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जानिए ! अलग देश की मांग द्रविड़नाडू का ब्राह्मणवाद और पेरियार से क्या है कनेक्शन

नई दिल्ली। नीरज भाई पटेल 

केन्द्र सरकार की गलत नीतियों और पीएम नरेन्द्र मोदी की देश की विभिन्न विचारधाराओं को एक साथ लेकर ना चल पाने की नाकामी का परिणाम है, द्रविड़नाडु की मांग. द्रविड़नाडु की मांग ने कई साल बाद फिर से सर उठाया है.

द्रविड़नाडु के रूप में भारत के चार राज्य मांग रहे हैं भारत से आजादी. दक्षिण भारत के लोगों का कहना है कि अगर ब्राह्मणवादी परम्पराओं से देश चलाना है तो हमें आजाद कर दो. द्रविडनाडु शब्द और द्रविड़नाडु राज्य की मांग वैसे तो व्राह्मणवादियों के खिलाफ पेरियार रामास्वामी नायकर ने की थी. लेकिन अब मोदी राज में एक बार फिर ये शब्द चर्चा में है. आइए जानते हैं कि इस शब्द की उतपत्ति कहां से हुई.

ब्राह्मणवाद के विरोध में बनी थी जस्टिस पार्टी- 

द्रविड़नाडु की जड़ में जाएं तो साल 1916 में टीएम नायर और राव बहादुर त्यागराज चेट्टी ने ग़ैर-ब्राह्मण की पहली पार्टी के तौर पर जस्टिस पार्टी बनाई. इस पार्टी ने साल 1921 में स्थानीय चुनावों में जीत हासिल की. सी.एन.मुदलिआर, सर पी. टी. चेट्टी और डॉ.टी. एम. नायर की मेहनत से ये संगठन एक राजनीतिक पार्टी बन गई. जस्टिस पार्टी 1920 से लेकर 1937 तक मद्रास प्रेसीडेंसी में सत्ता में रही.

पेरियार ने उठाई ब्राह्मणवाद से मुक्त द्रविड़नाडु देश की मांग- 

1944 में पेरियार ईवी रामास्वामी नायकर ने जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर ‘द्रविड़ कड़गम’कर दिया. ये उस समय ग़ैर राजनीतिक पार्टी थी, जिसने पहली बार द्रविड़नाडु (द्रविड़ों का देश) बनाने की मांग रखी थी. दरअसल पेरियार की नजर में शूद्र ब्राह्मणों द्वारा दी गई अपमानजनक संज्ञा थी इसलिए उन्होंने ‘शूद्र’ की बजाए ‘‘द्रविड़’’ शब्द का प्रयोग किया.

वो कहते थे कि ‘हमें द्रविड़ कहा जाए क्योंकि हम गौरवशाली सांस्कृतिक परंपरा के वारीस हैं’. उनका मानना था कि द्रविड़ लोगों को ब्राह्मणी व्यवस्था द्वारा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में गुलाम बनाकर रखा गया है. इसलिए द्रविड़ों को सम्मानजनक स्थिति देने के लिए स्वतंत्र ‘द्रविड़नाडू’ राज्य की स्थापना करन ही होगी. यहीं से द्रविड़नाडू के लिए जो आंदोलन खड़ा हुआ, उसने भारत देश के अंदर उत्तर भारतीय आर्यों से अलग दक्षिण भारतीय द्रविड़ों के लिए द्रविड़नाडू की मांग रखी.

जस्टिस पार्टी के सम्मेलन में उठी थी मांग – 

ईवी रामास्वामी की अगुवाई में जस्टिस पार्टी का सम्मेलन 1939 में हुआ, जिसमें उन्होंने कहा कि द्रविड़ों के लिए अलग द्रविड़नाडू की स्थापना हो. इससे पहले नारा था तमिलों के लिए तमिलनाडू , 1940 में जस्टिस पार्टी ने द्रविड़नाडू की मांग को लेकर रिजोल्यूशन पास किया.

द्रविड़नाडू के लिए जून 1940 में एक नक्शा पेरियार ने कांचीपुरम में जारी किया, जिसमें तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम यानी द्रविड़भाषी राज्यों के लिए अलग देश की मांग थी. ये मांग 40 से 60 के दशक में पूरी तरह से चली.

69 साल बाद फिर क्यों उठी द्रविड़नाडू की मांग- 

द्रविड़नाडु शब्द अचानक से ट्विर पर ट्रेंड क्यों हुआ इसका कारण बताते हुए वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल कहते हैं कि मोदी सरकार लोगों के खान-पान को निर्देशित कर रही है. जानवरों की खरीद फरोख्त को लेकर केन्द्र सरकार जो कानून बना रही है उससे दक्षिण भारतीय लोग खुद को असहज स्थिति में पा रहे हैं. वहां लोग बीफ खाते हैं और यहां बीफ चुनावी मुद्दा है.

दिलीप मंडल कहते हैं अगर मोदी सरकार लोगों के खान-पान और अन्य सांस्कृतिक मामलों में इसी तरह हस्तक्षेप करती रही तो फिर देश से अलग करने की मांग कई लोग उठाएंगे. वो कहते हैं कि इस बात से सवाल उठना लाजिमी है कि क्या वाकई बीजेपी सरकार को मिलाजुलाकर देश चलाना नही आता.

 कौन है पेरियार रामास्वामी नायकर- 

पेरियार नायकर का जन्म 17 सितम्बर 1879 ई. को एक ओबसी परिवार में तमिलनाडु के इरोड नगर मे हुआ था. और इनके पिता जी का नाम वंकेट नायकर था. पेरियार नायकर जी ब्राम्हणवाद, पाखंडवाद, अंधविश्वास, जातिपात, भेदभाव, रुढ़ीवाद के खिलाफ थे. तमिल भाषा में ‘पेरियार’ का मतलब ‘महापुरूष’ होता है।.पेरियार भारतीय द्रविड आन्दोलन के जन्मदाता हैं. वे ब्राह्मणवाद के कट्टर विरोधी रहे.

ब्राह्मणवाद को देश पर काला दाग मानते थे पेरियार-

पेरियार ब्राह्मणवाद को देश पर काला धब्बा मानते थे और इस दाग़ को मिटाने के लिए तामिलनाडु में आत्मसम्मान का आन्दोलन पेरियार रामस्वामी नायकर इनके नेतृत्व में चलाया गया. वे अज्ञान, शोषण, तर्क विसंगत रुढ़ी परंपरा के खिलाफ़ थे. कांग्रेस पार्टी में पिछड़ी जातियों के विकास के लिए नौकरी तथा शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण की मांग उन्होंने 1920 से लेकर 1925 तक लगातार कांग्रेस के सामने रखी लेकिन कांग्रेसियों द्वारा उनकी बात को नजरअंदाज करने से आहत होकर कांग्रेस से नाता तोड़ा लिया.

नये संगठन ‘द्रविड कड़गम’ की स्थापना कर आत्मसम्मान के आन्दोलन को आगे बढ़ाया. अपनी आयु के आखरी क्षणों में मद्रास में दिये गये भाषण में वे कहते हैं, ‘‘हमारी सरकार ब्राह्मणों के समर्थन में लोगों की एकता में दरार पैदा करने के लिए आमादा है. अन्य सभी लोगों को ब्राह्मणों का गुलाम बने रहना चाहिए ऐसा उन्हें न केवल लगता है बल्कि उनके द्वारा ऐसी व्यवस्था ही निर्माण की गई है। ब्राह्मण इस देश के मूलनिवासी नहीं हैं, टोली के रूप में एक घूमन्तू की तरह भारत में उनका प्रवेश हुआ. इनकी व्यवस्था को नष्ट करन ा ही मेरा मकसद है.
पेरियार रामस्वामी नायकर द्वारा चलाये गए सामाजिक परिवर्तन एवं आत्मसम्मान के आन्दोलन के परिणाम स्वरुप आज तामिलनाडु में पिछड़ी जाति के लिए सरकारी नौकरियों में 67 प्रतिशत तक आरक्षण की व्यवस्था लागू की गई है.

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