अवसरवाद को उन्होंने कभी अपना माध्यम नहीं बनाया। गालिब कहते हैं:

कोहकन नक्काश यक तिमसाल शीरीं था असद
संग से सर मारकर पैदा न होए आशना

अर्थात फरहाद एक चित्रकार था और शीरीं का चित्र बनाता था इसलिए दीवाना हो गया और जब कुटनी ने उससे झूठमूठ कहा कि वह किसी और की हो गई तो पत्थर से सिर मारकर मर गया। कहने का मतलब यह कि असली लड़ाई के लिए असली मुद्दा होना चाहिए। कोई पत्थर से टकराकर बलिदानी नहीं हो सकता!

(लेखक रामजी यादव, गांव के लोग पत्रिका के संपादक, सामाजिक चिंतक व विचारक हैं )

9 Comments

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