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अंधविश्वास के खिलाफ मधेपुरा के भदौल गांव का साहसिक कदम, अब न होगा मृत्युभोज न धार्मिक कर्मकांड

नई दिल्ली/मधेपुरा, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

बढ़ती जागरूकता के साथ धार्मिक कर्मकांड और अंधविश्वास के खिलाफ समाज सुधारकों की मुहिम रंग लाती दिख रही है। देश भर में लोग वैज्ञानिक सोच बढ़ने के साथ मानसिक दासता की बेड़ियों को तोड़ने के लिए प्रयासरत हैं।

सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ लड़ रहे बामसेफ, अर्जक संघ जैसे तमाम संगठनों के अभियान का असर है कि बिहार के मधेपुरा जिले के मुरलीगंज प्रखंड स्थित भदौल गांव के लोगों ने इन बेड़ियों को तोड़ने का साहसिक निर्णय लिया है।

ये निर्णय ना केवल अंधविश्वास को तोड़ने वाला है बल्कि भोज के लिये पीढ़ियों तक तोड़ देने वाले कर्ज से गरीबों को निजात भी दिलाएगा जो कर्ज लेकर मृत्युभोज देने के लिए बाध्य थे।

ना मृत्युभोज ना कर्मकांड- 

गांव के लोगों ने सहमति से निर्णय लिया कि किसी की मृत्यु पर वे न मृत्यु भोज करेंगे और न ही किसी तरह का कर्मकांड कराया जाएगा. विगत दिनों भदौल निवासी रामचंद्र राय की सास माता राजो देवी का निधन हो गया. इस अवसर पर लोग एकत्रित हुए थे. दाह संस्कार के बाद उनके ही दरवाजे पर सामाजिक बैठक की गयी.

इसी बैठक में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि समाज में व्याप्त कुरीतियों को सुधारने की जरूरत है. इसलिए मृत्यु भोज भी नहीं किया जाये और न आत्मा के उद्धार के लिये कर्मकांड ही कराया जाये. पहले तो गांव के लोगों ने इस बात का विरोध किया फिर सब सहमत हो गये. बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि गांव में किसी की भी मृत्यु पर अब ऐसा ही होगा।

बामसेफ लंबे समय से चलाता रहा है अभियान- 

मृत्यु भोज की प्रथा गरीब को भीतर से तोड़ देती है. कई बार इसके लिये लिया गया कर्ज दूसरी पीढ़ी को भी झेलना पड़ता है। इसी सोच के साथ बामसेफ के महासचिव हरिश्चंद्र मंडल ने कहा कि एक आकलन के अनुसार सिर्फ बिहार के गांवों में एक साल में मृत्यु भोज पर होने वाला खर्च पांच अरब से ज्यादा है.

औसतन एक पंचायत में एक साल में मृत्यु भोज पर 50 लाख से ज्यादा खर्च हो रहा है. कर्मकांड के चक्कर में लोग आने वाले पीढ़ी को बर्बाद करने पर तुले हैं. जब तक समाज में वैज्ञानिक सोच विकसित नहीं होगा तब तक भारत तथा भारतीय विश्व समुदाय में पिछड़े ही रहेंगे.

पहले से तैयार थी क्रांति की पृष्ठभूमि-

गांव के विनोद यादव ने बताया कि इस क्रांति की पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार थी. गांव में कर्मकांड का विरोध लंबे समय से चल रहा था. इसकी शुरुआत 2013 में झकस मंडल की पत्नी के देहावसान से ही हुई थी. उनके निधन के बाद कोई कर्मकांड नहीं हुआ था तथा पांचवे दिन श्रद्धांजलि भोज रखा गया था.

उस समय भी गांव वासियों के आंशिक विरोध का सामना करना पड़ा था. लेकिन अब गांव वाले इसके लाभ को समझने लगे हैं. इंतजार इस बात का है कि यह आंदोलन भदौल गांव से निकल कर पूरे राज्य ही नहीं बल्कि पूरे देश में फैल जाये. उन्हें पूरी उम्मीद है कि यह हो कर रहेगा.

परिजन के स्वर्ग-नरक सिधारने के चक्कर में कर्ज में डूबते हैं- 

रामचंद्र राय ने बताया कि यह निर्णय होना बहुत ही आवश्यक था. 2016 में जब उनके पिता का निधन हुआ था तब उन्होंने कर्मकांड और भोज में पांच लाख से ज्यादा खर्च किये तथा आज तक कर्ज से नहीं उबर पाये हैं.

पंचायत के ही जितेंद्र कुमार यादव ने कहा कि दो महीना पहले उन्होंने मृत्यु भोज पर लाखों रुपये खर्च किये. अब जितेंद्र यादव अपने बच्चे को अच्छे विद्यालय में नहीं पढ़ा सकते हैं. अब इस निर्णय के बाद ऐसे लोगों को राहत मिलने की उम्मीद जग गयी है.

बेटी ने दिया मां की अर्थी को कंधा- 

भदौल गांव ने न केवल अंधविश्वास और कुप्रथाओं को तोड़ने में सकारात्मक पहल की है बल्कि इस गांव की बेटी ने अपनी मां की अर्थी को कंधा देकर समाज में स्थापित गैर जरूरी मान्यताओं को भी ध्वस्त कर दिया.

रामचंद्र राय की सास माता राजो देवी का निधन हो गया. राजो देवी की जब अर्थी उठी तो उनकी बेटी गुजिया देवी ने भी उस अर्थी को कंधा दिया. पहले तो लोगों ने दबी जुबान से ही सही लेकिन विरोध किया पर बेटी गुजिया देवी हठ पर अड़ी रही. तब परिजन सहित समाज के अन्य लोगों ने भी उनका साथ दिया.

उनके इस कदम ने समाज में जड़ हो चुकी मान्यताओं को ध्वस्त करते हुए नयी और सार्थक परंपरा की नींव रखी है.

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