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प्रोफेसर मजूमदार का जातिवाद ! प्रेसीडेंसी वि.वि. से एक दलित-एक ओबीसी अध्यापक बर्खास्त

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

हम शांत हैं और अपनी बारी की प्रतीक्षा में हैं. जब तक हमारे साथ कुछ नहीं होगा हम उठकर खड़े नहीं होंगे. दूसरे के साथ गलत होने पर हम सिर्फ फेसबुक पर दुख जताएंगे. तो लीजिए फेसबुक पर दुख जताने का एक और मामला कोलकाता की पुरानी और प्रतिष्ठित प्रेसींडेसी यूनिवर्सिटी के रूप में सामने आया है.

इस बार वहां से एक दलित और एक ओबीसी शिक्षक को निकाल दिया गया है. ना सिर्फ निकाला गया बल्कि जातिवाद का जहर इस कदर था कि उनका सामान भी बाहर फेंक दिया गया है.

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जेएनयू के छात्र और सोशल एक्टीविस्ट जयंत जिज्ञासू लिखते हैं कि –

जलते घर को देखने वालो फूस का छप्पर आपका है
आग के पीछे तेज़ हवा है, आगे मुक़द्दर आपका है।
उसके क़त्ल पे मैं भी चुप था, मेरा नंबर अब आया
मेरे क़त्ल पे आप भी चुप हैं अगला नंबर आपका है।
(नवाज़ देवबंदी)

1817 में स्थापित 200 साल पुराना प्रेसिडेंसी कॉलिज जो अब विश्वविद्यालय बन गया है. जिसने देशो-दुनिया को साहित्य-संगीत-कला-सिनेमा-राजनीति-अर्थशास्त्र के क्षेत्र में विवेकानंद, बंकिमचंद्र चटर्जी, सुभाष चंद्र बोस, सत्यजीत रे, राजेंद्र प्रसाद, अशोक कुमार, अमर्त्य सेन समेत अनेकानेक लब्धप्रतिष्ठ विद्वान दिए हैं. आजकल जातीय विद्वेष का अड्डा बना हुआ है।

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मजूमदार मैडम को पसंद नहीं आए दलित ओबीसी शिक्षक-

विश्वविद्यालय के बोर्ड द्वारा तय की गई चयन प्रकिया से गुजरने के बाद भी हिन्दी विभाग की विभागाध्यक्ष तनुजा मजूमदार को दलित और पिछड़े अध्यापक पसंद नहीं आए. आखिरकार मनमाना आरोप लगाते हुए दोनों को निकाल बाहर कर दिया गया.

2016 मई में प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में दोनों का चयन हुआ था. दोनों शिक्षक प्रोबेशन पीरियड पर चल रहे थे. इलाहाबााद के रहने वाले दलित समुदाय के शिक्षक  डॉ. अनिल कुमार पुष्कर (चैक शर्ट में) और बिहार निवासी पिछड़े समाज से आने वाले शिक्षक डॉ. सत्यदेव प्रसाद (हरी सदरी में) दोनों का कसूर बस इतना था कि दोनों मैडम का जातिगत स्वाभिमान संतुष्ट नहीं कर पाए. आखिरकार विभाग की प्राध्यापक और विश्वविद्यालय की डीन तनुजा मजूमदार ने असंतोषजनक प्रदर्शन का झूठा आरोप लगाकर नियुक्ति रद्द कराने की साज़िश रच डाली.

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एक ने जेएनयू से तो एक ने डीयू से पीएचडी की है. 

डॉ. अनिल कुमार पुष्कर ने एमए, एमफिल और पीएचडी (भारतीय भाषा केन्द्र) जवाहर लाल नेहरु जैसे देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से जबकि डॉ. सत्यदेव प्रसाद ने दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग से पीएचडी की है.

अब सवाल ये है कि देश के इन प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से पीएचडी करने के बाद और प्रेसीडेंसी विश्वविद्यालय की चयन प्रक्रिया में चयनित होने के बाद भी ये शिक्षक प्रोफेसर मजूमदार को पसंद क्यों नहीं आए. इस जातिवादी देश में जाति के अलावा और कौन सा कारण समझा जाए.

डॉ. अनिल बताते हैं कि प्रोफेसर मजूमदार विभाग की इकलौती प्रोफेसर हैं,. मनमाना आरोप गढ़कर उनको बाहर किया गया है.  प्रोफेसर दस साल से लगातार विभागाध्यक्ष हैं. अभी बाक़ी सभी वहां सहायक प्राध्यापक हैं. इसलिए प्रोफेसर मजूमदार के सामने नियम कायदे कानून और हमारी डिग्रियां सब बेकार हैं.

मुख्यमंत्री से राज्यपाल कहीं कोई सुनवाई नहीं- 

दोनों शिक्षक बर्खास्त किए जा चुके हैं. जबकि वहां के विद्यार्थियों का कहना है कि उक्त शिक्षकों के पढ़ाने का तरीका बिल्कुल भिन्न रहा है, और अपने आप में नायाब भी. वहीं डा. तनुजा छात्रों को आए दिन धमकाती रहती हैं कि अगर इन शिक्षकों के पक्ष में खड़े हुए, तो गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहो. दोनों प्रताड़ित शिक्षकों ने रजिस्ट्रार, कुलपति,  प्रदेश के शिक्षा मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल, सब तक अपनी बात पहुंचाई, मगर कोई जवाब नहीं मिला है.

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सामान तक फेंक दिया गया बाहर- 

लगातार दोनों शिक्षकों को बार-बार कैम्पस खाली करने का नोटिस भेजकर विश्वविद्यालय प्रशासन मानसिक रूप से प्रताड़ित करता रहा, और दो दिन पूर्व अनिल पुष्कर को बिना अंतिम रूप से काल किए उनका सामान उनके आवास से फेंक बाहर कर दिया गया।

ऐसे आज़ाद भारत का सपना तो हमारे पूर्वजों ने नहीं देखा था. हम अपने शिक्षकों, नौजवान साथियों, समाजसेवियों, बुद्धिजीवियों और पत्रकार मित्रों से अपील करते हैं कि वे इस मामले में लिखें, बोलें, दिखाएं, लोगों तक सच को पहुंचाएं कि उच्च शिक्षा ग्रहण कर, अपनी योग्यता व अध्यवसाय से उपाधि व ख्याति अर्जित करने के बावजूद अकादमिक जगत में कुंडली मारकर बैठे जातिवादी मानसिकता से ग्रस्त ज्ञानी-ध्यानी लोग बहुधा वंचित-शोषित समाज के लोगों को योग्य मानने को तैयार नहीं।

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