सामाजिक न्याय के परिप्रेक्ष्य में महामना रामस्वरूप वर्मा का जीवन दर्शन और अर्जक संघ भाग-1

नई दिल्ली। अनूप पटेल (नेशनल जनमत ब्यूरो) 

जिसमे समता की चाह नहीं, वह बढ़िया इंसान नहीं.
समता बिनु समाज नहीं, बिनु समाज जनराज नहीं.

ऊपर की दो पंक्तियों से बढ़कर भारतीय लोकतंत्र की व्याख्या नहीं हो सकती. लोकतंत्र के लिये प्रथम आवश्यक शर्त है- मनुष्य में समता का भाव. समता के बिना समाज नहीं बन सकता. समाज = सम+आज अर्थात वर्तमान व्यवस्था बराबरी पर आधारित हो.

ऐसे समाज में ही लोकतंत्र का उद्भव होगा. लोकतंत्र की इतनी स्पष्ट और सरल परिभाषा कौन गढ़ सकता है महामना रामस्वरूप वर्मा के सिवाय. भारत में तर्कवाद के अग्रणी चिंतको में से एक, भारतीय समाजवाद और मानववाद के प्रवर्तक, स्वतंत्र उत्तर भारत में सांस्कृतिक क्रान्ति के अगुवा और अम्बेडकरवाद को स्थापित करने वाले महामना रामस्वरूप वर्मा जी को आज की पीढ़ी कैसे याद करे.

रामस्वरूप वर्मा: किसान का बेटा-

रामस्वरूप वर्मा जी का जन्म उत्तर प्रदेश के कानपूर देहात जिले के गौरीकरण गाँव में एक स्वाभिमानी कुर्मी परिवार में हुआ था. कुर्मियो का मूलतः पेशा खेती ही होता है. पिता वंशगोपाल नयी-नयी फसले उगाने के लिये विख्यात थे. माँ सुखिया देवी एक एक कुशल गृहणी थी और साथ ही खेती-किसानी में उनके पिता का हाँथ बटाती थी.

रामस्वरूप जी अपनी प्रारम्भिक पढाई अपने परिवार के पास रहकर की जिससे वे अपने खेतों पर जाकर श्रम भी करते जल्द ही वे कृषि कार्यों में दक्ष हो गये. रामस्वरूप जी विवाह छात्र जीवन में ही सियादुलारी के साथ हो गया था लेकिन शादी के दो साल बाद ही सियादुलारी की मृत्यु हो गयी. रामस्वरूप जी पर परिवार वालों ने दुबारा शादी का बहुत दबाव डाला लेकिन वर्माजी पर कोई असर नहीं पड़ा.

वर्माजी खेतो में जाकर कई-कई घंटे बैठे रहते थे और एक किसान की मेहनत और लगन का मूल्यांकन करते रहते थे. किसान के जितना कोई भी मेहनत नहीं करता है लेकिन वो उतना ही विपन्न होता है और इस श्रम-शील पेशा को कोई सम्मान नहीं मिलता है. रामस्वरूप जी को इस बात की ठेस लगती रहती थी. रामस्वरूप वर्मा ने श्रमशील कौमों को सम्मान देने के लिये ही 1966 में अर्जक संघ की स्थापना की थी. अर्जक संघ मेंहनत से अर्जन करने वालो समुदायों का संगठन बना.

रामस्वरूप वर्मा: एक कुशाग्र विद्यार्थी-

रामस्वरूप वर्मा शुरू से ही विलक्षण प्रतिभा के धनी थे. प्रथम कक्षा से लेकर परास्नातक तक प्रथम स्थान प्राप्त करते रहे. उन्होंने इलाहाबाद विश्विद्यालय से 1949 में परास्नातक तथा आगरा विश्विद्यालय से वकालत की पढ़ाई की थी. वर्माजी छात्रो के बीच अपने दार्शनिक द्रष्टिकोण से बहुत पॉपुलर हो गये थे.

वे किसी भी समस्या का कारण और समाधान की चर्चा बहुत ही सरल भाषा में करते थे. वर्माजी का हिंदी-अंग्रेजी के साथ उर्दू और संस्कृत भाषा में एकसमान अधिकार था. वर्माजी ने भारतीय प्रशासनिक सेवा की भी परीक्षा दी. वर्माजी जब इंटरव्यू देने जा रहे थे तो उन्होंने सोचा कि नौकरशाह बनकर वो नौकरी ही कर सकते है।

लेकिन राजनीति में आकर वे जनमानस की बेहतरी के लिये ज्यादा काम कर सकते है और शोषित समाज के लिये सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक व सांस्कृतिक क्षेत्र में सम्मान दिला सकते है. वर्माजी इंटरव्यू देने गये ही नहीं और शोषितों-पीडितो का झंडा बुलंद करने के लिये अपना जीवन न्योछावर करने का प्राण लिया.

रामस्वरूप वर्मा: एक राज-ऋषि-

रामस्वरूप वर्मा वास्तव में भारतीय राजनीति के राजर्षि (पॉलिटिकल फिलोसफ़र) थे. एक राजर्षि की तरह जिये और मरे भी. वर्माजी पर समाजवादी राजनीति का व्यापक प्रभाव पड़ा था और डा. राममनोहर लोहिया व आचार्य नरेन्द्रदेव के संपर्क में आये. वर्मा जी ने लोहिया जी की पार्टी संसोपा के उम्मीदवार के रूप में कानपूर की सिकंदरा विधानसभा से 1957 में प्रथम बार चुनाव लड़ा और शानदार जीत मिली.

वर्मा जी कुल 7 बार विधायक रहे. वर्मा जी मुख्यमंत्री चौधरी चरण के मत्रिमंडल में वित्त मंत्री के रूप में अपनी सेवा दी. देश में पहली बार लाभ का बजट वर्माजी ने पेश किया था. वर्माजी ने सभी आर्थिक आंकड़े, पत्र-प्रपत्र हिन्दी में भी उपलब्ध करने का प्रथम प्रयास किया और इसमें सफल भी हुये. वर्माजी वित्तमंत्री रहते हुये भ्रष्टाचार पर बड़ी नकेल कसी थी.

आगे चलकर वर्माजी का लोहियाईट राजनीति से मोहभंग हो गया था. वर्माजी के अनुसार लोहिया का राजनैतिक दर्शन को शोषित समाज के उत्थान के लिये और मजबूत करना पड़ेगा. लोहिया का फलक पिछडो के लिये 60% था जबकि वर्माजी के लिये 90% शोषितों के लिये 90% फलक था.

वर्माजी ने 1968 में समाज दल की स्थापना की. समाज दल का राजनैतिक दर्शन भारतीय समाजवाद और मानववाद पर आधारित था, जो आर्थिक क्षेत्र में पूँजीवाद का विकल्प बनेगा और राजनैतिक क्षेत्र में ब्राह्मणवाद की जगह मानववाद. उस समय बिहार में महान क्रांतिकारी जगदेव बाबू शोषित दल का नेतृत्व कर रहे थे.

दोनों दलों की वैचारिकी एक समान प्रतीत हुयी फलतः 1972 में दोनों दलों के योग से शोषित समाज दल की स्थापना हुयी. प्रसिद्द राजनैतिक टिप्पणीकार प्रेमकुमार मणि लिखते है: हिंदी क्षेत्र में साठ के दशक में समाजवादियों के बीच जाति और वर्ण के सवाल गहराने लगे . लोहिया के नेतृत्व वाली संयुक्त समाजवादी पार्टी अर्थात संसोपा के नारे ‘संसोपा ने बाँधी गांठ , पिछड़ा पावें सौ में साठ ‘ ने बड़े पैमाने पर पिछड़े वर्ग के राजनीतिक कार्यकर्ताओं को इससे जोड़ा था . लेकिन इनलोगों ने अनुभव किया कि संसोपा इसे लेकर गंभीर नहीं है .

आरक्षण और अवसर नहीं ,इस वर्णवादी -जातिवादी व्यवस्था को खत्म करने की जरुरत है . स्वयं लोहिया की गाँधी में आस्था थी .गाँधी वर्णवाद को स्वीकृति देते थे. इसी सवाल पर आंबेडकर गाँधी से दूर हुए थे . रामस्वरूप वर्मा और जगदेव प्रसाद जैसे नेताओं ने गाँधीवादी लोहियावाद से विद्रोह किया और फुले- अम्बेडकरवाद के नजदीक आये.

रामस्वरूप वर्माजी और जगदेव बाबू जी की जोड़ी ने उत्तर भारत की राजनीती में बड़ी हलचल पैदा कर दी. रामस्वरूप वर्मा जी का दर्शन और और जगदेव बाबू का कुशल नेतृत्व से शोषित समाज दल एक राजनैतिक विकल्प बनने लगा था. इसी बीच बिहार में जगदेव बाबूजी की हत्या हो जाती है. वर्माजी को इससे बहुत बड़ा आघात पहुंचा था.

इस बड़े आघात से उबरकर वर्माजी फिर राजनैतिक जीवन में सक्रिय हुये. शोषित समाज के लिये वे विधानसभा में अपनी आवाज बुलंद करते रहे. वर्माजी ने मतदाता पहचान पत्र में फोटो और गरीबों के लिये न्यूनतम दम पर राशन उपलब्ध करवाने की जोरदार मुहीम छेड़ी जिसे केंद्र की सरकारों ने माना और उस पर अमल भी हुआ.

वर्माजी राजनीति को सामाजिक जीवन का कार्यक्षेत्र और धर्म को व्यक्ति का निजी विश्वास मानते थे. धर्म-आधारित राजनीति के वे सदा खिलाफ थे. वर्माजी ने आजीवन साम्प्रदयिक-सौहार्द के सतत संघर्ष किया.
वर्माजी इमानदारी की मिसाल थे. उनका परिवार, घर जैसा पहले था वैसे ही म्रत्युपरांत भी रहा. वर्माजी का जब परिनिर्वाण हुआ तो उस समय उनके खाते में मात्र कुछ सौ रुपये थे. वर्माजी का सम्पूर्ण राजनैतिक जीवन वर्तमान राजनीति के धनबल-बहुबल के पक्ष का प्रतिपक्ष प्रस्तुत करती है.

रामस्वरूप वर्मा: तर्कवाद, सामाजिक क्रांति के पिता

स्वतंत्र भारत में पेरियार ने जिस तरह दक्षिण भारत में ब्राह्मणवाद और पाखण्डवाद को खण्ड-खण्ड कर दिया था रामस्वरूप वर्मा जी ने उत्तर भारत में वही काम किया. वर्माजी ने अपने तर्कों और लेखनी से ब्राह्मणवाद की जड़े खोद दी थी. रामस्वरूप का समग्र सामाजिक दर्शन

निम्नलिखित कृतियों में देखा जा सकता है-
1. मानववादी प्रश्नोत्तरी, 1984
2. अछूतों की समस्या और समाधान, 1994
3. क्रांति- क्यों और कैसे? 1989
4. मनुस्मृति राष्ट्र का कलंक, 1990
5. निरादर कैसे मिटे, 1993

वर्मा जी को शुरू से महसूस होता था कि राजनैतिक और आर्थिक क्षेत्र में बदलाव तभी हो पायेगा जब सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में क्रांतिकारी पारिवर्तन आये. वर्माजी का स्पष्ट मानना था कि जिसकी संस्कृति है उसकी सत्ता. अतः वर्माजी ने सामाजिक-सांस्कृतिक क्षेत्र में क्रान्ति का सूत्रपात करने के लिये 1 जून 1968 को अर्जक संघ की स्थापना की.

अर्जक संघ देश के कमेंरे, शोषितों का सांस्कृतिक संगठन बना जो असमानता पर आधारित ब्राह्मणवादी संस्कृति को हटाकर सचेत समता पर आधारित मानववादी संस्कृति की स्थापना करेगा. वर्मा जी खाने-पीने, उठने-बैठने, चलने-बोलने आदि 6 क्षेत्रो पर सचेत समता को आवश्यक बताया. वर्माजी मानववाद के सच्चे प्रवर्तक थे. वर्मा जी यूटोपिया वैश्विक स्तर पर मानववाद को स्थापित करना था.

देश में प्रथम मानववादी चिन्तक मानवेन्द्र नाथ राय थे, वे कम्युनिस्ट फ्रेमवर्क में मानववाद को परिभाषित करते थे जबकि वर्माजी समाजवादी फ्रेमवर्क में.

शेष भाग-2 में.

( लेखक अनूप पटेल जेएनयू में शोधार्थी और लखनऊ में शिक्षक हैं। )

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