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भारत के सभ्य होने की राह में रोड़ा बन चुके अध्यात्म, अंधविश्वास, कर्मकांड का इलाज कैसे संभव है? (पार्ट-2)

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

जानेमाने शोधार्थी और समाज विज्ञानी संजय श्रमण जोठे ने पहले पार्ट में लिखा था कि भारत का अध्यात्म असल में एक पागलखाना है, एक खास तरह का आधुनिक षड्यंत्र है, जिसके सहारे पुराने शोषक धर्म और सामाजिक संरचना को नई ताकत और जिन्दगी दी जाती है.

पहले पार्ट को पूरा पढ़ें-

भारत के सभ्य होने की राह में धर्म, अध्यात्म, अंधविश्वास, कर्मकांड सबसे बड़ी बाधा है ! (पार्ट-1)

अब इससे आगे बढ़कर दूसरे पार्ट में संजय श्रमण जोठे ने इस धर्म, अध्यात्म, कर्मकांड से बचने का तरीका बताया है-

संजय का मानना है कि भारत का धर्म जिस दर्शन से उपजा है और जिस अध्यात्म या रहस्यवाद को महिमामंडित करके आगे बढ़ता है उसकी तरफ कभी गंभीरता से उंगली नहीं उठाई गयी है. हमें धार्मिक कर्मकांडों और पूजा पद्धतियों से आगे बढ़कर इस धर्म के मूल दर्शन पर चोट करनी होगी.

इस दर्शन पर चोट करने से ही हम ओशो रजनीश, आसाराम, निर्मल बाबा, राम रहीम, श्री श्री रविशंकर, जग्गी इत्यादि बाबाओं को रोक सकेंगे जो कि हर पीढ़ी में पुनर्जन्म के जहरीले दर्शन के आधार पर ध्यान समाधी मोक्ष आदि की अन्धविश्वासी व्याख्याएं फैलाते हैं.

शोषक धर्म पर संकट आते ही बाबा पैदा हो जाते हैं- 

ये ध्यान देने लायक बात है कि जब जब भारत के शोषक धर्म पर संकट आता है, इसमें तरह-तरह के बाबा पैदा हो जाते हैं जो क्रान्ति और बदलाव के नाम पर गुमराह करने के लिए खड़े हो जाते हैं. ओशो रजनीश और राम-रहीम जैसे ये बाबा पुराने दर्शन से विज्ञान और पश्चिमी क्रान्ति को जोड़कर ऐसी भयानक सम्मोहनकारी शराब बनाते हैं।

इस शराब से कई पीढियां बाहर नहीं निकल पातीं. आत्मा-परमात्मा और पुनर्जन्म के अंधविश्वास को जस का तस बनाए रखते हुए उसके ऊपर के बेल बूटों में थोड़ा बदलाव करके, पुराने पाखंड का रंग रोगन करके ये पाखंडी बाबा नई पीढ़ियों को फिर से उसी दलदल में घसीट लेते हैं.

ये भयानक रूप से धूर्त और अवसरवादी होते हैं, ये विज्ञान मनोविज्ञान लोकतंत्र साम्यवाद समाजवाद आदि की व्याख्या करते हुए आत्मा परमात्मा को भी महिमामंडित करते जाते हैं और ऐसा आभास पैदा करते हैं कि पुनर्जन्म और कर्म का विस्तारित सिद्धांत इन सब आधुनिक क्रांतिकारी सिद्धांतों के साथ फिट होता है. इसके लिए वे अध्यात्म और रहस्यवाद का सहारा लेते हैं.

पुरानी पूजा और कर्मकांडों के बदले वे आधुनिक पश्चिमी ढंग के नाईट क्लब और नाईट क्लब कल्चर की तरह जगराते, कीर्तन, ध्यान, समाधि आदि के नये कर्मकांडों की रचना करते हैं. युवा वर्ग इससे एकदम से सम्मोहित हो जाता है.

पाखंडी बाबाओं के केन्द्रों की सफलता का कारण- 

अपने परिवारों, गांवों, कस्बों में जाति, वर्ण, अमीर गरीब आदि के विभाजन की चोट से सताए हुए इस युवा वर्ग को इन पाखंडी बाबाओं के ध्यान केन्द्रों और डेरों में थोड़ा अपनेपन और भाईचारे एहसास होता है. इस विभाजित समाज में एकसाथ बैठने, खाने, नाचने का मौक़ा उन्हें पहली बार मिलता है.

इस तरह नई पश्चिमी जीवन शैली के कुछ टुकड़ों को पुरानी जहरीली खुराक में मिलाकर एक नया कहीं अधिक जहरीला काकटेल बनाया जाता है जो पुराने कर्मकांड से भरे धर्म की तुलना में आधुनिक नजर आते हुए भी उससे कही अधिक मारक और भयानक होता है.

इस तरह ओशो रजनीश जैसे ये पाखंडी बाबा धर्म के साथ आधुनिकता को जोड़कर पुराने जहरीले दर्शन को एक नई जिन्दगी दे देते हैं और नये युवाओं, शहरी माध्यम वर्ग और पेशेवरों को फुसलाते हुए उसी सनातन सुरंग में खींच ले जाते हैं.

देश के वंचित वर्ग को सलाह- 

सभी बहुजनों, दलितों, मजदूरों, स्त्रियों, आदिवासियों को मेरी यही सलाह है कि वे धार्मिक कर्मकांड का विरोध करते हुए वहीं तक न रुक जाएं. भारत के पुनर्जन्मवादी अध्यात्म से ध्यान, समाधि, साधना और मोक्ष के नाम पर जितने बाबा और ध्यान केंद्र आदि चल रहे हैं उनसे भी बचकर रहें. ये ध्यान समाधि सिखाने वाले लोग असल में पुराने कर्मकांडीय लुटेरों के ही नये और प्रगतिशील एजेंट हैं.

आप एक बार इनके चंगुल में फंसकर ध्यान समाधि सीखने जाइए, धीरे धीरे ये आपको भूत प्रेत, श्राद्ध, देवी देवता सहित सब तरह की पौराणिक बकवासों का महात्म्य आदि सिखाने लगते हैं और कुछ ही महीनों में अच्छे खासे सुशिक्षित पेशेवर लोग तोते वाले ज्योतिषी की तरह बकवास करने लगते हैं.

ये जहरीले धर्म का नई परिस्थिति में खुद को ज़िंदा बनाये रखने का हथकंडा है. पश्चिमी क्रांतियों के प्रभाव में जीने वाले भारत में धर्म और कर्मकांड अब उतने आकर्षक नहीं रह गये हैं.

अगर धोती या जनेऊ या तिलक कुमकुम लगाने वाला संस्कृत बोलने वाला कोई पंडित खड़ा हो जाए तो उसे सुनने के लिए आज का युवा वर्ग उत्सुक नही होगा. लेकिन वही पोंगा पंडित अगर फेंसी गाउन, चोगे, रोल्स रोयस या मर्सिडीज कार लेकर फाइव स्टार आश्रम में खड़ा हो जाए और इंग्लिश में बात करते हुए फ्रायड, नीत्शे, मार्क्स और डार्विन के तर्क देने लगे तो शहरी मध्यम वर्ग का पेशेवर युवा उससे प्रभावित होने लगेगा. एक बार ये युवा इनके चक्कर में फस जाएँ फिर ये बाबा लोग उन्हें कहीं का नहीं छोड़ते

यही असली खेल है. इस खेल को समझे बिना भारत में बहुजन और स्त्री मुक्ति की कोई संभावना नहीं हो सकती. ये बात भारत के मुक्तिकामियों को गहराई से नोट कर लेनी चाहिए.

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