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BHU कुलपति प्रो. त्रिपाठी के राज में खत्म हुए OBC-SC-ST शिक्षकों के पद, सुप्रीम कोर्ट ने भेजा नोटिस

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में कुलपति गिरीश चंद्र त्रिपाठी के संरक्षण में आरक्षण खत्म करने की कवायद जारी है. ओबीसी-एससी-एसटी के पदों को खत्म करके ज्यादातर पद सवर्ण शिक्षकों को दिए जा रहे हैं. इस संविधान विरोधी रवैये के विरोध में विश्वविद्यालय के न्याय पंसद शिक्षक प्रो. लालचन्द प्रसाद, प्रो. महेश प्रसाद अहिरवार एवं प्रो. जे. बी. कुमरैया  सुप्रीम कोर्ट की शऱण में गए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए केन्द्र सरकार, MHRD, UGC एवं  बीएचयू प्रशासन को नोटिस जारी किया।

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हाईकोर्ट का एकपक्षीय फैसला- 

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 7 अप्रैल 2017 के अपने एक पक्षीय फैसले में बीएचयू के विज्ञापन संख्या 02/2016-17 को रद्द कर दिया था. इतना ही नहीं विभागवार/विषयवार आरक्षण लागू करते हुए नये सिरे से विज्ञापन संख्या- 01/2017-18 जारी करने का फैसला दिया था. जिसके कारण पूर्व में अनुसूचित जाति, जनजाति व अन्य पिछड़े वर्ग के लिये आरक्षित सभी पद सामान्य श्रेणी में विज्ञापित कर दिए गए हैं.

नई नियुक्तियों के विज्ञापन में खुलकर आरक्षण का उल्लंघन- 

नये विज्ञापन में आरक्षण नियमों का खुला उल्लंघन हुआ है और पिछड़े तथा वंचित वर्गों का प्रतिनिधित्व लगभग समाप्त कर दिया गया है। यद्यपि कोर्ट ने यूजीसी एवं केन्द्र सरकार को इस सन्दर्भ में नये सिरे से दिशा निर्देश जारी करने का निर्देश भी दिया था लेकिन बीएचयू प्रशासन ने बिना किसी गाइडलाइन के नया विज्ञापन जारी कर दिया।

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कुलपति प्रोफेसर त्रिपाठी का झूठा आश्वासन- 

प्रोफेसर महेश प्रसाद अहिरवार

इस विज्ञापन के विरुद्ध प्रो. लालचन्द प्रसाद, प्रो. महेश प्रसाद अहिरवार एवं प्रो. जे. बी. कुमरैया के नेतृत्व में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के अनुसूचित जाति, जनजाति के वरिष्ठ शिक्षकों के प्रतिनिधि मंडल ने कुलपति प्रो. गिरीश चन्द्र त्रिपाठी से मिलकर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं थीं लेकिन कुलपति ने केवल झूठा आश्वासन दिया।

कोई सकारात्मक कार्रवाई न होते देख वंचित वर्गों के शिक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट में जाने का निश्चय किया. काशी हिन्दू विवि प्रशासन के मनमानी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उसने नये विज्ञापन निकालने के पहले रिजर्वेशन रोस्टर को सार्वजनिक नहीं किया और न ही विवि के अनुसूचित जाति जनजाति एवं पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ द्वारा ध्यानाकर्षित की गई लगभग तीन दर्जन आपत्तियों का निष्पादन किया. विवि प्रशासन की तानाशाही और इलाहाबाद हाईकोर्ट के पक्षपात एवं पिछड़ा वर्ग विरोधी फैसले के विरुद्ध बीएचयू के जागरूक अध्यापकों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी.

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स्वीकृत पद- 1139

नियुक्तियां- 884  खाली- 255

भरे पदों की स्थिति-

General- 608,

OBC- 102,  SC- 126, ST- 48

एसोसिएसट प्रोफेसर- 

स्वीकृत पद-  528
भरे पद- 337  खाली- 191

भरे पदों की स्थिति
General- *323*
OBC- *Nil*
SC- *13*
ST- 01

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प्रोफेसर- 
स्वीकृत पद- 253
भरे हुए पद- 137  खाली पद-  116

भरे हुए पदों की स्थिति-

General- 135
OBC- Nil
SC-  02
ST-  00

समझिए क्या खेल हुआ है- 

सामान्य कैटेगरी का अधिकतम आरक्षण 50.5 प्रतिशत होता है. अगर हम ऊपर दिए आंकड़ों को देखें तो सामान्य के लिए असि. प्रोफेसर, एसोसिएशट प्रोफेसर और प्रोफेसर के लिए कोई पद खाली नहीं है क्योंकि प्राप्त जानकारी के अनुसार असिस्टेंट प्रोफेसर में 53.38 प्रतिशत सवर्ण,  एसोसिएट प्रोफेसर में 63.06 फीसदी सवर्ण और प्रोफेसर में 53.35 सामान्य वर्ग के लोग पहले से मौजूद हैं. यानि की जब सामान्य वर्ग की सीट पहले से फुल हैं तो ये बीएचयू के प्रशासन ने नई नियुक्तियों में सामान्य वर्ग की सीट ही क्यों निकाली.

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सुप्रीट कोर्ट ने भेजा नोटिस- 

प्रो. एमपी अहिरवार कहते हैं कि नई नियुक्तियों  के आधार पर ओबीसी-एससी-एसटी की सीटें ही निकाली जानी चाहिए थी.  ये खाली सीटें हमारा अधिकार है इसे हम कोई गलत तरीके से नहीं मांग रहे हैं ये संविधान प्रदत्त अधिकार है जिसके आधार पर ही समाज में समानता आएगी.  इसलिए ये लड़ाई हम सुप्रीम  कोर्ट में लड़ रहे हैं.

मेडीकल साइंस संस्थान बीएचयू का हाल देखिए- 

मेडिकल साइंस संस्थान बीएचयू में जूनियर रेजिडेंट एवं सीनियर रेजिडेंट के क्रमशः 22 एवं 67 पदों में SC,ST-OBC प्रतिनिधित्व समाप्त कर दिया गया है।

बीएचयू प्रशासन द्वारा दिए गए विज्ञापन में जूनियर रेजिडेंट के सभी 22 पद सामान्य वर्ग के लिए सुरक्षित कर दिये गए हैं जबकि इनमें
OBC को 6, SC  के 4  और ST के 2 पद होने चाहिये थे।

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इसी तरह सीनियर रेजीडेंट के कुल 67 पदों में OBC के लिए नाममात्र को  7 और  SC के लिए केवल 2 पद आरक्षित किये गए हैं जबकि ST के लिए कोई भी पद आरक्षित नहीं है। 67 पदों में से OBC को 18, SC को 10 और ST को 5 पद मिलने चाहिए थे.

 

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