You are here

कौन है वो तानाशाह जिसके कहने पर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने देश के लोकतंत्र को खतरे में डाल दिया है !

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो। 

ऐतिहासिक बनने के चक्कर में मोदी सरकार के राज में कई ऐसी बातें हैं जो पहली बार हो रही हैं। देश में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के किसी जज (जस्टिस कर्णन) को अवमानना के मामले में जेल जाना पड़ा और अब आजादी के बाद पहली बार ऐसी नौबत नहीं आई की देश की सर्वोच्च अदालत को प्रेस कांफ्रेंस करनी पड़ गई।

आम जनता तो ठीक ही ठीक है सरकार की तानाशाही का आलम है कि देश के सर्वोच्च न्यायालय के जज भी भ्रष्ट सिस्टम से परेशान हैं। जस्टिस कर्णन ने जब भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई तो उनका मानसिक संतुलन  खराब बताकर उन्हे जेल में डाल दिया गया।

अब सुप्रीम कोर्ट के चार जज भ्रष्ट कार्यशैली से इतने आजीज आ गए की उन्होंने चीफ जस्टिस के खिलाफ ही प्रेस कांफ्रेंस कर डाली. इस कांफ्रेंस से न्यायपालिका में हलचल मच गई।

इन चारों जजों के जज्बे को नेशनल जनमत सलाम करता है कि उन्होंने इस न्यायपालिका के ऊपर तानाशाही हुकुमत के दवाब को जनता के सामने नंगा कर दिया।

जस्टिस चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगाई, जस्टिस मदन भीमराव और जस्टिस कुरियन जोसेफ पहली बार मीडिया के सामने आकर सुप्रीम कोर्ट के कामकाज पर सवाल खड़ा किए. देश की सबसे बड़ी अदालत के काम काज को लेकर चारों जजों ने जो चिट्ठी चीफ जस्टिस को भेजी थी, उसे सार्वजनिक कर दी गई हैं.

उस चिट्ठी के अनुसार कोर्ट ने कई ऐसे न्यायिक आदेश पारित किए हैं, जिनसे चीफ जस्टिस के कामकाज पर असर पड़ा, लेकिन जस्टिस डिलिवरी सिस्टम और हाई कोर्ट की स्वतंत्रता बुरी तरह प्रभावित हुई है.

पत्र में आगे लिखा गया हैं कि चीफ जस्टिस के पास रोस्टर बनाने का अधिकार हैं,वह तय करते हैं की कौन सा केस कौन सा कोर्ट देखेगा. यह विशेषाधिकार इसलिए है, ताकि सुप्रीम कोर्ट का कामकाज सही ढंग से चल सके.

लेकिन इससे चीफ जस्टिस को उनके साथी जजों पर कानूनी, तथ्यात्मक और उच्चाधिकार नहीं मिल जाता। इस देश के न्यायशास्त्र में यह स्पष्ट है कि चीफ जस्टिस अन्य जजों में पहले हैं, बाकियों से ज्यादा या कम नहीं।

इशारों में हुकुमत के दबाव की बात कह गए- 

चिट्ठी में आगे लिखा गया हैं कि कोर्ट में कई ऐसे मामले हैं जो देश के लिए महत्वपूर्ण हैं. लेकिन चीफ जस्टिस उन मामलों को तार्किक आधार देने के बजाय अपनी पसंद के बेंचों को सौंप देते हैं. जो कि गलत हैं.

इससे न्यायलय की छवि खराब होती हैं. चारों जजों ने मीडिया का धन्यवाद करते हुए कहा कि हमने प्रेस कांफ्रेंस इसलिए की, ताकि कल को कोई हम पर उंगली ना उठा सके की हमने आत्मा बेच दी.

जज लोया की मौत का सच क्या है?

सत्य ताले में बंद हो सकता है मगर उसमें अंतर आत्मा को चीर देने की शक्ति होती है। जज लोया की मौत ने आज सुप्रीम कोर्ट को एक ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा कर दिया है।

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के केस की सुनवाई कर रहे सीबीआई की विशेष अदालत के जज लोया की मौत के बाद ही अमित शाह शोहराबुद्दीन केस से बरी कर दिए गए थे। जिस पर आज भी कई सवाल अनुत्तरित हैं।

जजों का इस तरह सड़क पर आना मुल्क को चेतावनी दे रहा है। मेडिकल कालेज और जज लोया की सुनवाई के मामले में गठित बेंच ने जजों को अपना फ़र्ज़ निभाने के लिए प्रेरित किया है या कोई और वजह है, यह उन चार जजों के जवाब पर निर्भर करेगा।

सूत्रों की मानें तो बेंच के गठन और रोस्टर बनाने के मामले ने इन चार जजों के मन में आशंका पैदा की और उन्होंने अपने मुल्क से सत्य बोल देना का साहस किया है।

अब बड़ा सवाल यही है कि क्या बेंच का गठन कार्यपालिका (सत्ताधारी हुकुमत) की प्राथमिकता और पसंद के आधार पर हो रहा है?

इलाहाबाद: सड़क पर उतरे हजारों छात्र, न्यायिक सेवाओं में हिन्दी माध्यम के छात्रों के साथ भेदभाव का आरोप

120 महिलाओं को देहव्यापार से मुक्त कराकर, नेहरू जन्मस्थान पर लगा कलंक मिटाने वाले कर्मयोगी ‘सुनील चौधरी’

गोरखपुर महोत्सव में सम्मानित होने वालों में एक भी OBC-SC नहीं, OBC आर्मी ने CM पर लगाया जातिवाद का आरोप

नोटबंदी के बाद PM के ‘मित्र’ उद्योगपतियों की संपत्ति में भारी इजाफा, अडानी की 125,अंबानी की 80 फीसदी बढ़ी

धर्म की चासनी में लपेटकर योगी सरकार ने दिया OBC को धोखा, सचिवालय के 465 पदों में OBC की 0 वैकेंसी

Related posts

Share
Share