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क्या पत्रकारों को आवास भी जाति देखकर बांटे गए CM साहब ! सूची से दलित, पिछड़े, मुस्लिम गायब

लखनऊ, नेशनल जनमत ब्यूरो।

धर्म की अफीम खिलाकर और अखिलेश सरकार को जातिवादी बताकर सत्ता में आने वाली योगी सरकार पर सत्ता में आते ही सवर्णवाद के आरोप लगने शुरु हो गए थे। अब सरकार ने अपने जातिवादी एजेंडे को विस्तार देते हुए पत्रकारों को भी इसमें समेट लिया है।

इस बारे में ओबीसी आर्मी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर आरोप लगाए कि मलाईदार पोस्टिंग, सरकारी नियुक्तियों, ठेके और थानों में योगी सरकार की प्राथमिकता ठाकुर जाति है, इसके बाद बचे पद ब्राह्मणों और अन्य सवर्णों में बांटे जा रहे हैं।

इसके पहले सरकारी वकीलों की नियुक्ति में भी योगी सरकार पर ठोककर जातिवाद करने के आरोप लगे थे, इसके बाद सहायक अभियोजन अधिकारी (एपीओ) पद पर भी सरकार का जातिवादी रवैया खत्म नहीं हुआ।

अब पत्रकारों के आवास में भी जातिवादी खेल- 

अब सरकार पत्रकारों के आवास आवंटन में भी अपने एजेंडे से टस से मस नहीं हुई है। सरकार ने अपना जातिवादी रवैया बरकरार रखते हुए मान्यता प्राप्त पत्रकारों के आवास आवंटन में ओबीसी, एससी, एसटी और मुस्लिम पत्रकारों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया है।

सूत्रों के हवाले से मिली जानकारी के अनुसार राज्य मुख्यालय पर मान्यता प्राप्त पत्रकारों की पहली आवास आवंटन की बैठक में 11 पत्रकारों के नाम मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अनुमति से आवास आवंटित करने के लिए अनुमोदित किए गए हैं।

इस बारे में ओबीसी आर्मी का कहना है कि जातिवाद मिटाने के नाम पर भगवा सरकार ओबीसी-एससी को ही हर जगह से मिटा देना चाहती है।

आप खुद पत्रकारों के नाम पढ़िए- 

गिरीश पाण्डेय, राजेश तिवारी, रतीश त्रिवेदी, राजीव ओझा, प्रेम शंकर मिश्रा, राजेन्द्र सिंह, राकेश कुमार सिंह, विशाल रघुवंशी, अनामिका सिंह, विशाल प्रताप सिंह, सचिन मुदगल।

नेशनल जनमत इनमें से किसी पत्रकार पर उंगली नहीं उठा रहा लेकिन सरकार की नियत पर जरूर सवाल खड़े होते हैं।

क्या वंचित वर्ग से सरकार के पैमाने में एक भी मान्यता प्राप्त पत्रकार आवास के लिए उपयुक्त नहीं है ?

सरकार ने ओबीसी,एससी,एसटी या मुस्लिम वर्ग के अन्य जरूरतमंद और काबिल पत्रकारों को किस आधार पर दरकिनार कर दिया ?

11 पत्रकारों का चयन किस योग्यता के आधार पर किया गया ? जो उनको अन्य पत्रकारों से अलग करती है?

अगर सरकार को अपने चहेते को आवास देने थे तो अन्य पत्रकारों को देने के लिए आवासों की संख्या भी बढ़ाई जा सकती थी।

किन पत्रकारों को मिलते हैं सरकारी आवास- 

सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग उत्तर प्रदेश द्वारा राज्य मुख्यालय यानि लखनऊ में मान्यता प्राप्त सम्पादकों, उपसम्पादकों तथा कार्यरत पत्रकारों, जो पूर्णकालिक रूप से लखनऊ में सेवारत हों, जिनके समाचार पत्रों के पंजीकृत कार्यालय लखनऊ में स्थापित हों को राज्य सम्पत्ति विभाग के अधीन सरकारी आवासों का आवंटन किया जाता है।

यह व्यवस्था 21 मई 1985 में पत्रकारों की आवास संबंधी दिक्कत को देखते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने शुरू की थी जो आज तक उसी शासनादेश के हिसाब से जारी है।

कौन तय करता है आवास आवंटन ?

पत्रकारों के आवास आवंटन की समिति में प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री अध्यक्ष, सूचना निदेशक, राज्य सम्पत्ति अधिकारी सदस्य होते हैं जो बैठक करके पत्रकारों के नाम तय करते हैं।

लेकिन सभी सरकारों में छुपे रास्ते से सत्ता से नजदीक पत्रकार आवास पाने में सफल होते हैं और जरूरतमंद पत्रकार अपनी बारी का इंतजार करते रह जाते हैं।

सीधे नाम मुख्यमंत्री या उनके प्रमुख सचिव तक पहुंचा दिए जाते हैं और पत्रकारों को सत्ता के करीबी होने का लाभ मिलते हुए आवास मिल जाते हैं।

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