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क्या मित्र अंबानी के करोड़ों लाभ के लिए PM मोदी ने जानबूझकर फ्रांस से की विमानों की मंहगी डील?

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

सोशल मीडिया के माध्यम से ही सही हम भारतीय अपनी आंखें (यदि वे खुली हैं तो) के सामने प्रत्यक्ष रूप से एक घोटाला होते बहुत समय से देख रहे हैं। जी हां हम बात कर रहे हैं फ्रांस और भारत के बीच हुए लड़ाकू विमान राफेल सौदे के बारे में।

इस घोटाले के बारे में जानना इसलिए जरूरी है क्योंकि इसमें ना केवल हमारी कड़ी मेहनत का पैसा शामिल हैं बल्कि इसके साथ हमारे रक्षा बलों का मनोबल और भारत की सुरक्षा का गंभीर मसला भी शामिल हैं।

लेकिन दो हफ़्ते पुरानी कंपनी को हज़ारों करोड़ रुपये का डिफेंस डील मिल जाए ये सिर्फ और सिर्फ उसी दौर में हो सकता है जब देश हिंदू-मुस्लिम में डूबा हुआ हो, वरना जनता को मूर्ख बनाने का कोई चांस ही नहीं था.

यह घोटाला हमें बताता है कि माननीय प्रधानमंत्री वास्तव में किसके लिए काम कर रहे हैं। उन करोड़ों भारतीयों के लिए जिन्होंने उन्हें चुनाव में वोट दिया, या उन पूंजीपतियो के लिए जिन्होंने उनके चुनावी अभियान के लिए “नोट” दिया ?

दरअसल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी समेत तमाम विपक्ष राफेल विमान सौदे को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार पर जमकर निशाना साध रहा है और उसका दावा है कि प्रधानमंत्री मोदी ‘चौकीदार नहीं, बल्कि भागीदार हैं.’

समझिए क्या है राफेल घोटाला- 

हमें पहले घोटाले को समझना होगा। सौदे में 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद शामिल है जिसे हमारे प्रधानमंत्री ने फ्रांस सरकार से किये सौदे में खरीदा है।

सरकार के समय राफेल लड़ाकू विमान के लिए जो सौदा किया गया था उसके मुताबिक प्रत्येक विमान की कीमत 526 करोड़ रुपये थी। लेकिन पता नहीं क्या हुआ कि प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस गए और विमान का दाम 1640 करोड़ रुपये कर दिया.

सवाल उठने के बाद ‘रक्षा मंत्री ने कहा था कि मैं विमान की कीमत बताऊंगी. लेकिन बाद में उन्होंने कहा कि मैं यह आंकड़ा नहीं दे सकती क्योंकि भारत और फ्रांस के बीच गोपनीयता का समझौता है.’

2012 में राफेल ने सबसे कम बोली लगा कर भारत के साथ यह सौदा तय किया था। । वह 10.2 अरब डॉलर में 126 राफेल विमान देने वाली थी। वो भी तकनीकि ट्रांसफर के साथ।

जिसमे 18 विमानों को रेडी–टू–फ़्लाई हालत में दिया जाना था और बाकी 108 विमान HAL (हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड) द्वारा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के माध्यम से भारत मे बनाये जाने थे। लेकिन अब केवल 36 विमान 8.74 अरब डॉलर में खरीदे जाएंगे वो भी बिना तकनीकि ट्रांसफर के।

पहले ये सौदा सरकारी कंपनी एचएएल माध्यम से पूरा होना था अब ये सौदा अनिल अंबानी की नई नवेली कंपनी रिलायंस डिफेंस लिमिटेड करेगी जो राफेल डील की घोषणा के महज 10 दिन पहले बनाई गई थी।

दो सौदों की तुलना- 

कांग्रेस का सौदा                    मोदी का सौदा

विमानों की संख्या                                           126                                        36
कुल अनुबंध लागत (अरब अमरीकी डालर)         10.2                                       8.74
प्रति विमान लागत (करोड़ अमरीकी डालर )         8.1                                        24.3
तकनीकी हस्तांतरण                                         हाँ                                         नहीं

कुल मिलाकर मोदी सरकार 36 तैयार (“रेडी–टू–फ्लाई”) विमान मूल सौदे की कीमत से लगभग 3 गुना ज्यादा दाम में फ्रांस से खरीदेगी।

क्या फ्रांस साथ गए थे अंबानी-अडानी- 

दरअसल, पुराने राफेल समझौते को ख़त्म कर जब नए समझौते के लिए प्रधानमंत्री मोदी अप्रैल 2015 में, फ़्रांस गए थे तब उनके साथ अनिल अंबानी भी थे।

उसी दौरान पीएम मोदी ने एक इंडो-फ़्रांस सीईओ मीटिंग को भी संबोधित किया था। उसमें मोदी सरकार के करीबी माने जाने वाले दो उद्योगोपति अनिल अंबानी और गौतम अडानी मौजूद थे। इस खबर के सामने आने के बाद आरोपों को और बल मिला।

पीएम की घोषणा से महज 10 दिन पहले बनी कंपनी- 

पूरी बात की तह पर जाने पर ये बात पता लगती है कि अनिल अंबानी ने 2015 में पीएम मोदी के फ्रांस दौरे से महज 10 दिन पहले ही अपनी कंपनी की स्थापना की थी। गठन के दस दिन बाद ही रक्षा मामलों की अनुभवहीन कंपनी को इतना बड़ा सौदा थमा दिया गया।

कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के पास उपलब्ध जानकारी के अनुसार फ्रांस की कंपनी डसॉल्ट एविएशन के साथ राफेल डील करने वाली रिलायंस डिफेंस लिमिटेड की स्थापना 5 लाख रुपये की बेहद कम पूंजी निवेश के साथ 28 मार्च 2015 को हुई थी। अनिल अंबानी की कंपनी के गठन के महज 10 दिन के बाद 10 अप्रैल को पीएम मोदी ने फ्रांस के साथ राफेल डील की घोषणा की थी।

टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का महत्व- 

मूल अनुबंध में एचएएल (HAL) के साथ भागीदारी व टेक्नोलॉजी ट्रांसफर एक रणनीतिक उद्देश्य के साथ था। भारत हमेशा अन्य देशों से इतने महँगे विमान नही खरीद सकता।

टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और भारत मे HAL द्वारा 108 विमानों का निर्माण मूल सौदे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था, जिसे मोदी ने खत्म कर दिया था। याद रखिये कि वायुसेना की आवश्यकता और अधिक विमानों की है, इसलिए अपने पैरों पर खड़े होकर, आत्मनिर्भरता प्राप्त करना बहुत ज़रूरी है.

आप खुद ही सोचे कि लगभग 8.9 अरब डॉलर में 36 विमान वह भी सिर्फ 5 साल के रखरखाव के साथ लिए, बिना तकनीकी हस्तांतरण के जब कि लगभग उतने ही रुपयों में 126 विमान 40 साल के रखरखाव के साथ मिलने थे, तकनीकी हस्तांतरण के साथ। ये घोटाला नहीं तो क्या है?

अंबानी को होने वाला लाभ- 

रिपोर्टस के मुताबिक रिलायंस को 30,000 करोड़ रुपये में से 21,000 करोड़ मिलेंगे। खर्च हटा देने के बाद, रिलायंस इस सौदे से लगभग 1.9 अरब यूरो का शुद्ध मुनाफ़ा कमायेगा (भारतीय रुपये के अनुसार लगभग 1,42,97,50,00,000 रुपये) कुछ ज्यादा नही है। क्यों ?? यह बातें हमारी मुख्य धारा के अधिकांश मीडिया घराने आपको नही बताएंगे।

भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने सार्वजनिक रूप से इस सौदे को रोकने के लिए प्रधान मंत्री मोदी को एक पत्र लिखने की बात कही थी। उन्होंने सौदे को रोकने के लिए एक जनहित याचिका दायर करने की भी धमकी दी थी। लेकिन एक राज्यसभा सीट ने उन्हें भी चुप कर दिया।

इस बारे में कांग्रेस प्रवक्ता डॉ. अनूप पटेल कहते हैं कि घोटाला सिर्फ राफेल विमानों को खरीदने में नहीं है, घोटाला तो यह है की इन विमानों को ज्यादा कीमत पर खरीदा जा रहा है और वह भी उन शर्तों के साथ है जो भारत के लिए पूरी तरह से अनुचित हैं।

मोदी सरकार द्वारा किये गए इस सौदे में समझौते के सभी मूल उद्देश्यों को ही खत्म कर दिया गया है। भारत को सिर्फ विमानों की जरूरत नहीं है, हमे आने वाले समय के लिए तकनीकी क्षमता में आत्मनिर्भर होने की आवश्यकता भी है।

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