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पढ़िए , दलित राष्ट्रपति का घातक दांव और आडवाणी के साथ हुआ अन्याय

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो।

भाजपा ने राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद को मैदान में उतार दिया है. भाजपा द्वारा दलित को राष्ट्रपति के उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतारने की सर्वत्र चर्चा है. भाजपाई ये कहकर अपनी पीठ खुद ठोक ले रहे हैं कि भाजपा ने एक दलित को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है तो बहुजन संगठन ये कह रहे हैं कि राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार दलित नहीं अम्बेडकरवादी होना चाहिए.

खैर इस मामले में भाजपा के संस्थापक सदस्य रहे लाल कृष्ण आडवाणी के साथ हो रहे भेदभाव की भी चर्चा हो रही है. प्रख्यात सामाजिक चिंतक और द ग्रेट बहुजन चिंतक के रूप में जाने जाने वाले एच.एल. दुसाध इस मामले में आडवाणी के प्रति हमदर्दी दिखाते हुए उनकी तुलना विवेकानंद से करते हैं जिन्हें सिर्फ ब्राह्मण न होने के कारण किसी पीठ का शंकराचार्य नहीं बनाया गया. आप भी पढ़िए द ग्रेट बहुजन चिंतक एच.एल दुसाध राष्ट्रपति पद को लेकर आडवाणी की स्थिति पर क्या टिप्पणीं करते हैं…आप भी पढ़िए…

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भाजपा ने एक तीर से कई निशाने साधते हुए एक ऐसे दलित को राष्ट्रपति पद का उम्म्मीदवार बना दिया है जिनका दलित अधिकारार्जन की लड़ाई में कोई खास योगदान नहीं है. इस क्रम में शक्ति के स्रोतों में दलितों की भागीदारी का मुद्दा पृष्ठ में जाना तय सा दिख रहा है.बहरहाल भाजपा ने दलित राष्ट्रपति का जो घातक दांव चला है, उससे सबसे ज्यादा अन्याय आडवाणी के साथ हुआ है . आडवाणी का भाजपा के उत्थान में जो योगदान रहा , अव्वल तो उन्हें प्रतिदान में पीएम का पद मिलना चाहिए था,जिससे उन्हें वर्षों पहले षड्यंत्र करके वंचित कर दिया गया. इसे लेकर लम्बे समय से भारी संख्यक लोगों में उनके प्रति हमदर्दी का भाव था. ऐसे लोगों को लगा था कि भाजपा अंततः उन्हें राष्ट्रपति पद का उमीदवार घोषित कर अपने पापों का प्रायश्चित करेगी.किन्तु भाजपा ने दूरगामी स्वार्थवश उनकी जगह संघ से ही जुड़े एक दलित को उम्मीदवार घोषित कर दिया. इस क्रम में उसने उनके अवदानों का प्रतिदान देने का शेष अवसर भी गवां दिया.

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बहरहाल जब –जब इतिहास के कुछ खास अवसरों पर आडवाणी की उपेक्षा हुई ,मुझे रियल हिन्दू ह्रदय सम्राट विवेकानन्द याद आये और मैंने हर बार उन्हें ‘हिंदुत्व की राजनीति का विवेकानंद ‘ कह कर अफ़सोस जताया. वास्तव में आडवाणी की तूलना किसी हिन्दू हीरो से हो सकती है तो सिर्फ और सिर्फ विवेकानंद से .विवेकानंद ही वह असाधारण हिन्दू हीरो थे जिन्होंने शिकागो के ‘विश्व धर्म सम्मलेन’ में हिन्दू धर्म जैसे सड़े-गले व सबसे अमानवीय धर्म को चैम्पियन बनवाने का असंभव सा कार्य अंजाम दिया. उनके उस कार्य का न्यूनतम प्रतिदान उन्हें किसी धाम का शंकराचार्य बना कर दिया जा सकता था.लेकिन ब्राह्मणों ने ऐसा होने नहीं दिया. क्योंकि तमाम खूबियों के बावजूद विवेकान्द में एक कमी थी,वह शुद्र थे, ब्राह्मण नहीं.

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सिर्फ शुद्र होने के नाते ही वे धर्म के क्षेत्र के सर्वोच्च पद से वंचित कर दिए गए.विवेकानंद के प्रायः सौ साल के बाद इतिहास ने फिर खुद को दोहराया. आडवाणी ने भाजपा जैसी चरम बहुजन व राष्ट्र-विरोधी पार्टी के हाथ देश की बागडोर देने का असंभव सा कार्य अंजाम दे डाला.उनके इस कार्य का न्यूनतम प्रतिदान प्रधानमंत्री पद था .किन्तु वह पद गया उनके ही आन्दोलन को दूर से निहारते रहने वाले एक अकर्मण्य ब्राह्मण के हाथ में. ऐसा इसलिए हुआ कि अडवाणी वीर विवेक की तरह ही अब्राह्मण रहे और संघ पर कुंडली मारे बैठे ब्राह्मणों को उनके जैसे व्यक्ति को योग्य सम्मान देना मुमकिन नहीं. बहरहाल तमाम हालात पर विचार करने के बाद अब निर्णायक रूप से कहा जा सकता है कि सचमुच अडवाणी हिंदुत्व की राजनीति के विवेकानंद हैं.

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