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अब बुंदेलखंड में सवर्णों के भगवान के दर्शन करने की दलितोें को मनाही, लोग बोले दलित वहां जाते ही क्यों हैं?

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद के दलित हितैषी होने का कितना भी दावा करें, सवर्ण कितना भी दिखावे के लिए बाबा साहेब की फोटो लगा लें। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमितशाह चाहे कितने भी दलितों के घर जाकर खाना खा लें लेकिन छुआ- छूत और जातिवाद ऐसा सामाजिक कोढ़ है जिससे छुटकारा पाना आसान नहीं है।

जातिवाद और छुआ-छूत की ताज़़ा घटना उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में हमीरपुर जिले के मौदहा के गढ़ा गांव की है। जहां रामजानकी मंदिर के पुजारी के जातिवादी फरमान के चलते गावों के दलितों में आक्रोश है।

वहीं इस घटना पर सामाजिक चिंतकों ने कड़ी प्रक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि बार-बार अपमानित होने और पीटे जाने के बाद भी दलित मंदिर में करने क्या जाते हैं? मंदिर कोई स्कूल या अस्पताल तो है नहीं कि वहां बिना जाए दलितों का उद्धार नहीं होगा।

दरअसल मंदिर के पुजारी कुंवर बहादुर सिंह ने दलितों के मंदिर में प्रवेश करने पर रोक लगा दी है। यहां तक मंदिर में रामायण का पाठ करने पहुंचे दलित बच्चे को मंदिर के पुजारी फटकार लगाई और उसे वहां से भगा दिया। पुजारी ने कहा कि मंदिर उसके पुरखों का है इसलिए यहां गांव का कोई भी दलित नहीं आ सकता।

रामजानकी मंदिर में एक पखवाड़े से रामायण का पाठ चल रहा है। मंदिर के पुजारी ने गेट पर एक बोर्ड टांग दिया है जिस पर लिखा है, मंदिर में दलितों का प्रवेश वर्जित है।

गांव में रहने वाले उमाशंकर श्रीवास ने बताया कि उनका भतीजा अपने साथी के साथ रामायण का पाठ करने मंदिर गया था, जिसे पुजारी ने घुसने से रोक दिया। शिकायत मिलने पर एसडीएम सुरेश मिश्रा ने कानूनगो और लेखपाल को जांच के लिए भेजा है।

एसडीएम के मुताबिक, मंदिर में दलितों के जाने पर पाबंदी लगाने की जानकारी मिली है। राजस्व विभाग की टीम को निरीक्षण के लिए गांव भेजा गया है। रिपोर्ट आने के बाद ही कार्रवाई की जाएगी।

उत्तर प्रदेश में दलितों के मंदिर में प्रवेश को लेकर यह कोई पहली घटना नही हैं। तमिलनाडु, उत्तराखंड, ओडीशा, और गुजरात के मंदिरों में भी दलितों के प्रवेश पर सख़्त पाबंदी लगाई जा चुकी है।

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