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एबीपी न्यूज के सांडिल्य जी उत्तर प्रदेश को क्यों दिलाना चाहते हैं पिछड़ों से मुक्ति !

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

चुनाव के समय में तथाकथित निष्पक्ष कहे जाने वाले चैनलों के न्यूज रूम में राजनीतिक खेमेबंदी हो ही जाती है. इस खेमेबंदी में स्पष्ट है जो बीजेपी का अंधभक्त है वो देशभक्त भी है साथ में निष्पक्ष पत्रकार भी. लेकिन जो नीतीश कुमार, मायावती, लालू यादव, अखिलेश यादव के सपोर्टर हैं वो सभी देशद्रोही हैं और उनकी पत्रकारिता भी संदिग्ध है, वो जातिवादी लोग हैं.

नीचे जो लिंक दी गई है उसका मकसद किसी को बदनाम करने का नहीं बल्कि खुद को निष्पक्ष बताकर किसी ओबीसी, एससी-एसटी के पत्रकार की सोच और मानसिकता पर सवाल उठाने वाले पत्रकारों की जातिवादी मानसिकता सामने लाने का है

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एबीपी न्यूज के ही भूमिहार उत्कर्ष सिंह के बाद भूमिहार मनीष सांडिल्य की टिप्पणी देखिए. ये टिप्पणी उत्तर प्रदेश चुनावो में बीजेपी की धमाकेदार जीत यानि 11 मार्च को की गई थी. जिसे बाद में मनीष ने साथियों के दवाब के बाद हटा लिया. अब आप सोचिए एबीपी न्यूज के डेस्क पर काम करने वाले मनीष सांडिल्य खबरों के साथ कैसे न्याय कर पाते होंगे क्या वैसे ही जैसे राजस्थान के जस्टिस एमसी शर्मा लोगों के साथ करते होंगे.

हैरान करने वाली बात ये है कि जातिवादी उत्कर्ष सिंह और मनीष शांडिल्य जैसे दलित और ओबीसी को गाली देने वाले लोग जातिवाद का जहर बोते भी हुए नौकरी पा जाते हैं. क्योंकि तथाकथित मुख्यधारा का मीडिया ऐसे ही जातिवादियोंं का अड्डा बना हुआ है. जैसे ही आपने आऱक्षण के खिलाफ लिखा दलित और ओबीसी को गाली दी आप तो इनकी आंख का तारा बन जाएंगे. फिर क्या बुलाकर पूरे सम्मान के साथ एक जातिवादी पुरोधा अपने सिपाही को ट्रेनिंग देने के लिए नौकरी पर रख लेता है.

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ये खबर अपने जातिवादी गिरोह में इन दोनों को स्थापित कर देगी- 

हम ये भी जानते हैं कि इस खबर से मनीष शांडिल्य या उत्कर्ष सिंह जैसे लोग अपने जातिवादी गिरोह में हिकारत नहीं बल्कि इज्जत की नजर से देखें जाएंगे. . कोई दलित ओबीसी अपनी समस्या या मुद्दे फेसबुक पर लिखे तो उसे संस्थानों में नौकरी मिलना मुश्किल हो जाता है. लेकिन ऐसे जातिवादी लोगों को तो जातिवादी सरगना टाइप के संपादक अपनी सेना का सच्चा सिपाही मानते हुए तुरंत नौकरी से पुरस्कृत करते हैं ये लंबा खेल सालों से चला आ रहा है.

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