उपचुनाव ने साबित कर दिया कि BJP की ‘चाणक्य नीति’ कोरी बकवास है, सिर्फ मीडिया मैनेजमेंट है

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

भाजपा उपचुनाव को लेकर बिल्कुल आश्वस्त थी. उसे बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि उन्हें इतनी करारी हार मिलेगी. भाजपा ही नहीं विपक्षी दल भी खासकर उत्तर प्रदेश के, वो भी इतने आश्वस्त नहीं थे कि इतनी शानदार जीत होगी.

लेकिन फूलपुर, गोरखपुर के उपचुनाव में ये अद्भुत बात हुई कि नेता से ज्यादा अवाम और वहां की सक्रिय जनता ने भाजपा के उम्मीदवारों को हराने में ज्यादा मेहनत की है.

मुझे लगता है कि इसकी वजह को दिल्ली या बाहर बैठे मीडिया के लोग या विश्लेषक और चैनलों पर बैठे टिप्पणीकार समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है.

मैं समझता हूं ऐसा इसलिए हुआ है कि उत्तर प्रदेश में जो आम मतदाता हैं, उनमें दो तरह के लोग हैं. एक तो वे जो भाजपा से पूरी तरह मुग्ध हैं कि यही ठीक हैं. समाजशास्त्रीय स्तर पर देखें तो इनमें ऊंची जातियों का एक बड़ा हिस्सा है.

सभी ऊंची जातियां नहीं लेकिन इन जातियों का एक बड़ा हिस्सा अभी भी मानता है कि भाजपा उनके लिए बेहतर हैं. व्यापारी वर्ग का एक बहुत छोटा हिस्सा अभी बचा है जो भाजपा के पक्ष में है क्योंकि नोटबंदी और जीएसटी से वो परेशान महसूस करता है.

गैर यादव पिछड़ों को लगा कि बीजेपी में उनको हिस्सेदारी मिलेगी- 

उत्तर प्रदेश के ग़ैर-यादव वर्ग में कुर्मी और कोईरी दो प्रमुख जातियां हैं, इनमें भाजपा ने ज़बरदस्त सेंध लगाई थी. उसकी मुख्य वजह यह थी कि बसपा और समाजवादी पार्टी (सपा) दोनों के शीर्ष नेतृत्व ने इन दोनों बिरादरियों के कार्यकर्ता, सामाजिक रूप से सक्रिय लोग, उभरते हुए वर्ग चाहे व्यापार में हो, या सेवा में हो आदि को नाराज कर रखा था.

उस समय इन दोनों बिरादरियों का बहुत बड़ा हिस्सा भाजपा में चला गया क्योंकि उन्हें लगा कि भाजपा उन्हें समाज में ज्यादा बेहतर हिस्सेदारी देगी. 2014 में भाजपा ग़ैर-यादव ओबीसी में बहुत बड़ा विभाजन करा पाने में सफल रही.

ऊंची जातियों का ध्रुवीकरण भी भाजपा के पक्ष में गया, साथ ही ग़ैर-यादव ओबीसी में बड़े तबके का भाजपा की तरफ जाना, ये उनकी सफलता के दो बड़े कारण थे.

अब इस चुनाव वो तबका, खासकर पिछड़ा वर्ग का बीते 4 साल से मोदी सरकार को देख रहा है. दलित तो पहले से ही कई कारणों से भाजपा से नाराज हैं.

दलित विपक्ष के साथ जुड़ा था, लेकिन ओबीसी काफी हद तक छिटक गया था. इस चुनाव में उसे लगा कि 4 साल से मोदी की सरकार चल रही थी, इसमें उसे न न्याय मिल रहा है, न तो उसको हिस्सेदारी मिल रही है.

न्याय और हिस्सेदारी न मिलने के इन दोनों पहलुओं की वजह से नाराजगी इकठ्ठा होती रही. इन आबादियों के जो युवा ने अपने परिवारों, अपनी आबादियों को मोबिलाइज़ किया कि अब इनके खिलाफ जाना चाहिए.

पिछड़े-दलित की थ्योरी सफल रही- 

आमतौर पर लोग नजरअंदाज कर रहे हैं कि मायावती और अखिलेश यादव के बीच जो अंडरस्टैंडिंग हुई, भले ही वो राजनीतिक तौर पर कोई ऐलानिया गठबंधन नहीं था, लेकिन जिस दिन मायावती ने ऐलान किया कि उनकी पार्टी के समर्थक और कार्यकर्ता उस पार्टी या उस उम्मीदवार को वोट दें जो भाजपा प्रत्याशी को हराने में सबसे सक्षम और समर्थ हो, इसका तुरत असर हुआ.

इसका इतना तेज असर पड़ा कि कार्यकर्ताओं ने अपने कोऑर्डिनेटर से संपर्क करना शुरू किया. कोऑर्डिनेटर ने लखनऊ में अपने मुख्य ऑफिस में संपर्क किया कि हम किस हद तक समर्थन में जाएं. फिर ऊपर से इशारा मिला कि हमें अपनी सौ फीसदी ताकत लगा देनी है.

फूलपुर और गोरखपुर के कई विधानसभा क्षेत्रों में देखा गया कि बसपा के कार्यकर्ता बिना अपने किसी उम्मीदवार के, जैसे अपने उम्मीदवार को जिताने में मेहनत करते हैं, वैसे उन्होंने इस उम्मीदवार को जिताने का प्रयास किया.

दूसरा पहलू है, जिसे सभी नजरंदाज करते रहे कि उत्तर प्रदेश में गोरखपुर और फूलपुर दोनों जगह ही सपा ने अपने पुराने ढर्रे में फेरबदल किया. अपनी पुरानी कमियों को रिव्यू किया.

खासकर पिछड़ी जातियों के प्रति जो एरोगेंस दिखाई देता है, उसमें बदलाव दिखाई दिया. अखिलेश यादव ने गोरखपुर में अपनी पार्टी के उम्मीदवार को ख़ारिज करके एक दूसरी पार्टी निषाद पार्टी के नेता प्रवीण निषाद को अपना टिकट दे दिया.

इससे यह संदेश गया कि ओबीसी में ऐसा तबका, खासकर यादव जो सपा से अपने आप को आइडेंटिफाई करता है, जो खुद को अति पिछड़ी जातियों से आगे मानता हैं या ताकतवर समझता है, वो अति पिछड़ी जातियों को आगे लाने के लिए समझौता करने को तैयार है.

इससे भी दूसरी अन्य अति पिछड़ी जातियों और दलित वर्ग में यह संदेश गया कि सपा का नेतृत्व पहले के मुकाबले अति पिछड़ों और दलितों के प्रति उदार और समझदार हुआ है. तो इन बातों ने गोरखपुर और फूलपुर के पूरे समीकरण को बदल डाला. मैं समझता हूं कि भाजपा की हार का यह असल कारण है.

जो लोग मानते हैं कि भाजपा में अंतर्कलह थी, मठ के उम्मीदवार को टिकट नहीं मिला, किसी और मिल गया, ऐसे किसी अंतर्विरोध से भाजपा हारी, यह फ़िज़ूल की थियरी है. ये पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों की उभरती हुई नई एकता को यह थियरी नजरअंदाज करती है.

योगी को शक्तिमान साबित करने पर तुला था मीडिया- 

जब योगी मुख्यमंत्री बने तब कुछ देर के लिए लोगों ने देश के आदरणीय प्रधानमंत्री का भजन कम करके योगी का भजन ज्यादा शुरू कर दिया था. ‘योगी जी क्या खाते हैं, कैसे पानी पीते हैं, कैसे हिरन को गोदी में लेकर घास खिलाते हैं…’

राष्ट्रीय स्तर पर बनी भाजपा की ‘अपराजेय’ और आदित्यनाथ ‘स्टार’ छवि की के पीछे सिर्फ प्रचार है. इसी मीडिया द्वारा कहा गया कि त्रिपुरा की जीत में योगी का बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है, उन्होंने वहां रहने वाले नाथ संप्रदाय को जोड़ा जैसे बातें कहना बहुत हास्यास्पद है.

मीडिया द्वारा ही यह भी उछाला गया था कि मोदी के बाद योगी बड़े नेता के रूप में उभर रहे हैं, इनके द्वारा ही यह कहा गया कि इनका कद मोदी के बाद हो जाएगा. उपचुनाव के नतीजों ने मीडिया के इस प्रयास को धक्का पहुंचाया है.

साथ ही 30 सालों से गोरखपुर में कायम इस जलवे को एक निषाद नौजवान का खत्म करना दिखाता है कि ये जो लगातार उत्तर प्रदेश में एनकाउंटर के नाम पर जो हत्याएं हो रही थीं, उसका भी चुनाव में बहुत असर पड़ा है. आंकड़ों की मानें तो इन मुठभेड़ों में मारे गए 90% लोग पिछड़े वर्ग से आते हैं.

जिस तरह से 4 साल में मोदी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर काम कर रही है, ठीक वैसे ही 1 साल के अंदर योगी के खिलाफ भी ऐसा ही माहौल तैयार हो गया और इन नतीजों ने इन दोनों ही नेताओं का कद गिराया है. ये परिणाम दोनों की सरकारों के विरुद्ध जो जनाक्रोश इकठ्ठा हो रहा है, उसका नमूना है.

‘चाणक्य नीति’ नहीं सब मीडिया मैनेजमेंट है- 

इसी तरह मीडिया द्वारा प्रचारित भाजपा की ‘चाणक्य नीति’ विफल हुई. भाजपा शुरू से ही मीडिया को लेकर काफी संवेदनशील और प्रो एक्टिव रही है.

वहीं वामपंथी लोगों के पास जैसे ही कोई पत्रकार जाता है, वो चाहे कोई भी हो वो उसे बुर्जुआ मीडिया कहते हैं. वामपंथी मीडिया को तत्काल हिकारत की नजर से देखते हैं. अब उनमें थोड़ी समझदारी आ रही है.

कांग्रेस की लंबे समय तक सत्ता रही तो वे मीडिया को मैनेज करते थे, लेकिन आरएसएस और भाजपा के पास जब सत्ता संरचना नहीं थी, तब भी वे मीडिया के प्रति काफी सजग थे कि कैसे मीडिया का भरपूर इस्तेमाल किया जाए.

बाद के दिनों में जब इनके पास सत्ता आई तो इन्होंने गुर सीखे. लालकृष्ण आडवाणी जब सूचना और प्रसारण मंत्री थे, तो राष्ट्रधर्म, पांचजन्य या इस तरह के जो संघ समर्थक संस्थान थे, उनके पत्रकारों को उन्होंने मुख्यधारा के मीडिया में प्रमुख स्थान दिलवाया. उनके जरिये फिर कई लोगों की नियुक्तियां हुईं.

मेरा मानना है कि भाजपा बहुत माइक्रो लेवल पर मीडिया मैनेज करती है. वो मीडिया वालों को ऐसे छोटी-छोटी बातें बताती है कि मीडिया को लगता है कि वह, इस पर तो बड़ी अच्छी रिपोर्ट बन सकती है.

एक और उदाहरण देता हूं. मैं सीबीआई जज लोया की रहस्यमयी मौत से जुड़ी एक रिपोर्ट पढ़ रहा था, जिसमें ज़िक्र था कि कहीं कहा गया था कि जिस दिन किसी व्यक्ति विशेष को लेकर कोई निर्णय आएगा, उस दिन देश में कोई और बड़ी घटना हो जाएगी, जिससे वो मामला दब जाए. उसे प्रमुखता न दी जाए. मैं नहीं जानता कि वो कितनी प्रामाणिक टिप्पणी थी.

तो जब राजनीतिक दर्शन के लोग यहां तक सोचते हैं तब आप कल्पना कीजिये कि मीडिया मैनेजमेंट के बारे में वो कितने सजग हैं. तो ये जो ‘चाणक्य नीति’ है ये सब मीडिया मैनेजमेंट है. जहां ये सफल हो जाते हैं, वहां इनकी कथित ‘चाणक्य नीति’ का ढोल पीटते हैं, जहां विफल हो जाते हैं तो कहते हैं कि अति-आत्मविश्वास हमें ले डूबा.

(लेखक उर्मिलेश वरिष्ठ पत्रकार है द वायर पर छपे लेख से साभार)

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