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मोदी सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ किसान आंदोलन में शिरकत करेंगे नितीश कुमार

मुंबई/नई दिल्ली। नेशनल  जनमत ब्यूरो 

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार राष्ट्रपति चुनाव में समर्थन के मामले में भले ही केंद्र की बीजेपी नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के साथ खड़े हों लेकिन महाराष्ट्र में वो केन्द्र और राज्य की बीजेपी सरकार के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन में शिरकत करेगे. इस घोषणा के बाद उनके बीजेपी से बढ़ रही नजदीकियों की अटकलों पर भी विराम लगेगी.

सांसद व किसान नेता राजू शेट्टी ने दिया है निमंत्रण- 

नीतीश कुमार चंपानेर में खत्म होने वाली किसान संघर्ष यात्रा में शामिल होंगे. जहां वे महाराष्ट्र की फड़नवीस सरकार और केन्द्रकी मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ हमलावर होंगे. इस बारे में नीतीश ने महाराष्ट्र के किसान नेता और सांसद राजू शेट्टी को आश्वासन दिया है. यह यात्रा मध्यप्रदेश के मंदसौर से 7 जुलाई को शुरू होगी और महाराष्ट्र के चंपानेर में समाप्त होगी.

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7 जुलाई को मंदसौर से शुरू होगी यात्रा- 

सांसद राजू शेट्टी ने नीतीश कुमार से मुलाकात की. इस दौरान उन्होंने नीतीश से किसान यात्रा में शरीक होने का अनुरोध किया. नीतीश ने उनका अनुरोध स्वीकार करते हुए कहा है कि वे किसान संघर्ष यात्रा के समापन कार्यक्रम में शिरकत करेंगे. राजू शेट्टी के कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार यात्रा 7 जुलाई को मंदसौर से शुरू होगी और चंपानेर में खत्म होगी.

कल ही डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव ने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा था- 

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महागठबंधन में आपसी सामंजस्य है-

महागठबंधन के शीर्ष नेताओं में बेहतर समन्वय है. बिहार की न्यायप्रिय जनता ने महागठबंधन की नीतियों और कार्यक्रमों को अपार समर्थन एवम अनंत सम्मान देकर ऐतिहासिक बहुमत दिया है. हमारा इस बहुमत के पीछे जनता के सरोकारों के प्रति पूर्ण समर्पण और प्रतिबध्ह्ता है. बीजेपी और उनके समर्थक संस्थानों को हमारी एकता हजम नहीं हो रही है.गठबंधन के भी कुछ नेता व्यक्तिगत हितों को लेकर अनावश्यक बयानबाजी करते रहते है ताकि खबरों में बने रहे.

भाजपा समर्थित मीडिया दुष्प्रचार में लगा है- 

भाजपा समर्थित मीडिया का भी एक वर्ग जिस दिन से महागठबंधन बना है उसी दिन से महागठबंधन के खिलाफ दुष्प्रचार में लगा हुआ है. शायद ही कोई ऐसा दिन हो जब उन्होंने यह रिपोर्ट किया हो कि महागठबंधन मजबूत है, एकजुट है और बिहार के लिए समर्पित है. शायद वो इसलिए नहीं करते क्योंकि महागठबंधन का विचार उनके सरोकारों को पूर्ण नहीं करता. महागठबंधन के बने रहने की इसी बैचनी और टूटने के ख्याली पुलाव खाने की बेकरारी में वो अपनी उर्जा का निवेश करते रहते है| खैर सबकी पेशागत मजबूरियां या वैचारिक मान्यताएं होती हैं और लोकतंत्र में इसका भी सम्मान होना चाहिए.

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