प्रेम प्रसंग के मामले में घर से भागी लड़की तो ठाकुरों ने फूंक दिए दो गांव के 20 मुसलमानों के घर

नई दिल्ली/भोपाल। नेशनल जनमत ब्यूरो।

मध्यप्रदेश के सीहोर जिले में एक राजपूत लड़की के घर से गायब होने के बाद शनिवार देर रात लगभग 20 मुसलमानों के घरों को आग के हवाले कर दिया गया। राजपूत समाज के लोगों में मुस्लिमों के प्रति नफरत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि ना सिर्फ आरोपी लड़के बल्कि आसपास के दो गांवों को निशाना बनाकर सभी मुस्लिमों के घरो को जला दिया गया।

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राजपूतों का आरोप अपहरण हुआ है- 

चार जुलाई को सिहोर के छिपानेर गांव की एक 16 वर्षीय लड़की अपने स्कूल से गायब हो गई थी, जिसके बाद परिवार वालों ने इसकी शिकायत स्थानीय पुलिस थाने में की थी। परिवार ने आरोप लगाया गया कि एक मुस्लिम युवक ने लड़की का अपहरण कर लिया है। इस आरोप के बाद गांव में सांप्रदायिक तनाव बढ़ गया। देखते ही देखते हिंदू समुदाय के लोगों ने मुसलमानों के घरों पर हमला करके छिपानेर और उसके पड़ोसी नारायणपुर गांव में 20 मुसलमानों के घरों को आग के हवाले कर दिया।

प्रेम प्रसंग का है मामला- 

गांव के एक निवासी अकबर ने बताया पिछले चार दिनों से इस इलाके में तनाव है। राजपूतों ने हमारे घरों पर हमला किया और उन्हें आग लगा दी। हम किसी तरह सुरक्षित रूप से भाग निकले लेकिन हम अपने घर लौटने से डर रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ नाम न छापने की शर्त पर एक व्यक्ति ने कहा कि लड़की लड़के से प्यार करती थी और वो अपनी मर्जी से भागी थी। लेकिन उसके परिवार ने उसे प्रतिष्ठा का मुद्दा बना लिया है और इलाके में रहने वाले मुस्लिम परिवारों को परेशान कर रहे हैं।

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सिहोर के पुलिस अधीक्षक मनीष कपूरिया ने कहा कि स्थिति अभी नियंत्रण में है। आईपीसी के विभिन्न धाराओं के तहत 50 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है और उनमें से 12 की की पहचान कर ली गई है। बताया जा रहा है कि पूरे मामले में पीछे से बीजेपी के नेता आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। घटना के बाद इलाके में भारी सेना बल तैनात कर दिया गया है और मामले की जांच की जा रही है।

नेशनल जनमत का सवाल- 

घटना की सत्यता तो दूर बैठकर नहीं समझी जा सकती और ना ही जिस पिता की बेटी घर से गायब हुई है उसके दर्द को समझा जा सकता है। लेकिन यही वारदात अगर किसी राजपूत-ब्राह्मण या किसी और के लड़के ने की होती तो क्या उस गांव में सभी राजपूतों के घरों को जलाना उचित ठहराया जा सकता था। क्या किसी एक युवक के किसी कारनामे की सजा पूरे समाज को दिया जाना उचित है ? पीड़ित होने का मतलब गुंडई पर उतर आना नहीं है।

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