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पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों, मुस्लिमो के हित में बीजेपी-कांग्रेस दोनों का खात्मा जरूरी है !

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

किसानों, जाटों समेत पिछड़ी जातियों, आदिवासियों, दलितों और मुसलमानों के हित में बीजेपी और कांग्रेस दोनों का ही अंत जरूरी है।
मनुवादी-जातिवादी लोग मुसलमानों को सामने दिखाकर जाटो और दूसरी पिछड़ी जातियों, किसानों, दलितों और आदिवासियों को आपस में लड़ा रहे हैं।

पहले जैसलमेर के कांदल गांव में मांगणियार कलाकार अमद ख़ां की हत्या, मांगणियारों का कांदल से पलायन और बाड़मेर के बालोतरा शहर में शिव सेना के गुंडों द्वारा एक मुसलमान युवक के मार-पीट के मामले सामने आए हैं।

मनुवादी लोग सुनियोजित तरीके से ये कर रहे हैं। जैसलमेर और बालोतरा, मुज्जफरनगर, शामली, कैराना, अखलाक, पहलु खान और जुनैद की अगली कड़ी है।

मुज्जफरनगर दंगों में बीजेपी की भूमिका- 

मुज्जफरनगर में दंगे 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले 2013 के आखिर में हुए. यह दंगे उस इलाके में हुए, जहां देश के बंटवारे के समय भी मोटे तौर पर देश के दूसरे हिस्सों की तुलना में हिंसा बहुत कम हुई थी. यह दंगे जाटों और मुसलमानों के बीच करवाए गए, दंगों के मामले में बीजेपी के संगीत सोम और दसियों लोगों पर अब भी मुकदमे दर्ज हैं.

इसके बाद जब-जब चुनाव हुए तब-तब इस इलाके में शामली, कैराना और अखलाक़ होते चले गए, बीच में पहलु ख़ान और जुनैद की भी हत्या हुई. मनुवादियों ने सुनियोजित तरीके जाटों को हिंदू बनाम मुसलमान सिखाया. अब गुजरात में चुनाव हैं और राजस्थान में 2018 के आखिर में चुनाव हैं, इसी पृष्ठभूमि में यह हिंसक हमले किये जा रहे हैं.

जाट-मुस्लिम एकता को पूरी तरह से तोड़ दिया-

संघियों और बीजेपी को इससे दो तरफा फायदा हुआ है. जो इलाका हमेशा जाट-मुसलमान एकता का प्रतीक बना रहा, जहां से इसी एकता के बल पर चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने, देवीलाल उपप्रधानमंत्री बने. इसी एकता के बल पर आजादी से पहले रहबरे-आजम चौधऱी छोटूराम और सिकंदर हयात ख़ान की यूनियनिस्ट पार्टी ने कई बार संयुक्त पंजाब में गैर कांग्रेसी सरकार बनाई.

वहीं पर संघियों ने जाट-मुसलमान एकता को तार-तार कर दिया और ख़ुद को जाट हितैषी बताकर जाटों को मुसलमानों के खिलाफ खड़ा कर दिया। बाद में जब हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन हुआ तब बीजेपी सरकार में हरियाणा पुलिस की गोली से 40 से ऊपर जाट मरे।

तब जाटों को पैंतीस बनाम एक का नारा देकर हाशिये पर धकलने की साज़िश की गई. बीजेपी के लोग पश्चिमी यूपी में धर्म के मामले में जाटों के साथ खड़ें दिखाई दिए, वहीं आरक्षण के मामले में वे जाटों के विरोध में खड़े हो गए.

मुस्लिम का खौफ दिखाकर पिछड़ों को हिन्दु नाम दिया जााता है- 

संघियों और भाजपाईयों ने यह खेल बहुत अच्छे से सीख लिया है. एक तरफ वे धर्म के मामले में मुसलमानों से एकजुट होकर लड़ने की बात करते हैं और दूसरी तरफ स्वामीनाथन आयोग, किसान आंदोलन, जाति जनगणना, सामाजिक न्याय और निजी क्षेत्र में आरक्षण जैसे सवालों पर जाटों, दलितों और आदिवासियों के खिलाफ खड़े हो जाते हैं.

संघी और भाजपाई कौन लोग हैं और वे ऐसा करके क्या हासिल करना चाहता हैं ?

संघ और भाजपा की टॉप लीडरशीप में सवर्ण जातियों का कब्ज़ा है. सवर्णों में भी ब्राह्मण-बनियो का कब्जा है. वे देश में जाति जनगणना, निजी क्षेत्र में आरक्षण, किसान आंदोलन, स्वामीनाथन आयोग जैसे मुद्दों पर बात नहीं करना चाहते, वे अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए पिछड़ों, दलितों और आदिवासियों को मुसलमानों के ख़िलाफ एकजुट करते हैं.

हमने देखा कि संघियों ने जाट-दलित-मुसलमान एकता को खंडित करने का काम किया है. इसी कारण जब अखलाक और पहलु ख़ान की हत्या हुई तब जाट और दलित मुसलमानों के साथ खड़े नहीं दिखे, जब जाटों पर हरियाणा में आरक्षण आंदोलन के दौरान हिंसा हुई तब मुसलमान और दलित जाटों के साथ खड़े नहीं दिखे, बाद में जब सहारनपुर में दलितों पर हिंसा हुई तब जाट और मुसलमान दलितों के साथ खड़े नहीं दिखे.

मुस्लिम, जाट, दलित एकता में बीजेपी-कांग्रेस का रोड़ा- 

मुसलमान-जाट-दलित एकता में बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही रोड़ा हैं. दोनों ही मुसलमानों, जाटों और दलितों को इस्तेमाल करती आई हैं. एक तरफ बीजेपी हिंदू ललकार भरती हैं और दूसरी तरफ कांग्रेस मुस्लिम हितैषी दिखते हुए मुस्लिम ललकार भरती हैं. इससे दोनों को बारी-बारी से सत्ता मिलती रहती है.

आज के वक्त मुसलमानों के अंदर कांग्रेस की बगावत करने का साहस कम दिखाई देता है. जबकि कांग्रेस ने सत्तर साल में मुसलमानों के हित में कुछ नहीं किया. मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक-शैक्षिक स्थिति का अध्ययन करके सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट नवंबर 2006 में कांग्रेस की मनमोहन सरकार को सौंप दी थी.

रिपोर्ट में कहा गया कि मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक-शैक्षिक स्थिति आदिवासियों और दलितों से भी ज्यादा खराब है, बावजूद इसके मनमोहन सरकार सच्चर कमेटी की रिपोर्ट 2006 से लेकर 2014 तक लेकर बैठी रही और आठ साल में सच्चर कमेटी की किसी भी महत्वपूर्ण सिफारिश को लागू नहीं किया जा सका।

आठ साल में कांग्रेस देश और मुसलमानों के हित में बहुत बदलाव सकती थी, लेकिन कांग्रेस ने नहीं किया. केंद्र में कांग्रेस सरकार के समय में ही अयोध्या में मनुवादियों ने बाबरी विध्वंस किया था, बाबरी विध्वंस की आरोपी आज भी खुले घुम रहे हैं.

कांग्रेस-बीजेपी ने देश को लोकतांत्रिक नहीं होने दिया- 

कांग्रेस और बीजेपी ने सत्तर साल में देश की शिक्षा को लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष नहीं बनाया. संविधान का अनुच्छेद 28 कहता है कि सार्वजनिक बजट से चलने वाले सार्वजनिक स्कूलों में किसी भी तरह की धार्मिक शिक्षा का निषेध होगा, लेकिन हम सब जानते हैं कि संघी स्कूल आज भी ब्राह्मण धर्म की शिक्षा का अड्डा बने हुए हैं.

कुल मिलाकर बीजेपी मुसलमानों को तथाकथित हिंदू एकजुटता और कांग्रेस मुसलमानों को वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल करती हैं. बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही ब्राह्मणवाद की दाईं और बाईं भुजा हैं. लोकतंत्र और संविधान को बचाये रखने के लिए दोनों का ही अंत जरूरी है.

इनकी साजिशों को तोड़ने के लिए इस इलाके में जाटों और दूसरी पिछड़ी जातियों, दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों को एकजुट होकर अपना विकल्प तैयार करना होगा. बहस को हिंदू बनाम मुसलमान से बाहर लाकर किसान आंदोलन, स्वामीनाथन आयोग, आरक्षण, जाति जनगणना, निजी क्षेत्र में आरक्षण, शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दों पर बने रहना होगा.

न्याय के लिए जाटों, दलितों और मुसलमानों को एक-दूसरे पर हो रही हिंसा का एकजुट होकर विरोध करना होगा. इस इलाके में यूनियनिस्टवादी, समाजवादी, संविधानवादी और अंबेडकरवादी मूल्यों पर आधारित आंदोलन शुरू करना होगा, जिससे कि संविधान के सपने साकार हो सके.

( लेखक जितेन्द्र महला राजस्थान में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार हैं )

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