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लेखकों पर हमलों के विरोध में PM की काशी के बुद्धिजीवियों का फूटा गुस्सा, निकाला प्रतिरोध मार्च

नई दिल्ली/वाराणसी। नेशनल जनमत ब्यूरो 

किसी लोकतंत्र की खूबसूरती का आंकलन उसमें विविधता के प्रसार के अवसर के आधार पर किया जाता है। असहमति के कारण किसी व्यक्ति की हत्या दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर सवाल खड़ा करती है।

इसी विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए लेखकों, फिल्मकारों, छात्रों, पत्रकारों और तमाम बुद्धिजीवियों पर ‘प्रायोजित हमलों’ के विरोध में मंगलवार को पीएम के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के लोगों ने  BHU गेट से अस्सी घाट तक प्रतिरोध मार्च निकालकर सभा की। जिसमें छात्रों,कर्मचारियों, वेंडर, कलाकारों और तमाम बुद्धिजीवियों ने भागीदारी रही।

इस मार्च में पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र के बुद्धिजीवी वर्ग का गुस्सा झलक रहा था। इस मार्च में छात्रों के अलावा कलाकार, कर्मचारियों और अन्य बुद्धिजीवियों ने भाग लेकर सरकार की मानसिकता और शैक्षणिक संस्थानों के भगवाकऱण करने की रणनीति पर सवाल उठाए।

मार्च के बाद आयोजित सभा में बोलते हुए कार्यक्रम संयोजक रामायण पटेल ने कहा कि गांधी से लेकर गौरी लंकेश तक की हत्या एक खास विचारधारा के लोगों द्वारा हुई है। जिसके मूल में इन लोगों की वैचारिक असहमति है।

मई 2014 में केंद्र में आई भाजपा सरकार के बाद अभिव्यक्ति पर हमले और भी तेज हो गए हैं। लेखकों, फिल्मकारों, छात्रों, पत्रकारों और तमाम बुद्धिजीवियों पर ‘प्रायोजित हमले’ तेजी से बढ़ रहे हैं।

‘कमिटी टू प्रोटेक्ट जनर्लिज्म’ की रिपोर्ट के अनुसार भारत पत्रकारों के लिए शीर्ष 10 असुरक्षित देशों में शामिल है। भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश के लिए ये शर्मनाक है।

आज जब देश में लोकतंत्र खतरे में हैं और प्रतिरोध की आवाजों को दबाया जा रहा है ऐसे में असहमति और अभिव्यक्ति के अधिकार की रक्षा के लिये स्टूडेंट्स, शिक्षक और बुद्धिजीवी नागरिक समाज ने एकजुटता दिखाई है।

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