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पढ़िए समग्र विश्लेषण: क्यों राजस्थान में BJP चुनाव आने से पहले ही चुनाव हार गई है ?

नई दिल्ली/जयपुर, नेशनल जनमत ब्यूरो।

राजस्थान में बीजेपी चुनावों से पहले चुनाव हार गई हैं. वो हताश है, परेशान है, मानसिक तनाव में है. बीजेपी भ्रष्टाचार के बहाने लोकतांत्रिक आवाज़ों को ख़त्म करने की साजिश कर रही है.

पिछले पांच दिनों से भ्रष्टाचार की शिकायत को लेकर जो अध्योदश राजस्थान में बीजेपी लाना चाह रही थी, उस पर बवाल मचा है. अब ख़बरे आ रही हैं कि अध्यादेश को रोक लिया गया है.

समझने की कोशिश करते हैं कि मसला है क्या ?

राजस्थान में अगले साल दिसंबर 2018 में विधानसभा चुनाव होने हैं, विधानसभा चुनावों से ठीक पहले इस तरह के गैर लोकतांत्रिक अध्यादेश लाने के पीछे आरएसएस और बीजेपी की मंशा क्या है ? जबकि हम सब जानते हैं कि इंदिरा गांधी तक लोकतंत्र के विरोध में जाकर इसी देश में अपनी कुर्सी गंवा चुकी हैं, फिर वसुंधरा राजे क्या चीज़ हैं !

राजस्थान और गुजरात पड़ोसी राज्य हैं। गुजरात में एक महीने बाद चुनाव हैं, जहां से ख़बरे और रुझान मिल रहे हैं कि बीजेपी गुजरात में बहुत बड़ी मुसीबत में फंस चुकी है। बीजेपी गुजरात में चुनाव हार रही है। इसी मानसिक तनाव में बीजेपी ने राजस्थान में सरकार के ख़िलाफ उठी रही आवाज़ों को दबाने की कोशिश की है.

किसानों में भारी निराशा- 

राजस्थान में एक महीने पहले बड़ा किसान आंदोलन हो चुका है, किसान पूरे प्रदेश में जगह-जगह हर रोज प्रर्दशन कर रहे हैं, किसानों के कर्ज में डूबने और उनकी फसलों के भाव जमीन पर गिर जाने के कारण राज्य भर में किसान बीजेपी सरकार से नाराज़ हैं।

किसान आरएसएस और बीजेपी की इस नीति को बहुत अच्छी तरह पहचान गए हैं कि इन लोगों ने किसानों के पशुपालन और खेती को तबाह कर दिया है, फसलों के भाव गिरे हैं, वहीं दूसरी तरफ पशुओं की खरीद-फरोख़्त तक नहीं हो पा रही है। लाखों गाए किसानों के खेतों को चौपट कर रही हैं.

किसानों का यह गुस्सा सीकर में फूट चुका है। प्रदेशभर के किसान कह रहे हैं कि किसानों के साथ हुए समझौते पर सरकार कोई अमल नहीं कर रही, प्रदेश भर में 39 किसान संगठन, हनुमान बेनीवाल, किरोड़ीलाल मीणा, मार्क्सवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, बहुजन मुक्ति पार्टी और आम आदमी पार्टी लगातार किसानों की मांगों को लेकर गोलबंद हो रही हैं. अगले दो-तीन महीने में किसान आंदोलन फिर से तेज होगा।

दलितों-पिछड़ों की नाराजगी-

किसान नहीं बल्कि दलित, पिछड़े, आदिवासी और मुसलमान सब सरकार से नाराज हैं। प्रदेश भर में दलितों पर लगातार हमले हो रहे हैं, इस सरकार के कार्यकाल में दलितों पर हमले और अत्याचार के मामले कई गुना बढ़े हैं।

जगह-जगह बाबा साहेब अंबेडकर की मूर्तियां तोड़ी जा रही हैं, बाबा साहेब अंबेडकर की अस्मिता का सरकार ने मज़ाक बना दिया है। कहीं कोई कार्रवाई नहीं हो रही। डेल्टा मेघवाल और डांगावास जैसे कितने ही मामले अभी भी न्याय के इंतजार मे हैं.

आरक्षण पर हमला कर रही बीजपी सरकार- 

राजस्थान में पिछड़ों-दलितों-आदिवासियों के संवैधानिक हक़ आरक्षण को बीजेपी लगातार कमजोर कर रही हैं, आरएसएस और बीजेपी ने आरक्षण विरोधी लोगों को आरपीएसएसी से लेकर तमाम जगहों में भर दिया है।

आरपीएसएसी खुलेआम पिछड़ी जातियों के उम्मीदवार जो सामान्य श्रेणी की मेरिट में जगह बना रहे हैं, उन्हें सामान्य श्रेणी की सीट ना देकर ओबीसी में ही जगह दे रही है, जबकि न्यायिक और संवैधानिक रूप से वे सामान्य श्रेणी के हक़दार हैं. बीजेपी सवर्णों की दस-पंद्रह फिसदी आबादी को पचास फिसदी नौकरियां देने का अपराध कर रही है.

राजस्थान में मुसलमानों पर लगातार हमले हो रहे हैं, पहलु ख़ान और अमद ख़ान की हत्या और बाद में उनके साथ न्याय नहीं होना से मुसलमान न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

आरएसएस और बीजेपी ने स्कुलों की किताबों को मनुवादी सिलेबस से भर दिया है, स्कुलों को मनुवाद का अड्डा बना दिया है. बीजेपी शिक्षा में और स्वास्थ्य में निजीकरण को बढावा दे रही है. बीजेपी ने हर क्षेत्र में लोकतंत्र पर कुठाराघात किया है.

वसुंधरा सरकार ने चुनावों से पहले पंद्रह लाख नौकरियां देने की घोषणा की थी, इस वादे के मुकावले युवाओं को नये रोजगार मिलने की बात तो दूर बाजार की मंदी ने युवाओं में बेतहाशा बेरोजगारी बढ़ा दी है।

नौकरी के लिए सड़क पर युवा- 

आंगनबाड़ी, एनआरएचएम और विद्यार्थी मित्र जैसे लाखों संविदा कर्मचारी स्थायी नौकरी का संघर्ष एक दशक से कर रहे हैं। बीजेपी की सरकार संविदा कर्मचारियों के साथ भी धोखा कर रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन जैसे एक भी क्षेत्र में वसुंधरा सरकार की एक भी नीति चर्चा के लायक नहीं है।

इसी बौखलाहट में राजस्थान में सरकार के ख़िलाफ एकजुट हो रहे विपक्षी दलों, नेताओं, किसानों, मजदूरों, युवाओं, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और मुसलमानों की आवाज़ दबाने के लिए बीजेपी यह अध्यादेश लाने की फिराक में थी, जिससे कि विपक्ष की एकजुटता को तोड़ा जा सके और सरकार के खिलाफ उठ रही आवाज़ों को दबाया जा सके।

(लेखक जितेन्द्र महला राजस्थान के सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार हैं) 

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