भगवाराज: 1 किलो टमाटर खरीदने के लिए 5 किलो उड़द की दाल बेचने को मजबूर है देश का किसान

नई दिल्ली/ भोपाल, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

किसानों की सरकार होने का दंभ भरने वाली बीजेपी सरकार के राज में देश का अन्नदाता कराह रहा है। बीजेपी शासित राज्यों में पनपे किसान आंदोलन के बाद भी किसानों के हालात सुधरने के बजाए किसान आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे हैं।

अपनी ही फसल का उचित मूल्य मांगने पर मध्य प्रदेश में किसानों को लाठी से लेकर गोली तक खानी पड़ी थी। इसके बाद किसानों के हिंसक आंदोलन के गवाह बन चुके मध्य प्रदेश में एक बार फिर ये मुद्दा गरमाने की आहट है.

हालत यह है कि दमोह ज़िले के किसान सीताराम पटेल (40) ने हाल ही में कीटनाशक पीकर इसलिए जान देने की कोशिश की, क्योंकि मंडी में उड़द की उनकी फसल को औने-पौने दाम पर ख़रीदने का प्रयास किया जा रहा था.

कारोबारियों ने पटेल की उड़द के भाव केवल 1,200 रुपये प्रति क्विंटल लगाए थे, जबकि सरकार ने इस दलहन का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 5,400 रुपये प्रति क्विंटल तय किया है.

दलहनी फसलों के दाम औंधे मुंह गिरे- 

पटेल सूबे के उन हज़ारों निराश किसानों में शामिल हैं, जिन्होंने इस उम्मीद में दलहनी फसलें बोई थी कि इनकी पैदावार से वे चांदी काटेंगे. लेकिन तीन प्रमुख दलहनों की कीमतें औंधे मुंह गिरने के कारण किसानों का गणित बुरी तरह बिगड़ गया है और खेती उनके लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है.

मध्य प्रदेश की मंडियों में उड़द के साथ तुअर और मूंग दाल समर्थन मूल्य से नीचे बिक रही हैं. फसलों के लाभकारी मूल्य की मांग को लेकर जून में किसानों का हिंसक आंदोलन झेल चुके सूबे में कृषि क्षेत्र के संकट का मुद्दा फिर गरमाता नजर आ रहा है.

1 किलो टमाटर के लिए 5 किलो उड़द- 

किसान संगठन आम किसान यूनियन के संस्थापक सदस्य केदार सिरोही ने रविवार को कहा, ‘प्रदेश की थोक मंडियों में इन दिनों उड़द औसतन 15 रुपये प्रति किलोग्राम बिक रही है, जबकि खुदरा बाज़ार में टमाटर का दाम बढ़कर 70 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच गया है. यानी किसानों को एक किलो टमाटर ख़रीदने के लिए पांच किलो उड़द बेचनी पड़ रही है.’

उन्होंने कहा, ‘मनुष्यों के लिए प्रोटीन का बड़ा स्रोत मानी जाने वाली दाल का कच्चा माल उड़द भी 1,500 रुपये प्रति क्विंटल के उसी भाव पर बिक रहा है, जिस दाम पर खलीयुक्त पशु आहार बेचा जा रहा है. यह स्थिति कृषि क्षेत्र के लिए त्रासदी की तरह है.’

सिरोही ने कहा कि दलहनों के भाव में भारी गिरावट के चलते सूबे के तुअर अरहर और मूंग उत्पादक किसानों की भी हालत खराब है.

उन्होंने कहा, ‘एक तरफ केंद्र सरकार ने विदेशों से सस्ती दलहनों का बड़े पैमाने पर आयात कर लिया है, तो दूसरी ओर घरेलू बाजार में दलहनों के दाम गिरने के बाद प्रदेश सरकार किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य दिलाने के नाम पर बड़ी-बड़ी बातें कर रही है.’

भावंतर योजना पर भी उठे सवाल- 

शिवराज सरकार ने किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य दिलाने के वादे के साथ ‘भावांतर भुगतान योजना’ पेश की है. इस योजना में तीन दलहनों समेत आठ फसलों को शामिल किया गया है.

लेकिन किसान नेता सिरोही ने आरोप लगाया कि भावांतर भुगतान योजना सूबे में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर कृषकों के बड़े वोट बैंक को साधने की नीयत से पेश की गई है.

उन्होंने दावा किया कि बगैर ठोस तैयारी के शुरू की गई योजना अपनी जटिलताओं और विसंगतियों के कारण खासकर दलहन उत्पादक किसानों को ज्यादा फायदा नहीं पहुंचा पा रही है.

इस बीच, कारोबारियों पर भी आरोप लग रहे हैं कि भावांतर भुगतान याेजना शुरू हाेने के बाद उन्हाेंने अपने फायदे के लिए दलहनाें के दाम गिरा दिए हैं.

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