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चुनाव आयुक्त जैसा पद लेने के बाद भी अचल कुमार ज्योति गुजरात सरकार के बंगले में क्यों बने रहे ?

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

गुजरात में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान होने के बाद भी हिमांचल प्रदेश के साथ गुजरात चुनाव की तारीखें घोषित ना करना चुनाव आयोग के ऊपर कई सवाल छोड़ गया है। सवाल वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त और मोदी के सीएम रहते हुए गुजरात के मुख्य सचिव रहे अचल कुमार ज्योति की निष्ठा पर भी खड़े हो रहे हैं।

विपक्षी दलों के साथ ही सोशल मीडिया पर भी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठते सवालों के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त अचल कुमार ज्योति को गुजरात सरकार से मिले बंगले का मामला तूल पकड़ता दिख रहा है।

सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट) की गुवाहाटी बेंच में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी सतीश चंद्र वर्मा द्वारा दायर मुकदमे से जुड़े दस्तावेजों से ये बात सामने आई है कि देश के मुख्य चुनाव आयुक्त अचल कुमार ज्योति ने गुजरात सरकार द्वारा अहमदाबाद में आवंटित किया गया बंगला चुनाव आयुक्त जैसे संवैधानिक पद पर रहते हुए भी खाली नहीं किया था।

संवैधानिक पद पर रहते हुए किसी सरकार की सेवाएं लेना उचित नहीं- 

यह बंगला ज्योति सरकारी सेवा में रहते हुए आवंटित किया गया था. इसका मतलब है कि एक बेहद अहम संवैधानिक पद पर नियुक्त होने के एक साल से ज्यादा समय बाद तक वे गुजरात सरकार के बंगले में रहते रहे, जबकि यह पद राजनीतिक पार्टियों और सरकारों से पूर्ण स्वतंत्रता की मांग करता है.

यह जानकारी खासकर इसलिए अहम हो जाती है क्योंकि भारत के चुनाव आयोग ने 12 अक्टूबर को अपनी ही परंपरा को तोड़ते हुए गुजरात चुनाव की तारीखों की घोषणा को टाल दिया जिससे गुजरात में आदर्श आचार संहिता को लागू करने में देरी हुई।

कांग्रेस ने देरी पर आरोप लगाते हुए कहा था कि मोदी जी को गुजरात जाकर जुमलेबाजी करने के लिए चुनाव आयोग ने वक्त दिया है। विपक्ष ने कहा कि आचार संहिता का मकसद सत्ताधारी दल और उसके प्रतिद्वंद्वियों को बराबरी का मौका देना होता है। इस कदम की विपक्ष के साथ-साथ पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों द्वारा भी आलोचना की गई है.

ज्योति 1975 बैच के गुजरात कैडर के आइएएस अधिकारी हैं और विभिन्न पदों पर रहते हुए 31 अक्टूबर, 2013 को गुजरात के मुख्य सचिव के बतौर सेवानिवृत्त हुए।

रिटायरमेंट के बाद वे राज्य के विजिलेंस कमीशन में विजिलेंस कमिश्नर बनाए गए। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने उन्हें 13 मई, 2015 को भारत के चुनाव आयोग में चुनाव आयुक्त के तौर पर नियुक्त किया। उन्होंने 6 जुलाई, 2017 को मुख्य चुनाव आयुक्त का पद संभाला।

संवैधानिक पद है चुनाव आयुक्त- 

साल 2015 से ज्योति एक संवैधानिक पद पर हैं. उनके इस पद पर आने से पहले गुजरात सरकार ने उन्हें जो आवास आवंटित किया था, उसे अपने पास रखना और बाद में राज्य सरकार से विशेष कृपा का आग्रह करना, मुख्य चुनाव आयुक्त के तौर पर अपनी जिम्मेदारियों को स्वतंत्रतापूर्वक निभा सकने की उनकी क्षमता को लेकर सवाल खड़े करता है।

आईपीएस अधिकारी सतीश चंद्र वर्मा को गुजरात से मेघालय तबादला होने पर तत्काल अपने सरकारी आवास को छोड़ने का आदेश दिया गया था. वर्मा, उस विशेष जांच दल के सदस्य थे। जिसने इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ मामले की तहकीकात की थी, जिसके परिणामस्वरूप गुजरात के कई पुलिस अधिकारियों को चार्जशीट किया गया था।

सतीश चंद्र वर्मा का कहना है कि इस कारण से राज्य सरकार उनके खिलाफ बदले की भावना से कार्रवाई कर रही है। अपने बचाव में उन्होंने आरटीआई दस्तावेजों का हवाला दिया है, जो दिखाते हैं कि उनके घर को खाली कराने का फैसला गुजरात सरकार के अधीन अकोमेडेशन अलॉटमेंट कमेटी द्वारा किया गया, जबकि ‘कई ऐसे अधिकारी थे, जो अपने आवासों पर अवैध कब्जा जमाए हुए थे।

टाइम्स ऑफ इंडिया से ज्योति ने कहा- 

‘मुझे दिल्ली में घर चुनाव आयोग में मेरी नियुक्ति के एक साल बाद आवंटित किया गया. मैंने गुजरात सरकार से अहमदाबाद के दफनाला इलाके में मिले घर में बने रहने देने की गुजारिश की थी क्योंकि मैं दिल्ली के गुजरात भवन में अपनी पत्नी के साथ एक साल तक नहीं रह सकता था। मैंने गुजरात सरकार के नियमों के मुताबिक किराया चुकाया है.’

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