योगीराज में ‘विकास दुबे’ 119वां अपराधी है जो पुलिस एनकाउंटर में मारा गया, 2258 घायल हो चुके हैं !

लखनऊ, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद ये पहला एनकाउंटर नहीं है जिस पर सवाल उठे बल्कि तकरीबन सभी एनकाउंटर के बाद पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहे हैं लेकिन इस बार एनकाउंटर विकास दुबे का हुआ था। इसलिए जातिवादी मानसिकता से घिरे मीडिया वालों को भी सबसे ज्यादा तकलीफ होना शुरू हुई।

हालांकि एनकाउंटर के घटनाक्रम की कड़ियां जोड़ें तो निश्चित तौर पर एनकाउंटर फर्जी ही प्रतीत होता है। एनकाउंटर जिस ढ़ंग से किया गया मानो सरकार और पुलिस कहना चाह रही हो कि हम तो करेंगे फर्जी मुठभेड़ जितना हल्ला मचाना हो मचा लो।

विकास दुबे के एनकाउंटर के बाद योगी सरकार को ब्राह्मण विरोधी बताते हुए उसको जाति का मसीहा साबित करने पर तुले लोगों पर भी ये सवाल उठता है कि विकास दुबे 119वां अपराधी/आरोपी है जिसको पुलिस एनकाउंटर में मारा गया। इससे पहले जिन मामलों में फर्जी एनकाउंटर के आरोप लगे उनमें से कितनों में मीडिया वालों ने पीड़ित परिवारों को साथ दिया।

चुनिंदा जातियों और धर्म विशेष के अपराधियों के एनकाउंटर को रामराज्य बताने वाले आज विकास दुबे के एनकाउंटर पर सबसे ज्यादा दुखी हैं ? बहरहाल इस सबके बीच में योगी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के  2014 के दिशानिर्देशों के अनुरूप गैंगस्टर विकास दुबे एनकाउंटर की जांच के लिए SIT का गठन कर दिया है।

इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि मार्च 2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से विकास दुबे 119वां आरोपी है, जो पुलिस मुठभेड़ में मारा गया है.

इन पुलिस मुठभेड़ों में से 74 मामलों की मजिस्ट्रेट जांच तक पूरी हो गई है, जिसमें पुलिस को क्लीनचिट मिल चुकी है. 61 मामलों में पुलिस क्लोजर रिपोर्ट तक दायर कर चुकी है, जिसे अदालत ने भी स्वीकार कर लिया है.

रिकॉर्ड से पता चला है कि पुलिस ने अब तक 6,145 ऑपरेशन किए हैं, जिनमें से 119 आरोपियों की मौत हुई है और 2,258 आरोपी घायल हुए हैं। इन ऑपरेशंस में 13 पुलिसकर्मियों की मौत हुई है, जिसमें पिछले सप्ताह कानपुर में मारे गए आठ पुलिसकर्मी भी शामिल हैं. कुल मिलाकर 885 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि तय कानूनी प्रक्रिया होने के बावजूद एनकाउंटर किलिंग में नियमों की अवहेलना जारी है. सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में हुई मुठभेड़ मामलों में दखल देते हुए जनवरी 2019 में इसे बहुत ही गंभीर मामला बताया था.

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज ने 1 हजार से ज्यादा एनकाउंटर और उनमें 50 से ज्यादा लोगों की मौत के मामले में सुप्रीम अदालत में याचिका दायर की थी। इस मामले पर जुलाई 2018 से फरवरी 2019 के बीच चार बार सुनवाई हुई, लेकिन तब से इसे सूचीबद्ध नहीं किया गया ।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इन मुठभेड़ों में हुई मौतों को लेकर 2017 से लेकर अब तक सरकार को तीन नोटिस जारी किए हैं और राज्य सरकार ने अपना बचाव करते हुए इन सभी नोटिस का एक ही जवाब भेजा है.

अब इस बार क्या होगा ? ये भी आप और हमें पहले से पता है और सरकार को भी क्योंकि ये महज एक रस्म अदायगी है।

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