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बस में लटकती नागार्जुन की 4 गुलाबी चूड़ियां और निर्भया कांड….अनिता जयसवाल की ममस्पर्शी कहानी

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

स्त्री-पुरुष, समानता-असमानता की बड़ी-बड़ी बातों के बीच आज भी हमारे हर आंगने में ऐसे उदाहरण मिल ही जाते हैं। जब लड़के को हम लड़की के ऊपर तरजीह  देते हैं। भले हीं वो स्कूली शिक्षा हो या खानपान कहीं ना कहीं पढ़े लिखे समाज में लोग फर्क तो कर ही देते हैं। ऊपर से लड़कियों को दहेज की वजह से बोझ समझना जाना।

हिन्दी के बड़े कवि बाबा नार्गाजुन ने लिखी थी एक कविता –

गुलाबी चूंड़ियां

प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!
सामने गियर से उपर
हुक से लटका रक्खी हैं
काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी……

इस कविता को दिल में संजोए महिला सशक्तिकऱण को लेकर  उठ रही बहुत सी आवाजों के बीच घर में रहकर ही अपने शौक के लिए लेखन करने वाली अनिता जयसवाल ने ये आंख खोलने वाली मम स्पर्शी कहानी लिखी है आप भी पढ़िए-

पीली चप्पल गुलाबी क्यों नहीं- 

अनिता जयसवाल

रिक्शे के दोनों पहियों को जोड़ने वाली रॉड पर लटकते नन्हे पैर की वो पीली चप्पल ! देखकर मुझे ‘बाबा नागार्जुन’ की कविता “गुलाबी चूड़ियां” याद आ गई । लेकिन क्यों !? ये पीली चप्पल, और वो चूड़ियां गुलाबी !

पीली चप्पल रिक्शेवाले के बेटे की होंगी ,बेटी की नहीं ! रंगों को भी तो बांट लिया है स्त्री-पुरूषों ने अपने अधिकारों की तरह ही । उन गुलाबी चूड़ियों की कलाई जितनी ही उम्र होगी इस पीले चप्पल के पैरों की। ये चप्पल गुलाबी नही हो सकती थीं क्या ? नहीं, बिल्कुल नहीं !

बेटी और  दहेज का अभिशाप- 

रिक्शे वाले के घर में कहां होंगी बेटियां, वो भी तो ले गया होगा अपनी गर्भवती पत्नी को मुहल्ले की उस दीदी के पास जो किसी बड़े डॉक्टर के यहां नर्स है पिछले तीन सालों से।  उस दीदी ने भी तो 5-6 हज़ार में ही उतार दिया होगा बेटी रूपी बोझ को गर्भ में ही काट कर !

उन कटे हुए बेटी के टुकड़ों को काली पॉलॉथिन में, यमुना नदी या नाले में फेंकने जाते हुए रिक्शेवाले ने भी तो रात के अंधेरे में रुंधे गले और भीगी पलकों से देखे होंगे सपने. अपने आने वाले बेटे के भविष्य के और कुछ ऐसे शब्दों में ही तो तसस्ली की होगी- ‘मेरा बेटा खूब पढ़ेगा-लिखेगा ताकि पाल सके एक प्यारी बेटी भी.

वो दे सके अपनी बिटिया को दहेज और करवा से उसका ब्याह अच्छे घर में !’ इन्हीं शब्दों से ही तो दिया होगा दिलासा एक पिता ने अपने दिल को. और लौट कर जब पोंछे होंगे आंसू अपनी पत्नी के तब उसकी पत्नी ने भी दिया होगा दिलासा उसे कुछ ऐसा ही कहते हुए-  ‘अब जो बेटा होगा उसकी पत्नी को नही जाने देंगे हम कोठियों की सफाई करने की मज़बूरी में उन कोठियों के बिस्तर पर, बेटे की पत्नी को ही घर की बेटी बना लेंगे न। हुआ होगा कुछ ऐसा ही, तभी ये चप्पल पीली है गुलाबी नहीं।

गुलाबी चप्पल और निर्भया की चूड़ियां- 

ये चप्पल अगर गुलाबी होतीं ! रिक्शेवाले को देर रात दिल्ली की सड़कों पर दौड़ती बसों को देखकर याद न आती निर्भया की ? वो डर जाता उन नन्ही गुलाबी चप्पल के पैरों को याद करके।

बाबा , तुमने लिखी तो थी वो कविता। मैंने तो नहीं देखी फ़िर कभी किसी बस में लटकती वो चार गुलाबी चूड़ियां। न तुम्हारे दरभंगा नगर, न कलकत्ता और न दिल्ली शहर में। अब “गियर के ऊपर हुक” तो नहीं होती आजकल की बसों में पर हाँ सामने छोटा-सा आईना होता है ,जिसमें ड्राइवर बस के पिछले हिस्से में हो रही गतिविधियों को देखता है।

बस उसी में लटका देती अगर फ़िर कोई “मुनिया अपनी अमानत ,अपने अब्बा की नज़रों के सामने ” उस दिन अपनी चार गुलाबी चूड़ियां ….. तो शायद, जो असर दामिनी की चीख में न हो पाया वो असर होता उन चार गुलाबी चूड़ियों की खनक में। जो अन्याय नही देख पाया वो ड्राइवर उस बस के आईने में वो देख लेता उन गुलाबी चूड़ियों में ! उसे याद आती अपनी मुनिया जब टूटती दामिनी के हाथों की गुलाबी चूड़ियां !!!

बाबा आज बहुत याद आती है, तुम्हारी बस में लटकती वो चार गुलाबी चूड़ियां ।

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