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2019 में मुकाबला छद्म हिन्दुत्व और जातीय स्वाभिमान के बीच होगा, यानि फिर होगा कमंडल पर मंडल का वार !

नई दिल्ली, संजय कटियार (नेशनल जनमत) 

एजेंडा तय हो रहा है। ये स्वाभाविक है या प्रायोजित, कहना मुश्किल है। लेकिन ये बात ठोंक कर कही जा सकती है कि 2019 में मुकाबला हिन्दुत्व और जातीय स्वाभिमान के बीच होगा। गुजरात चुनाव की प्रयोगशाला में इसके रंग निखर के सामने आ चुके हैं।

जहां हार्दिक, ठाकोर और जिग्नेश की जातीय आग के सामने भगवा ज्वाला मद्धम पड़ गई। भीमा-कोरेगांव इसका विस्तार है और राज्य सत्ताधारी भाजपा सरकार बैकफुट पर है। केन्द्र की मोदी सरकार चुप्पी साधे है और दलित नेता जिग्नेश मेवाणी दिल्ली आकर ताल ठोंक रहे हैं।

कमंडल की काट सिर्फ मंडलवाद में है- 

मंडल के बाद देश में जातीय राजनीति फिर परवान चढ़ रही है और विपक्ष ये जानता है कि भगवा उफान को जाति के रंग से ही फीका किया जा सकता है। ऐसे में तलवारें मयान से निकल चुकी हैं। युद्ध को जीतने के लिए मोर्चे लड़े जा रहे हैं।

इतिहास खुद को दोहरा रहा है। 90 के दशक में जब राममंदिर आंदोलन उफान पर था, तब भी मंडल कमीशन की सिफारिशों में इसकी काट खोजी गई थी। आज भी हर तरफ हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद की बात हो रही है।

हज हाउस को भगवा रंग में रंगा जा रहा है। गोहत्या के नाम पर मानव हत्या हो रही हैं। पाकिस्तान और कश्मीर को लेकर राष्ट्रवादी नारे गढ़े गए हैं। जबकि, इसी दौर में हार्दिक, ठाकोर, जिग्नेश और चन्द्रशेखर जैसे जातीय नेतृत्व का उभार होता है। पाटीदार आंदोलन होता है।

सहारनपुर में दलित संघर्ष पर अमादा हो जाते हैं और भीमा-कोरेगांव में महार (दलित) हिंसक हो जाते हैं। इनसे जातीय अस्मिता, निष्ठा और जातीय गठजोड़ के जटिल मुद्दे सतह भी सतह पर आ गए हैं।

बीजेपी हर समस्या का समाधान राष्ट्रवाद में खोजती है- 

भाजपा के साथ दिक्कत ये है कि वो हर समस्या का समाधान हिन्दू राष्ट्रवाद में ही खोजती है और इसी में हित साधती है। लेकिन, हिन्दुओं में कई जातियां हैं, उनकी अपनी पहचान है। अपने-अपने स्वाभिमान है। इनके आपसी संबंध जटिल हैं और सामाजिक तानेबाने में विद्रूपताएं हैं।

ऐसे में सिर्फ हिन्दू राष्ट्रवाद के राग तले इन्हें लम्बे समय तक साधा नहीं जा सकता। ये बात विपक्ष भी जानता है और अब वो मौका साधकर प्रहार करने लगा है।

आखिर दलितों के जश्न से दिक्कत किसे है ?

भीमा-कोरेगांव में भी ऐसा ही हुआ। यहां दलित अपनी जीत पर जश्न मना रहे थे और मराठा भी उनके साथ थे। आरोप है कि हिंदूवादी संगठनों ने अपना जवाबी एजेंडा चलाया और भगवा झंडाधारी समूह ने दलितों पर हमला कर दिया।

इसे समझने के लिए हमें इतिहास में जाना होगा। दो सौ साल पहले पुणे की भीमा नदी के किनारे कोरेगांव में अंग्रेजों और पेशवा शासकों (ब्राह्मणों) के बीच युद्ध हुआ। पेशवाओं के शोषण के शिकार महार (दलित) अंग्रेजों की तरफ से लड़े।

उन दिनों महार कमर पर झाड़ू बांधते थे और गले में मटका बांधकर रखते थे ताकि उनके कदमों के निशान मिटते जाएं और उनका थूक जमीन पर न गिरे। इन्हीं महारों के जबर्दस्त युद्ध कौशल के आगे 500 सैनिकों की अंग्रेज सेना से पेशवा के 2500 लड़ाके हार गए।

अंग्रेजों ने यहां एक शिला-स्तंभ बनवाया। स्तंभ पर मारे गए 49 सैनिकों के नाम लिखे हैं, जिनमें 22 महार हैं। यहीं दलित अमानवीय शोषण से मुक्ति का जश्न मनाते हैं। दौ सौवें साल पर इस जश्न के दौरान ही हालिया हिंसा हुई।

भीमा कोरेगांव की ये हिंसा ही भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। क्योंकि, ये पार्टी चुनावों में जातीय समीकरण साधना भले ही सीख गई हो पर वो किसी जातीय समस्या से निपटने में हमेशा ही विफल रही है। उत्तर प्रदेश की जीत और गुजरात में सिमटती जीत इसके सटीक उदाहरण है।

गुजरात चुनाव विपक्ष के लिए संजीवनी की तरह है- 

गुजरात चुनाव बताता है कि निचली जातियां अगर भाजपा के खिलाफ एकजुट हो जाएं तो उसके लिए चुनावी आंकड़े ठीक रख पाना मुश्किल है। विपक्ष भी ये जानता है। ऐसे में वो जातीय उभार को और उभारने का कोई मौका अपने हाथ से नहीं जाने देगा।

2019 में भाजपा की मुश्किलें इसलिए ज्यादा हैं क्योंकि हिन्दू राष्ट्रवाद के उभार का उच्चतम बिन्दू वह 2014 में भुना चुकी है। इसे बार बार हासिल कर पाना संभव नहीं है।

बेरोजगारी, महंगाई और किसानों से जुड़ी समस्याओं से भी लोग परेशान हैं। विकास के नारे से अब भाजपा खुद ही कतराने लगी है। हज हाउस को भगवा करके वो हिन्दू राष्ट्रवाद को भुनाने की कोशिश जरूर करेगी पर सामने जातीय अस्मिता के सवाल भी होंगे।

खुद हिन्दू-मुस्लिम में देश को बांटकर सत्ता के शिखर पर पहुंची भाजपा के लिए इसे अनैतिक कह पाना भी मुश्किल होगा। क्योंकि, अगर जातीय उभार होगा तो राजनीति भी होगी ही।

( लेखक संजय कटियार कानपुर निवासी वरिष्ठ पत्रकार हैं) 

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