You are here

जस्टिस कर्णन की गिरफ्तारी के बाद छिड़ी बहस, देश क्या आज भी मनु की मनुस्मृति से चल रहा है !

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो।

दलित समुदाय से आने वाले जज जस्टिस कर्णन की गिरफ्तारी ने देश में और सोशल मीडिया पर एक बड़ी बहस को जन्म दे दिया है. सोशल मीडिया पर सक्रिय सामाजिक चिंतक इस बात पर एकमत दिखाई दे रहे हैं कि इस देश में ब्राह्मणवादियों नें संविधान में दिए गए समता, स्वतंत्रता, न्याय, वंधुत्व जैसे मानवीय विचारों की हत्या कर दी है और ये देश को मनु के संविधान मनुस्मृति की तरफ ले जाने के लिए लगातार प्रयासरत हैं.

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाले जस्टिस कर्णन देश में हाईकोर्ट के पहले जस्टिस हैं जिनको सेवानिवृत्त होने के बाद गिरफ्तार किया गया है. कोलकाता हाईकोर्ट के जज जस्टिस कर्णन का कसूर बस इतना था कि दलित होकर भी उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कुछ जजों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते पीएमओ से जांच की मांग की थी. अब देश की न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी संभाल रहे पुराधाओं ने भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले जज को ही 6 महीने की सजा सुना दी.

इसे भी पढ़ें…सिर्फ न्यायपालिका में ही नहीं, शर्मा जी जैसे ब्रह्मचारी मोर देश के हर सिस्टम में नाच रहे हैं

न्यायपालिका ही लागू कर रही है मनु का संविधान- 

इस देश की न्यायपालिका पर नजर दौड़ाऐं तो ऐसा लगता है कि इस देश की न्यायपालिका दलितों-पिछड़ों,आदिवासियों और मुसलमानों के साथ दोहरा व्यवहार कर रही है. जिस तरह से मनु स्मृति में हर वर्ण के लिए सजा का अलग-अलग प्रावधान था ठीक उसी प्रकार भारतीय न्याय व्यवस्था भी शूद्रों यानि ( दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों) और मलेच्छों ( मुसलमानों) के लिए अलग – अलग दंड विधान रच रही है.

उदाहारण के तौर पर भारतीय राजनीति में दलितों पिछड़ों के नायक लालू यादव के प्रति न्यायपालिका ने हमेशा दूषित मानसिकता का परिचय दिया. लालू यादव की ही तरह भारतीय राजनीति में जिन नेताओं ने भी राजनीति में ब्राह्मणों के वर्चस्व को समाप्त किया उन पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर न्यायपालिका ने त्वरित कार्यवाही करके अपने जिंदा होने का सबूत दिया.

इसे भी पढ़ें…जस्टिस कर्णन सही ही बोल थे भ्रष्टाचार पर देखो, अब मिश्रा जी ने 10 करोड़ में बेच दी भारत की न्याय व्यवस्था

अब तक जो राजनेता भी राजनीति में भ्रष्टाचार के कारण जेल गए उनमें से 90 फीसदी या कहें कि सौ फीसदी दलित या पिछड़े हैं. उदाहारण के तौर पर आरएलडी के प्रमुख ओमप्रकाश चौटाला जाट जाति के हैं. पर उसी हरियाणा के नवीन जिंदल के ऊपर भी भ्रष्टाचार के आरोप है पर वो जेल के बाहर हैं.

इसी तरह महाराष्ट्र के कद्दावर ओबीसी नेता छगन भुजबल भी जेल में हैं. राजनीतिक जानकारों का मानना है कि छगन भुजबल का कसूर इतना है कि उन्होंने दिल्ली में एक महाराष्ट्र सदन बनवाया उसमें शिवाजी महाराज, बाबा साहेब अम्बेडकर, अहिल्या बाई होल्कर, ज्योतिबा फुले , सावित्री बाई फुले , यशवंत राव चव्हाण आदि बहुजन समाज के नायको की मूर्तियां लगा दी, जिससे महाराष्ट्र के मनुवादियों को गहरी चोट पहुंची औऱ उन्होंने छगन भुजबल को न्यायपालिका की मदद से जेल भेज दिया.

इसे भी पढ़ें…जानिए मोरनी को आंसू पिलाकर गर्भवती करने वाले शर्मा जी जैसे लोग कैसे बनते हैं जज

इसी तरह मधु को़ड़ा आदिवासी थे , उनको जेल जाना पड़ा. ए. राजा. दलित थे , उनको भी जेल जाना पड़ा, कनिमोझी दलित थी , उनको भी जेल जाना पड़ा. इसी तरह एनआरएचएम घोटाले में बाबू सिंह कुशवाहा तो जेल चले गए पर उसी घोटाले में अनंत कुमार मिश्रा जेल जाने से बच गए.

ये बड़े आश्चर्य की बात है कि चारा चोर के नाम से लालू यादव को तो सारा देश जानता है पर चारा घोटाले का असली सूत्रधार जगन्नाथ मिश्रा का नाम भी कोई नहीं जानता.

आज आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में मुलायम सिंह और मायावती पर तो सीबीआई जांच चल रही है पर इस देश के किसी अन्य सवर्ण नेता को आय से अधिक सम्पत्ति के मामले न तो जांच चल रही है और अगर कुछ नेताओं की जांच चल भी रही है तो उनकी आज तक कोई गिरप्तारी नही हुई है.

इसे भी पढ़ें…योगीराज में अन्याय के खिलाफ तिरंगा यात्रा निकाल रहे 22 छात्रों को जेल

किसानों की जमीन का मामला तो इस देश के सबसे ताकतवर गांधी-नेहरू परिवार के दामाद पर भी चल रही है पर किसी न्यायपालिका की हिम्मत नहीं है कि दामाद जी को जेल भेज दे.

है किसी में हिम्मत जो अरुणांचल के मुख्यमंत्री कलिखो पुल के सुसाइड नोट के आधार पर उनकी हत्या की जांच सामाजिक एक्टिविस्टों के किसी पैनल से करा सके. प्रख्यात वकील प्रशांत भूषण और कोलकाता हाई कोर्ट के जज जस्टिस कर्णन ने जिन जजों को भ्रष्ट कहा, है किसी संस्था कि हिम्मत कि इन कथित रूप से बेईमान जजों की जांच करा सके.

है किसी अदालत में हिम्मत जो देश में दंगा फैलाने और हजारों लोगों की हत्या के आरोप में जोशी, आडवाणी, समेत कई विहिप नेताओं को सजा दे सके. है किसी अदालत में हिम्मत जो गुजरात दंगों की सीबीआई जांच करा दे.और गुनहगारों को सजा दे. जबकि सबको पता है कि ये दंगा किन लोगों ने कराया.

इसे भी पढ़ें…कर्ज के बोझ तले मर रहा है देश का किसान लेकिन भगवान है मालामाल, पहनेंगे लाखों के कपड़े

क्या जो आज भारत में चल रहा है वो मनु का विधान नहीं है. क्या आज एक ही अपराध के लिए भारत में सवर्णों और शूद्रों के लिए अलग- अलग सजा का विधान नहीं है.

क्या ये मनु का दंड विधान नहीं है कि ...

– चंद्रशेखर रावण (दलित) गिरफ़्तार ! अपराध – सहारनपुर में सामंती हिंसा के विरुद्ध प्रतिरोध खड़ा करना .

– छात्रनेता दिलीप यादव (ओबीसी) अमीक़ जमाई (मुस्लिम) रामकरन निर्मल (दलित) गिरफ़्तार ! अपराध – सहारनपुर हिंसा के विरुद्ध मार्च         करना.

– जस्टिस कर्णन (दलित) गिरफ़्तार ! अपराध – न्यायपालिका के भ्रष्ट जजों की पोल खोलना.

– ओपी मिश्रा जज ! 10 करोड़ रुपये घूस लेकर जमानत दी। गिरफ़्तार नहीं हुआ.

– अनन्त कुमार मिश्रा ! NRHM घोटाले में शामिल ! 13 करोड़ देकर गिरफ़्तारी से बच गया.

– प्रदीप शुक्ला ! करोड़ों रुपये घर से नक़द बरामद ! गिरफ़्तारी से बचा हुआ है.

– विजय माल्या (ब्राह्मण) ! 9000 करोड़ के लोन का डिफाल्टर ! लंदन में मौज़ कर रहा है.

इसके अलावा जस्टिस काटजू खुले तौर पर न्यायपालिकों भ्रष्ट कह चुके हैं उन पर कभी इन न्यायवादियों का खून नहीं खौला.

इसे भी पढिए-जस्टिस कर्णन ने चुकाई भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने की सजा, 6 महीने काटेंगे जेल में

मनुस्मृति में एक ही अपराध पर शूद्र के लिए मृत्युदण्ड वैश्य के लिए अर्थदण्ड, क्षत्रिय के लिए श्रमदण्ड और ब्राह्मण के लिए पुरस्कार का विधान है.

भारतीय न्यायपालिका जिस प्रकार से ब्राह्मण जाति के अपराधियों के प्रति नरम है उसे देखकर तो ये धारणा और भी मजबूत हो जाती है कि भारत भूमि पर प्रकारांतर से मनु का दंड विधान काम कर रहा है.

Related posts

Share
Share