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बिहार राजनीति: भ्रष्टाचार व अनैतिकता सामाजिक न्याय की राजनीति का जरूरी चरित्र नहीं भटकाव है

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

बिहार में सामाजिक न्याय के नाम पर बना महागठबंधन टूटने के बाद सामाजिक न्याय की राजनीति के पुरोधाओं ने एक स्वर में नीतीश कुमार के कदम को आत्मघाती कदम बताया। भावुकता में लोगों ने अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर लालू यादव की तस्वीर भी लगा दी। इसी बीच एक तबका ऐसा भी है जो सामाजिक न्याय को मानता है लेकिन उसके नाम पर भ्रष्टाचार, परिवारवाद और अनैतिक राजनीति का पक्षधर नहीं है।

ये आवाज उठी तो लेकिन बीजेपी के खिलाफ उठी नफरत ने इस स्वर को ज्यादा उठने नहीं दिया। बिहार के सामाजिक कार्यकर्ता रिंकु यादव लिखते हैं कि –

आईए, दोनों गिरोहों को आईना दिखाने के लिए उठ खड़े होईए-

भ्रष्टाचार व अनैतिकता सामाजिक न्याय की राजनीति का जरूरी चरित्र नहीं है, भटकाव है। बिहार में महागठबंधन के टूटने व भाजपा केे सत्ता में पहुंचने के बाद से भाजपा-जद यू और राजद भ्रष्टाचार व नैतिकता जैसे मसले पर एक दूसरे को आईना दिखा रहे हैं।

नीतीश भ्रष्टाचार के सवाल पर जीरो टॉलरेंस की नीति पर चलने का दावा करते हुए महगठबंधन से अलग हुए हैं। भाजपा तो पहले से ही भ्रष्टाचार के मसले पर ही महगठबंधन की घेराबंदी कर ही रही थी। तो लालू-तेजस्वी भी भाजपा से जुड़े भ्रष्टाचार के साथ ही नीतीश कुमार के एक पुराने हत्या के मामले में शामिल रहने के साथ अभी-अभी दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा जुर्माना लगाने के सवाल को उछाल रहे हैं.

सत्ता पक्ष और विपक्ष ने आईना अपने-अपने हाथों में ले रखा है- 

कहिए तो सत्ता और विपक्ष ने आईना अपने-अपने हाथों में थाम रखा है, लेकिन कोई भी खुद को देखने के लिए तैयार नहीं है, दोनों एक दूसरे को आईना दिखा रहे हैं।

हां,सच दोनों बता रहे हैं और एक ही धरातल पर खड़े हैं। लेकिन भ्रष्टाचार व अनैतिकता जैसा सच दोनों में से किसी के लिए सवाल नहीं है।

महज,एक-दूसरे के खिलाफ औजार है।

हां, हम सब तमाशबीन हैं या फिर इस या उस भ्रष्ट व अनैतिक राजनीति के सुर-ताल में शागिर्द हैं। भ्रष्टाचार जैसा मसला दोनों के लिए फुटबॉल है और हम सब दर्शक हैं,ताली पीट रहे हैं, इसके या उसके पक्ष में खड़े हैं। हम यह छूट दोनों राजनीतिक गिरोहों को दे रहे हैं कि यह कोई मसला ही नहीं रह जाए।

हमारे कॉमनसेंस में यह बात गहरे बैठ जाए कि भ्रष्टाचार व नैतिकता जैसे मसले पर राजनीति की दुनिया में बात मत कीजिए। यह राजनीति का मसला नहीं है। आखिर इस किस्म का कॉमनसेंस किसके पक्ष में जाता है? जनता के पक्ष में तो कतई नहीं और खासतौर से यह बहुसंख्यक बहुजनों के खिलाफ ही जाता है।

क्या भ्रष्टाचार राजनीति का सवाल नहीं रह गया है- 

आखिर क्या सचमुच में भ्रष्टाचार और नैतिकता जैसा सवाल राजनीति का सवाल नहीं रह गया है? क्या इसे हमें नियति मान लेना चाहिए?
खैर,भ्रष्टाचार मसला है और यह शोषित-उत्पीड़ित समूह के लिए महत्वपूर्ण मसला है।

हां,शोषक इसे मसला नहीं बनने देना चाहेंगे,क्योंकि यह उनके हित में है। दरहकीकत भ्रष्टाचार का भी वर्ग चरित्र होता है और जाति के दायरे में कहें तो भ्रष्टाचार व अनैतिकता का रिश्ता ब्राह्मणवादी-सवर्ण शक्तियों से गहरा बनता है। वर्ग के दायरे में बात करें तो भ्रष्टाचार व अनैतिकता किस वर्ग से जुड़ता है? उत्तर बहुत साफ है, इसका रिश्ता मेहनतकश हिस्से से नहीं है।

ब्राह्मणवादी समूह की विशेषता है भ्रष्टाचार- 

जाति के दायरे में बात करें तो यह ब्राह्मणवादी-सवर्ण समूह की चारित्रिक विशेषता है। समाज के शोषित-उत्पीड़ित हिस्से से तो भ्रष्टाचार व अनैतिकता से रिश्ता होने का आधार ही नहीं बनता है। इस मामले में बड़े-पुराने खिलाड़ी और छोटे-नये खिलाड़ी, दोनों ही चाहते हैं कि यह मसला न रहे।

मोटे तौर पर भ्रष्टाचार व अनैतिकता कानून व तय नियमों-मूल्यों से बाहर जाते हुए निजी या किसी और के स्वार्थ में काम करने का मसला है,यहां समूह का स्वार्थ उपेक्षित होता है,उस पर चोट पहुंचती है। तो भ्रष्टाचार व अनैतिकता में सवर्ण शामिल हों या बहुजन के बीच से,यह बहुसंख्यक-बहुजनों के हित के खिलाफ ही जाएगा। शोषकों-उत्पीड़िकों के पक्ष में ही जाएगा।

ऐसे भी सामाजिक न्याय की राजनीति का अनिवार्य उत्पादन भ्रष्टाचार व अनैतिकता तो है, नहीं। न ही भ्रष्टाचार व अनैतिकता के बगैर सामाजिक न्याय आगे ही नहीं बढ़ सकता है, ऐसी कोई बात है। बल्कि यह किसी समूह के स्वार्थ से किसी राजनीति के भटकने की अभिव्यक्ति है।

बहुतेरे दोस्त,भ्रष्टाचार व अनैतिकता के मसले पर भी बहुजन बनाम सवर्ण के दायरे में सोचते हैं और उन्हें लगता है कि वे बहुजनों के हित में सोच रहे हैं, बोल रहे हैं।

बेशक,ब्रह्मणवादी-संवर्ण प्रोपेगंडा मशीनरी बड़े को छोटा और छोटे को बड़ा कर दिखाती है। लेकिन,बहुजन पहचान पर खड़ा होकर हमें ब्रह्मणवाद और सवर्ण दबदबे को उखाड़ फेंकना है,इस पहचान को भ्रष्टाचार व अनैतिकता का नकाब नहीं बनाना है।

बहुजनों के भीतर से ब्रह्मणवादी-सवर्ण सामंती ताकतों के उभरते भ्रष्ट-अनैतिक यारों को बहुजन पहचान को नकाब बनाने की छूट बहुसंख्यक बहुजनों के हित व संघर्ष को कमजोर ही करता है।

बहुसंख्यक बहुजनों को जरूर ही दोनों राजनीतिक गिरोहों को आईना दिखाने की जरूरत है। नये दौर में सामाजिक न्याय व लोकतंत्र की लड़ाई और राजनीति की जरूरत है कि हम दोनों गिरोहों के खेल का तमाशबीन बनने से बचें।

नये दौर में दावेदारी पेश करें।

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