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BJP-RSS को धर्म से नहीं जाति से पकड़िए, RSS को हिन्दुवादी कहने से उसका जातिवादी चरित्र छुप जाता है

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

वर्तमान में देश में जिस तरह का माहौल है और जिस तरह का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है उससे एक बात तो स्पष्ट है कि शिक्षण संस्थाओं को चलाने के तौर तरीकों से लेकर, लोगों की सोच में भी संघ अपना एजेंडा घुसा देना चाहती है। केन्द्र की मोदी सरकार के अलावा विभिन्न बीजेपी शासित राज्यों की भगवा सरकारें भी कहीं घमंड के साथ तो कहीं चुपके से उसी एजेंडे को आगे बढ़ा रही है।

जेएनयू के कुलपति प्रोफेसर एम जगदीश देशभक्ति जगाने के नाम पर जेएनयू परिसर में ही युद्ध टैंक रखवाने की बात कर रहे हैं तो माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता वि.वि. के कुलपति परिसर में गौशाला बनवा रहे हैं और सब्जी उगा रहे हैं।

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वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल कहते हैं कि ये सब तब तक चलता रहेगा जब तक लोग आरएसएस को धार्मिक संगठन कहते रहेंगे। आरएसएस तो चाहता है कि उसे धार्मिक संगठन कहा जाए। वो कहते हैं कि जो लोग आरएसएस को हिन्दूवादी और हिन्दुत्वादी संगठन कहते हैं वो जाने अनजाने आरएसएस के प्रचारक का ही काम करते हैं।

आरएसएस को हिन्दूवादी कहने से उसका घोर ब्राह्मणवादी चरित्र छुप जाती है और वो धर्म के नाम पर बीजेपी को वोट ट्रांसफर करवाने में सफल हो जाता है। अगर ऐसा नहीं है तो आजादी के बाद सिर्फ एक बार राजपूत जाति के रज्जू भैय्या को छोड़कर सर संघ चालक पद पर कभी कोई गैर ब्राह्मण क्यों नहीं बैठा?

दिलीप मंडल लिखते हैं कि-

नरेंद्र मोदी सरकार पिछले सवा तीन साल में तीन बार ही पीछे हटती नजर आई है.

1. रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के बाद उसे वाइस चांसलर को छुट्टी पर भेजना पड़ा और मानव संसाधन विकास मंत्रालय से मनुस्मृति ईरानी को हटाना पड़ा.

2. बिहार चुनाव में मोहन भागवत के आरक्षण वाले बयान के बाद उसे मुंह की खानी पड़ी. बीजेपी बुरी तरह हार गई.

3. ऊना में दलित उत्पीड़न के बाद नरेंद्र मोदी की दुलारी मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल को इस्तीफा दोना पड़ा.

तीनों मामलों में आप पाएंगे कि जाति एक फैक्टर के तौर पर मौजूद है.

आरएसएस और बीजेपी अपनी अंतर्वस्तु में ब्राह्मण संगठन हैं. जाति वर्चस्व कायम करना ही उसका लक्ष्य है. इसलिए आप आरएसएस या बीजेपी को धर्म के सवाल पर नहीं घेर सकते. वह धार्मिक संगठन है ही नहीं.

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वे लोग तो आरएसएस से कतई नहीं लड़ पाएंगे जो आरएसएस को हिंदुत्ववादी या हिंदू संगठन बोलते हैं.

RSS की हार जाति के मैदान पर ही होगी- 

उन मूर्खों को इतना भी समझ में नहीं आता कि जब आरएसएस खुद को हिंदुत्ववादी संगठन कहता है, तो उसे हिंदुत्ववादी संगठन साबित करके वे क्या हासिल कर लेंगे? आरएसएस की हार जाति के मैदान पर होगी. क्योंकि वह जातिवादी संगठन है.

RSS खुद को हिंदुत्ववादी संगठन कहता है. आप भी उसे हिंदुत्ववादी संगठन कहते हैं. मैं आपको RSS का आदमी क्यों न कहूं?
आपकी तो इतनी भी औकात नहीं है कि ब्राह्मणों के संगठन को ब्राह्मण संगठन कहें.

RSS हिंदुओं का संगठन है तो 85% हिंदुओं के आरक्षण का विरोध क्यों करता है? उसके शिखर पर लगभग हमेशा ब्राह्मण क्यों हैं?

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