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आनंदपाल सिंह प्रकरण के बहाने राजपूत, जाटों से नहीं ब्राह्मण वर्चस्व से अपना हिस्सा मांग रहे हैं

नई दिल्ली। नेशनल जनमत 

राजस्थान का एक चर्चित गैंगस्टर जिसको ओबीसी में शामिल रावणा राजपूत अपनी मसीहा बताकर सड़कों पर उतर आई है। पूरे राजस्थान में राजपूत समाज के लोग आनंदपाल सिंह एनकाउंटर के बाद सक्रिय हैं और राजपूत एकजुटता दिखाकर बीजेपी सरकार के प्रति हमलावर हैं।

इस सारे बवाल के बीच कई तरह की बातें निकलकर आईं राजपूत समाज का मानना है कि आनंदपाल सिंह का एनकाउंटर सरकार की साजिश है इसकी सीबाआई जांच करवाई जाए। दूसरी तरफ युवा राजपूत आनंदपाल सिंह को मसीहा बताकर बीजेपी सरकार चुनाव में देख लेने की धमकी दे रहा है।

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इस बारे में पड़ताल की राजस्थान के स्वतंत्र पत्रकार जितेन्द्र महला ने –

गैंगस्टर आनंदपाल सिंह  के मामले में जो धारणाएं बनाने की कोशीश हुई उनकी पड़ताल करते हैं. सबसे पहले उन धारणाओं को देखते हैं. पहली धारणा है कि करणी सेना के लोगों ने जाटों के खिलाफ सोशल मीडिया में वीडियो संदेशों के जरिये ज़हर घोल कर पूरे मामले को जाट बनाम राजपूत बनाने की कोशिश की है. दूसरी धारणा में राजपूतों ने आनंदपाल सिंह के मामले में मानवाधिकार की बात करते हुये न्याय के पक्ष में दिखने की कोशिश की है।

दोनों धारणायें झूठी हैं, ग़लत हैं- 

पहली धारणा के ज़रिये करणी सेना और राजपूत समुदाय के लोगों ने अपनी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक कुंठा को साधने की कोशिश की है. हम सब जानते हैं कि आज़ादी के बाद राजपूतों की राजशाही चली गई. उनकी आर्थिक और राजनैतिक ताकत में ज़ोरदार गिरावट आई. शिक्षा और नौकरियों में वे तेजी से पिछड़ें क्योंकि वक्त के साथ ख़ुद को बदल लेने में वे पीछे रहे .

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दरअसल, सवर्णों के अंदर  ब्राह्मणों और बनियों की सामाजिक और आर्थिक ताकत आज़ादी के बाद भी कई गुना तेजी से बढ़ी. गांधी और नेहरू की जोड़ी ने ब्राह्मण और बनियों को हर क्षेत्र में आगे बढ़ाया. ब्राह्मण हर राजनैतिक पार्टी के शिखर पर बैठ गये और आरएसएस तो ब्राह्मण संगठन है ही.

सवर्णों की मलाई ब्राह्मण-बनियों के हिस्से में आई- 

ब्राह्मणों ने मंदिरों, त्योहारों, व्रतों, यज्ञों, स्कूलों में ब्राह्मणवादी कर्मकांडों के जरिये समाज में ओर मजबूती हासिल की. ठीक इसी तरह बनिये गांधी के स्वदेशी का नारा लगाते हुये और चरखा कातते हुये, देखते ही देखते बजाज, बिड़ला, तापड़िया, गोयनका, सिंघानिया जैसे ब्रांड बन गये. कुल मिलाकर सवर्णों के अंदर ब्राह्मण-बनिया जोड़ी मज़े में हैं.

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राजपूतों को राजशाही के जाने के बाद भी दंभ बना रहा- 

राजपूतों की राजशाही चली गई. राजपूतों की बड़ी संख्या अब भी गांवों में हैं. वे शिक्षा में ध्यान नहीं दे पाए. दूसरी तरफ ब्राह्मण-बनिये शहरों में हैं और अंग्रेजी स्कूलों में अपने बच्चों को पढ़ाते हैं. सवर्ण एक तरफ नोकरियों में गैरलोकतांत्रिक तरीकेसे पचास फीसदी हिस्सा घेर लेते हैं, लेकिन सवर्णों के अंदर यह हिस्सा ब्राह्मण खा जाते हैं और बचा-खुचा राजपूतों को मिलता है.

ले दे के जिस राजपूत समुदाय ने हमेशा अपने हक़ से ज्यादा खाया, अब सवर्णों के अंदर उनकी हालात बहुत पतली है. राजस्थान में भैरोंसिंह शेखावत के बाद पिछले दो दशकों में राजपूत कुंठित हो चुके हैं, वे ब्राह्मण-बनियों से अलग भी नहीं होना चाहते और सीधे-सीधे भिड़ंत भी नहीं चाहते. इसीलिए राजपूत जाटों को सामने करके ब्राह्मण-बनियों से लड़ रहे हैं.

आरएसएस-बीजेपी में अपना हिस्सा मांग रहे हैं- 

वे आरएसएस और बीजेपी से अंदर ही अंदर मोलभाव कर रहे हैं. वे इस बहाने राजपूतों को एक बार फिर लामबंद कर रहे हैं. वे राजस्थान में अपनी खोई हुई हैसियत के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन वे सवर्ण गठजोड़ के अंदर अभी बने रहेंगे क्योंकि अभी वे जाति के ज़हर को नहीं जानते और परिपक्व भी नहीं हैं. वे अभी ब्राह्मणवाद के हाथों ओर ठगे जाएंगे.

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जाटों का इस मामले से कोई लेना देना नहीं है. जाटों को समझना चाहिये कि आज़ादी के पूर्व के तीन दशकों में जाटों ने राजपूतों से तगड़ा संघर्ष किया, वे सामंतवाद उर्फ़ जातिवाद के ख़िलाफ ख़ून देकर लड़े, लेकिन जब आज़ादी के बाद सरकार बनी तब ब्राह्मण-बनियों और राजपूतों की पार्टी कांग्रेस ने जाटों को निकाल बाहर किया.

जाटों की राजपूतों से कोई टक्कर नहीं- 

मेरे हिसाब से इस समय जाटों की राजपूतों से कोई टक्कर नहीं है. राजपूत तो ख़ुद अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. जाटों को अगर लड़ना है तो ब्राह्मण-बनिया गठजोड़ से लड़ें क्योंकि देश के तमाम क्षेत्रों में इन्होंने गैरलोकतांत्रिक क़ब्जा बना रखा है. राजस्थान में दोनों ब्राह्मणवादी पार्टियां बीजेपी और कांग्रेस ब्राह्मण-बनिया गठजोड़ से चल रही हैं.

जाटों को यदि राजनीति और अर्थव्यवस्था में हिस्सा लेना है तो उन्हें ब्राह्मण-बनिया जोड़ी के ख़िलाफ लामबंद होना ही होगा. वरना वे फिर ब्राह्मणवादियों के हाथों ठगें जायेंगे क्योंकि ब्राह्मणवादी साज़िशन ख़ुद कभी सामने नहीं आते, अपने पायदों को सामने कर देते हैं.

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आनंदपाल केस की सीबीआई जांच- 

आनंदपाल सिंह मामले में दूसरी धारणा यह है कि राजपूत एनकाउंटर को सही और ग़लत के सवालों में लाते हुये न्याय के पक्ष में खड़े होते हुये दिखना चाहते हैं और एनकाउंटर की जांच के लिए सीबीआई जांच की मांग कर रहे हैं.

राजपूतों की यह बात ज़ायज है कि अगर एक समुदाय को लगता है कि एनकाउंटर फर्जी है तो फिर ज़रूर सीबीआई जांच होनी ही चाहिए. हम भी सीबीआई जांच की मांग का न्याय के लिए समर्थन करते हैं, लेकिन राजपूतों की परंपरा न्याय के साथ खड़ें होने की नहीं, उन पर संदेह है.

सती रूपकंवर का जश्न मनाते हैं न्यायप्रिय राजपूत- 

राजपूत 1987 में सीकर के देवराला में रूपकंवर सती प्रकरण में जश्न मनाते हैं और न्याय और इंसानियत के लिए शर्मिंदगी का सबब बन चुके देवराला सती कांड के तमाम आरापियों को अपने समुदाय के बड़े नेता बना देते हैं. जो राजपूत आज भी सती और ज़ौहर जैसी इंसानियत के लिए शर्मिंदा परंपराओं पर गौरव करते हैं. उन्होंने आज तक मासूम रूपकंवर से माफ़ी नहीं मांगी.

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वे न्याय के साथ खड़ें होंगे, यह अभी मुमकिन नहीं है.

अभी वे उत्तरप्रदेश में योगी के उदय के बाद सवर्णों के अंदर मोल-भाव कर रहे हैं. वे ब्राह्मण-बनियों से मोल-भाव कर रहे हैं. वे राजपूतों को लामबंद कर रहे हैं.

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