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क्या छात्रों को जातिगत काम की स्किल देने का आइडिया मोदीजी को ‘चालाक ब्राह्मण’ तिलक से मिला है !

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

उच्च शिक्षा में लगातार हो रहे बदलावों का सीधा असर वंचित वर्ग के छात्रो पर पड़ रहा है और आगे भी पड़ेगा. हालिया समय में यूजीसी ने पीएचडी और नेट में बढ़ रही ओबीसी-एससी- एसटी छात्रों की संख्या को देखते हुए नियमों में चालाकी से बदलाव करते हुए सीटें कम कर दीं, पीएचडी के लिए नेट जरूरी कर दिया और शिक्षक कितने छात्रों को पीएचडी करा सकते हैं यह भी सीमित कर दिया. अब पढ़े-लिखे उच्च शिक्षा पाए छात्रों से कहा जाएगा कि स्किल इंडिया अभियान के तहत जो कार्य आपके घर में पुस्तैनी तौर पर हो रहा है हम उसे ही निखारेंगे।

इस बहस के बीच फेसबुक पर सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता और वरिष्ठ पत्रकार सत्येन्द्र पीएस ने के फेसबुक वॉल को पढ़कर लगा कि अच्छा जो तिलक बोलता था वही बात तो आज स्किल इंडिया के तहत सरकार कर रही है. कुर्मी को खेती, लोहार को लोहा, बढ़ई को लड़की और तेली को तेल निकालने का काम ही तो स्किल इंडिया सिखाएगा.

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पढ़िए सत्येन्द्र पीएस का ये शानदार लेख-

तिलक ने किया था कुनबी (कुर्मी), तेली, लोहार की शिक्षा का विरोध- –

बाल गंगाधर तिलक ने “कुनबी”तेली-तमोली बच्चों को शिक्षा देने का विरोध किया था. उन्होंने कहा कि लिखने, पढ़ने और इतिहास, भूगोल और गणित जानने का उनके व्यवहारिक जीवन में कोई मतलब नहीं है। उन्होंने कहा कि यह उनकी बेहतरी से ज्यादा उनके लिए हानिकारक होगा।

15 मई 1881 को उन्होंने मराठा अखबार में “अवर सिस्टम आफ एजुकेशन : ए डिफेक्ट एंड क्योर ” शीर्षक से लिखा,

” आप किसान के लड़के को हल जोतने, तेली को तेल निकालने, लोहार के बेटे को धौंकनी से, मोची के बेटे को सूआ के काम से पकड़कर आधुनिक शिक्षा देने के लिए ले जाएंगे, और लड़का अपने पिता के पेशे की आलोचना करना सीखकर आएगा। उसे अपने खानदानी और पुराने पेशे में बेटे का सहयोग नहीं मिलेगा। ऐसा करने पर वह लड़का रोजगार के लिए सरकार की तरफ देखेगा. आप उसे उस माहौल से अलग कर देंगे जिससे वह जुड़ा हुआ है, खुश है और उनके लिए उपयोगी है, जो उन पर निर्भर हैं। उनकी बहुत सी चीजों से आप उन्हें दूर कर देंगे।”

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यही से निकला है स्किल इंडिया का आइडिया-

तिलक ने इस बात पर भी जोर दिया कि अन्य बच्चों के लिए जो पाठ्यक्रम है वह कुनबी बच्चों के लिए अनुपयोगी है. उन्हें वही विषय पढ़ाए जाने चाहिए जो उनकी जीविका के लिए जरूरी है। उन्होंने गाँवों में बढ़ई, लोहार, दीवाल जोड़ने वाले मिस्त्री, और दर्जी के लिए टेक्निकल स्कूल खोलने की सलाह दी। अभी की सरकार भी स्किल इंडिया के नाम पर यही कर रही है.

वंचितों को स्कूली शिक्षा देने पर अंग्रेजों की आलोचना-  

तिलक ने अंग्रेज सरकार के स्कूल खोलने और किसान के बच्चों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने की कोशिशों की आलोचना करके हुए अपनी पुस्तक में लिखा है कि-

” स्कूलों में कुनबी बच्चों की हाजिरी सुनिश्चित करने के लिए सरकार ने बाद में प्राइमरी स्कूलों को राजस्व अधिकारियों के नियंत्रण में दे दिया। उन्हें खेती करने व अन्य पेशे में लगे लोगों के बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रोत्साहित करने का काम करना था।लेकिन किसी ने यह जानने की कोशिश न की कि इस जोर जबरदस्ती करने का क्या फायदा है और इससे लाभ की जगह हानि ज्यादा हो रही है। ”

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कुनबियों को शिक्षा देना धन की बर्बादी है- 

तिलक ने कहा कि कुनबी बच्चों को शिक्षा देना धन की बर्बादी है। वह धन बर्बाद किया जा रहा है जो करदाताओं से लिया जाता है। इस शिक्षा का समाज के एक ख़ास तबके पर बुरा असर पड़ रहा है। बंगाल में भी भद्रलोक ने तिलक का साथ देते हुए निचली जातियों को अंग्रेजी शिक्षा दिए जाने का विरोध किया। तमाम लोगों को यह चिंता होने लगी कि निम्न जाति के लोग ज्यादा मजदूरी, समानता और उन नौकरियों की मांग करने लगेंगे, जो भद्रलोक करता है।

पुस्तक #फाउंडेशन और तिलक नेशनिज्म पेज नम्बर 139,140 से

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