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पत्रकार से किसान बने, बंपर पैदावार भी की, सरकारी नीतियों से 3 लाख के घाटे में गए शख्स की कहानी

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

दिल्ली के प्रतिष्ठित अखबार की पत्रकारिता छोड़कर खेती-किसान करने गांव गए आशुतोष बेहतर फसल  उगाने के बाद भी इन दिनों परेशान हैं. वह लगातार बैंकों के चक्कर लगा रहे हैं. उनकी चिंता यह है कि अगली फसल के लिए पैसों का बंदोबस्त कैसे हो. वह उन युवाओं की जमात में हैं, जिन्होंने मोटी सैलरी का लोभ छोड़कर छत्तीसगढ़ के कवर्धा में आधुनिक तरीके से खेती शुरू की थी लेकिन फिलहाल सरकारी नीतियों के कुचक्र में फंस चुके हैं.

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तीन एकड़ में उगाई फसल- 

आशुतोष गुप्ता ने पिछले खरीफ सीजन में 3 एकड़ में टमाटर की पैदावार की. मौसम अनुकूल रहा, टमाटर की पैदावार भी बंपर हुई. लेकिन सीजन खत्म होने के बाद वह 3 लाख रुपये से ज्यादा के घाटे में हैं. वह अपने नुकसान को लेकर तो परेशान तो हैं ही लेकिन पत्रकार होने के नाते उनकी असल चिंता यह है कि सरकार और अफसरों के पास खेती को आगे बढ़ाने का कोई पुख्ता रोडमैप नहीं है. उनका कहना है कि किसानों को बजट में कर्ज नहीं, बल्कि उनके उत्पाद की सही कीमत चाहिए.

जमा पूंजी खेत खरीदने में लगा दी- 

आशुतोष बताते हैं कि मेरे पास जो भी जमा पूंजी थी, उसे मैंने शुरुआत में खेत खरीदने और उन्हें तैयार करने में लगा दी. खरीफ सीजन में मैंने बैंक से लोन लेकर 3 एकड़ में टमाटर और इतने ही एरिया में केला लगाया. टमाटर में मुझे 3 लाख से ज्यादा का नुकसान हुआ है। पिछले दिनों आई तेज आंधी ने केले के आधे पेड़ों को भी गिरा दिया है। केले की पैदावार से भी मुझे ज्यादा आस नहीं है.

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अब मेरी फिक्र है कि मैं कैसे अगली फसल की तैयारी करूं. बैंक से मैंने पहले ही लोन ले रहा है, जो अब और लोन देने को तैयार नहीं हैं. अभी खेतों से इतना पैसा भी नहीं निकल रहा कि मैं मजदूरों को उनका मेहनताना दे सकूं. बैंक अफसर कहते हैं कि पुराने लोन का कुछ हिस्सा चुकाओ तभी वह नया लोन दे पाएंगे, अब भला मेरे पास पैसा होता तो मैं बैंकों के चक्कर क्यों काटता.

किसानों को सिर्फ वोट बैंक समझते हैं नेता- 

कभी दिल्ली में इकनॉमिक टाइम्स अखबार में नौकरी करने वाले आशुतोष बताते हैं, ‘किसानों के लिए बड़े-बड़े दावे करने वाले नेताओं और अफसरों को खेती की कोई फिक्र नहीं है. वह किसानों को केवल वोटबैंक समझते हैं।’ उनका कहना है कि किसानों की कमाई को लेकर जो दावे किए जाते हैं, हकीकत उससे कहीं दूर है. सरकार किसानों की कमाई दोगुनी करने की बात तो करती है, लेकिन उस समय हमारा दर्द कोई नहीं महसूस करता, जब हम अपनी पैदावार सड़कों में फेंकने को मजबूर होते हैं.

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लागत के मुताबिक मूल्य ना मिलने से हुआ घाटा- 

उनके मुताबिक, किसानों को मौसम, फसलों को लगने वाली बीमारियों और पैसों के बंदोबस्त के साथ कई मोर्चों पर जूझना पड़ता है. उनका कहना है, असल समस्या यह है कि किसानों को उनकी पैदावार का ठीक दाम नहीं मिलता. वह खरीफ सीजन में बड़ी मुश्किल से अपने खेतों से निकले टमाटर की खेप को 35-40 रुपये क्रेट (एक क्रेट में करीब 25 किलो टमाटर आते हैं) में बेच पाएं हैं. उन्हें कई क्रेट टमाटर फेंकने भी पड़े हैं. आशुतोष का कहना है कि कई बार ऐसा भी होता है कि जब हम माल-भाड़ा लगाकर अपनी फसल को मंडी तक ले जाते हैं, लेकिन वहां पहुंचकर हमें पता लगता है कि बिकने वाली पैदावार से माल-भाड़ा भी नहीं निकलने वाला, तब बड़ी मायूसी होती है.

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