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भीड़तंत्र: ‘ये वही लोग हैं जो दुर्गा पूजा की भीड़ में महिलाओं के अंगों को छूने के बहाने ढूंढ़ते हैं’

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो।

भारत को 15 अगस्त 1947 को आजादी मिली और 26 जनवरी 1950 को इस देश ने गणतंत्र अपनाया। गणतंत्र अपनाने के लगभग 70 साल के भीतर ये देश लोकतंत्र के मानवीय मूल्यों से आगे निकलकर भीड़तंत्र के जंगली, अराजक औऱ तालिबानी मूल्यों की तरफ बढ़ रहा है. आज देश में भीड़ की शक्ल में घूम रहे हिंसक लोगों ने देश के लोकतंत्र का अपहरण कर लिया है।

कमाल की बता ये है कि भीड़ की शक्ल में घूम रहे इन दरिंदों के आगे देश की पुलिस, देश के न्यायालय, देश के लॉ एंड ऑर्डर को लागू करने वाली सारी एंजेंसियांं बेबस हैं. देश का अमन पसंद आम आदमी देश के ये हालत देखकर दुख और आक्रोश का मिला-जुला भाव प्रकट कर रहा है. रांची विश्वविद्यालय की छात्रा और फेसबुक पर सामाजिक मुद्दो को लेकर सक्रिय चाहत अन्वी ने इसी लोकतंत्र को भीड़तंत्र में बदलते देखकर अपनी वेदना प्रकट करते हुए फेसबुक पर लिखा है कि..

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फोटो-  चाहत अन्वी

भीड़ के इस रूप के बारे में आपके क्या ख्याल है?

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः ।

यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।।

कहने वाले इस देश में एक मानसिक रूप से विक्षिप्त औरत को बच्चा चोर का आरोप लगा कर पहले ट्रैक्टर से बांधा जाता है, निःवस्त्र किया जाता है और इतनी पिटाई की जाती है कि ये मर जाती है और ये सब हुआ केवल शक के आधार पर.

ये वही भीड़ है जो मध्यमवर्गीय शहरों में दुर्गा पूजा की भीड़ में महिलाओं के अंगों को छूने के बहाने ढूंढती है तो कभी यही भीड़ बंगलौर जैसे हाई प्रोफाइल शहर में रात का बहाना ढूंढती है

औरतों पर सामुहिक हमलें करने के लिए और यही वो भीड़ है जो गाँव में औरतों को डायन करार दे कर निर्दयता से मार देती है. महिलायों के प्रति भीड़ का स्वरुप तो और खतरनाक हो गया है जहाँ कुछ उन्हें केवल पिटाई से संतुष्ट हो जाते है, तो कुछ उन्हें निवस्त्र कर के अपने गुस्से का प्रदर्शन का इजहार करते है. इस भीड़ में गुनाहगार वो लोग भी है जो किसी को बचाने की बजाय फोटो लेने या वीडियो बनाने तक की अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं.

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इसे पोस्ट को लिखने के बाद चाहत को अगले दिन एक दूसरी पोस्ट लिखनी पड़ी- 

कल शाम को मैनें बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में एक विक्षिप्त महिला जिनकी हत्या केवल बच्चाचोर होने के शक के आधार पर हुई थी उसपर एक पोस्ट लिखा था और देखते ही देखते इसे हज़ारो लोगों ने शेयर किया. वो 42 साल की मुस्लिम महिला थी उनका नाम मैंने इसीलिए नहीं लिखा क्योंकि उनकी हत्या भीड़ ने की थी और भीड़ का कोई धर्म नहीं होता अगर होता तो आयूब को मस्ज़िद के बाहर मारा नहीं जाता.

हम इस सत्य से मुँह नहीं मोड सकते कि कई मामलों में ये बात अपवाद है. कुछ लोगों ने इस पोस्ट को मोदी तो कुछ ने ममता विरोधी बना दिया और कुछ महानुभवो ने इस औरत को हिन्दू महिला पर होने वाला अत्याचार बता दिया. चाहे वो भीड़ किसी ट्रैन की हो, मुर्शिदाबाद की हो या फेसबुक की इसके पास सच और झूठ के कारणों को जानने का समय नहीं होता. मैं जानती हूँ अपवाहों में इतनी ताकत है कि संयम रखना मुश्किल होता है फिर भी धैय और स्वयं का विवेक बहुत जरुरी है.सनसनी के इस दौर में अपनी संवेदनाओं को न मरने दें.

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