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भूखी जनता को दरकिनार कर, गुजरात चुनाव में बुलेट ट्रेन का सपना बेचने निकले, अच्छे दिन वाले PM मोदी

नई दिल्ली। मृत्युंजय प्रभाकर (नेशनल जनमत)  

तो आखिरकार देश भर को बुलेट ट्रेन का सपना दिखाकर 26 मई, 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले प्रधानमंत्री मोदी का सपना लगभग 40 महीने बाद धरातल पर आज पहला कदम रखेगा. उन्होंने 2014 के लोकसभा की चुनावी रैलियों में लगातार यह बात कही थी कि आपने उन्हें (कांग्रेस को) 60 साल दिया. मुझे 60 महीने दे दीजिए. मैं अपने काम से दिखा दूंगा कि देश कैसे चलता है.

पिछले 40 महीनों में प्रधानमंत्री उनके सरकार द्वारा बनाई गई किसी भी योजना का लोकार्पण नहीं कर पाए हैं. सरकार आने के बाद के शुरूआती महीनों में पूर्व कांग्रेस सरकार के कामों का फीता काटने में व्यस्त रहे प्रधानमंत्री के पास दिखाने के लिए भी पिछले 40 महीनों में कोई एक काम या योजना नहीं जो पूरी हुई हो.

आगे ख़ुद उनकी सरकार ने भी ऐसी कोई उम्मीद छोड़ दी है कि 2019 तक वो कोई काम पूरा करने वाले हैं इसलिए अब बार-बार 2022 की रट लगाए रहते हैं कि 2022 में यह होगा या वह होगा.

बुलेट ट्रेन का सपना- 

खैर, बात प्रधानमंत्री के बुलेट ट्रेन के सपने की करते हैं जो कि उनका ड्रीम प्रोजेक्ट रहा है और इसी का चकाचौंध दिखाकर वो सत्ता में आ भी पाए. बुलेट ट्रेन का सपना भारतीय मध्यवर्ग को सबसे ज्यादा उत्साहित करने वाला सपना रहा है जिसके कारण न सिर्फ मध्यवर्ग बल्कि देश के अमीर और गरीब वर्ग में भी मोदी जी की स्वीकार्यता बढ़ी और लोगों ने उन्हें पूर्ण बहुमत की सरकार सौंपी.

यह इस देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जो मोदी जी 12 साल गुजरात का मुख्यमंत्री रहने और अपने हर चुनाव में मेट्रो रेल का सपना दिखाने के बाद भी गुजरातियों को मेट्रो ट्रेन नहीं दे पाए उसी देश के लोगों ने इस बात पर भरोसा कर लिया कि वो 2019 तक देश में बुलेट ट्रेन दौड़ा देंगे. जबकि देश भर में कई मुख्यमंत्री हुए जिन्होंने अपने 5 साल के कार्यकाल में ही अपने राज्य को मेट्रो ट्रेन का तोहफा दिया.

भूखी-प्यासी और रोज के दर्द की मारी जनता को अच्छे दिन का सपना बेचने वाले मोदी जी ने आखिर बुलेट ट्रेन का सपना बेच दिया जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे के साथ मिलकर अहमदाबाद में उसकी नींव भी रख दी. इस प्रोजेक्ट में कुल अनुमानित लागत 1 लाख 10 हज़ार करोड़ है जिसका 80 फीसदी काम जापान से लोन लेकर पूरा किया जाएगा.

योजना 2023 में पूरी होने की बात है. प्रधानमंत्री की विशेष इच्छा है कि इसे अगस्त 2022 में किसी तरह शुरू किया जाए क्यूंकि उसी दिन भारत अपनी आज़ादी की 75 वीं वर्षगांठ मना रहा होगा. वैसे भी मोदी जी हर चीज़ 2022 में पूरी होते देखना चाहते हैं. उसके बाद का शायद उनको भी भरोसा नहीं है.

3 साल से किस बात का इंतजार कर रहे थे मोदी?

खैर, सबसे पहले तो यह कि अगर मोदी जी इसे सच में 2019 में न सही 2022 में ही अगर हकीक़त में देखना चाहते थे तो तीन साल से अपने विशेष रेल मंत्री सुरेश प्रभु को इस योजना पर बैठकर अंडे देते क्यों देख रहे थे? प्रभु को पार्टी और राजनीति की सारी मर्यादाएं तोड़कर रेल मंत्री बनाने का आखिर फिर मकसद क्या था.

जब टेक्नोक्रैट प्रभु को लाया गया था तो दलील दी गई थी कि उन्हें प्रधानमंत्री के सपने को समय पर पूरा करने के लिए लाया गया है. नतीजा प्रभु रेल भी नहीं चला पाए, न ही बुलेट चला पाए.

हकीक़त यह है कि अभी तक इस बुलेट ट्रेन का सर्वे तक ठीक से कम्पलीट नहीं हुआ है. महाराष्ट्र की सरकार ने मुंबई में उस व्यवसायिक भूखंड को देने से साफ़ मना कर दिया है जहाँ स्टेशन बनाने की बात कही गई थी. महाराष्ट्र की बीजेपी सरकार का कहना है कि स्टेशन रेलवे की ज़मीन पर बने.

यही बात अगर किसी और पार्टी की सरकार ने कही होती तो देरी का सारा ठीकरा उसपर फोड़ा गया होता. केंद्र और राज्य की बीजेपी सरकार मिलकर भी अभी तक इसका ठोस हल नहीं निकाल पाई है. उस पर आनन-फानन में उसकी नींव डाली जा रही है.

क्या देश के लिए सबसे जरूर सपना बुलेट ट्रेन है? 

अब सवाल यह कि देश के लिए सबसे जरूरी क्या आज की तारीख में बुलेट ट्रेन ही हो गया है. 1 लाख 10 हज़ार करोड़ की लागत से बनने वाले इस बुलेट ट्रेन का लाभ कितने लाख लोगों को नसीब होने वाला है? देश में जब रोज 4 करोड़ लोगों को ढोने वाली रेलवे खस्ताहाल चल रही है. रोज ही पटरियां उखड़ी मिल रही हैं.

ट्रेन हादसों का रिकॉर्ड बन रहा है. यात्री सेवाओं का बुरा है. पुरानी पटरियां दम तोड़ रही हैं. नई बिछाई नहीं जा रहीं. कारण कि फण्ड की कमी है. एक कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय रेलवे के कायाकल्प के लिए कुल 40 हज़ार करोड़ रुपयों की जरूरत है. इतने पैसों में सम्पूर्ण भारतीय रेलवे का कायाकल्प हो जाएगा.

देश की 125 करोड़ आबादी जिस पर निर्भर है, जिसकी सेवा का दंभ प्रधानमंत्री देश-दुनिया में भरते रहते हैं, वो इससे लाभान्वित होगी. लेकिन सरकार के पास इसके लिए पैसे नहीं हैं.

खैर, अगर मुद्दे की बात करें तो बुलेट ट्रेन की यह नींव देश की सेवा के ख्याल से तो कतई नहीं डाली जा रही. अहमदाबाद से मुंबई तक चलने वाली बुलेट ट्रेन भला देश की कितनी प्रतिशत आबादी की सेवा कर पाएगी? क्या गुजरात ही देश हो गया है? अगर उन्हें बुलेट ट्रेन की नींव रखनी ही थी तो पहली नींव दिल्ली-मुंबई बुलेट ट्रेन की होनी चाहिए थी. या कि दिल्ली-चेन्नई या दिल्ली कोलकाता की न कि अहमदाबाद-मुंबई की.

दरअसल, यह मोदी जी की पेट योजना है अपने राज्य के लोगों को फायदा देने के लिए. उन्होंने देश के संसाधन और धन का भारी दुरुपयोग अपने राज्य को फायदा पहुँचाने के लिए किया है. वो भी अमीर गुजरातियो को. इस तरह प्रधानमंत्री 125 करोड़ लोगों की सेवा का जुमला परोसकर अपने गुजराती समुदाय को फायदा पहुंचा रहे हैं. याद रखिये कि जापान से लिया गया कर्ज देश को चुकाना है, गुजरात सरकार को नहीं. इस तरह उन्होंने गुजरात की एक योजना का बोझ देश के कंधे पर लाद दिया है.

गुजरात चुनाव और बुलेट ट्रेन- 

हर कोई जानता है कि कुछ ही महीनों में गुजरात में चुनाव होने हैं. वहां बीजेपी की हालत ख़राब चल रही है. पाटीदार आंदोलन, सूरत के व्यावसाई आंदोलन और दलित आंदोलन ने उसकी हालत खस्ताहाल कर रही है. ऐसे में गुजरात के लोगों को बुलेट ट्रेन का झुनझुना पकड़ाया जा रहा है.

ताकि उसकी चकाचौंध में आकर गुजराती एक बार फिर बीजेपी को वोट दें. अगर गुजरात चुनाव इस साल न होकर 2018 में होते तो उसकी नींव 2018 में जाकर रखी जाती.

आप समझ रहे होंगे मैं मोदी विरोध में अंधा होकर बुलेट ट्रेन को नकार रहा हूँ. ऐसा नहीं है. बुलेट ट्रेन भारत का भविष्य हो सकती है. उसकी जरूरत भी है लेकिन क्या कोई भी भविष्य वर्तमान को नकारकर बनाई जा सकती है. भविष्य हमेशा वर्तमान की नींव पर बनती है.

मेरा विरोध बुलेट ट्रेन का नहीं है. बल्कि ठोस जरूरत की अनदेखी करने को लेकर है और एक जरूरी योजना के राजनीतिक इस्तेमाल को लेकर है. मोदी जी बुलेट ट्रेन के नाम पर कल भी देश की आँखों में धूल झोंक रहे थे और आज भी वही कर रहे हैं.

(लेखक मृत्युंजय प्रभाकर रंगकर्मी, लेखक और सामाजिक चिंतक हैं)

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