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आप मानते होंगे खुद को ‘चाणक्य’ नीतीश बाबू, पर पन्ने पलटिए तानाशाह के साथ जो गया वो खत्म हो गया

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

बिहार में आखिरकार वहीं हुआ जो उत्तर प्रदेश में 1995 में समाजवादी पार्टी और बहुतन समाज पार्टी के साथ हुआ था। उसके पीछे भी इसी शातिर बीजेपी की चाल थी। तब से उत्तर प्रदेश में पिछड़े-दलितों के बीच जो राजनीतिक खाई बढ़ी है वो आज तक पाटी नहीं जा सकी।

आज बिहार में भी बीजेपी अपने मंसूबों में कामयाब हो गई इस सियासत से केवल एक राज्य की सत्ता का संबंध नहीं है. संबंध है पिछड़े समाज की एकता का। इस एकता को तोड़ने के विलेन के रूप में खुद को राजनीति का चाणक्य मानने वाले नीतीश कुमार का नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया है।

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इस पूरी कहानी को जेएनयू के शोधार्थी और सामाजिक कार्यकर्ता जयंत जिज्ञासु की नजर से समझिए-

याद रहे नीतीश बाबू कि बिहार उड़ती चिड़िया को हल्दी लगाता है। इस बार बढ़िया से लग जाएगा, आप उड़िए तो ज़रा ‘सुशासन’ बाबू। आपके चारों तरफ जो ‘हरिश्चन्द्र’ बैठे हैं, वो आपको मटियामेट न करा दिए, तो फिर काहे की भाजपा ? होंगे ‘चाणक्य’ आप अपनी जगह, पर मोदी जी बख़्शते किसी को नहीं। एक-एक चीज़ याद रहती है उन्हें।

पासवान, अनुप्रिया का हाल नहीं देखें क्या ?

रामविलास पासवान को पहले मनाया, अब बीच-बीच में याद दिलाते रहते हैं कि अच्छा आप ही हैं जो दंगाफ़साद के नाम पर इस्तीफ़ा दे दिए थे। कैबिनेट में रखके इतनी धुनाई उनकी होती है कि वो कोई बयान तक नहीं दे पाते। बेटे उनके आजकल भगवा गमछा गले में लपेटे रहते बैं। ज़ल्दी ही पार्टी का विलय कराने के मूड में लगते हैं। यही हाल यूपी में अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल का बना रखा है। स्वास्थ्य विभाग में तल रहे खेल पर सामाजिक न्याय की नेता को खामोश ही रहना पड़ता है।

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एक ही तरह के व्यक्तिवादी व आत्ममुग्ध स्वभाव के चलते आप जिनसे मन ही मन ईर्ष्या करते हैं, वो मोदी जी तो ‘सदाबहार अंतरराष्ट्रीय नेता’ हो गए, अब आपको भी राष्ट्रीय नेता बनने का नशा शराबबंदी के बाद चढ़ा है, तो भाजपा में जदयू का विलय करा दीजिए। वैसे अनौपचारिक ढंग से तो कहिये तो आप उस ओर कदम बढ़ा ही चुके हैं.

आडवाणी जी की गति भूल गए- 

जैसे ही प्रचार की कमान मोदी जी को सौंपी गई, आडवाणी जी रूठ गए, पहले इस्तीफ़ा दिया, फिर मान गए। घर से निकले, गाड़ी में चढ़े, फिर गेट के पास से गाड़ी लौटा ली। आके ब्लॉग लिख डाला। देख ही रहे हैं उनकी गति। जोशी जी बनारस छोड़ने पर नानुकूर कर रहे थे, आजकल उनका हालचाल पूछ लिया कीजिए। आप तो नेताद्वय के प्रियपात्र रहे हैं।

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सिर्फ स्मृति ईरानी को माफ किया है मोदी जी ने- 

मोदी जी ने अगर किसी को माफ़ किया है तो सिर्फ़ एक व्यक्ति को, वो हैं स्मृति ईरानी, जिन्होंने गुजरात दंगे के बाद बयान दिया था कि अगर थोड़ी भी मर्यादा है, और कुर्सी का लोभ नहीं है, तो पार्टी विद डिफ़रेंस कही जाने वाली भाजपा चाहेगी कि मोदी जी इस्तीफ़ा दे दें।खैर ये अलग मसला है कि उनके पास अब दो-जो मंत्रालय हैं।

आपको क्या लगता है मोदी भूले होंगे वो सब- 

और, आपको क्या लगता है कि ऐन वक़्त पर गठबंधन तोड़ कर मोदी जी के ‘शुभ’ कार्य के आरंभ में ही आपका विघ्न डालना वो भूल गए होंगे ? अभी इसीलिए डोरे डाले जा रहे हैं कि एक बार चंगुल में आएं तो ‘अलौकिक’ नीतिकार, फिर मज़ा चखाएंगे सहला-सहला कर। न पटना के रहेंगे न दिल्ली के।

अब तो बहुतों की ख़्वाहिश हो गई थी कि आप रोज़-रोज़ की नौटंकी बंद करें और चले जाएं अपने पुराने यार के पास जिनका “2002” के ठीक बाद आप गुजरात की सीमाओं में बंधे रहना देख नहीं पा रहे थे। मगर जब उनकी सेवा देश को मिलने ही जा रही थी कि अचानक वो आपको संविधान के भक्षक नज़र आने लगे, और आपने 17 साल पुरानी यारी तोड़ डाली।

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पिछले दिनों अचानक उनके फ़ैसले आपको देशहित में नज़र आने लगे, और वो महान संविधानरक्षक हो गए। मोदी जी की याद्दाश्त हाथी की तरह है, सो याद रहे।

केसी त्यागी का चरित्र किसी से छिपा नहीं- 

और, ये जो आपके प्रवक्ता के. सी. त्यागी चबा-चबा के बोलते हैं न, इसी आदमी ने दिल्ली विश्वविद्यालय की एक लड़की के साथ बाबू जगजीवन राम के बेटे के सेक्स वीडियो के सूर्या मैग्ज़ीन में छपने के पीछे की पटकथा गढ़ी थी, ताकि बाबूजी की छवि धूमिल हो और वो प्रधानमंत्री की रेस से हमेशा के लिए बाहर हो जाएं (जिन चंद लोगों ने पूरी साज़िश रची थी, उनमें त्यागी अग्रणी भूमिका में थे)। चैनल पर ये कुछ भी बोलें, अंदर से वंचित तबके के विरोधी हैं। ये तमाम लोग भाजपा के साथ नैसर्गिक रूप से ज़्यादा सहज रहते हैं।

दूसरे प्रवक्ता संजय सिंह, इस आदमी को हमने पासवान जी के भाई के यहाँ ह्वीलर रोड, पटना स्थित कार्यालय में टेंट लगाते देखा है। पहले लोजपा के प्रवक्ता थे। उस वक़्त भी ये सबके ‘दरबार’ में चक्कर काटते रहते थे। नीतीश कुमार जी, ऐसे भगोड़े क़िस्म के लोग आपको शुरू से पसंद आते रहे हैं। आपके जैसा विधायकों की गाय-भैंस की तरह ख़रीद-फ़रोख्त करने वाला आदमी बिहार की राजनीति में कम ही पैदा हुआ है।

आपकी सरकार ही बनी लोजपा विधायकों को करोड़ में ख़रीदकर, उस दल को छिन्नभिन्न करने की बुनियाद पर। 2015 में राजद को तोड़ने में ही लगे थे। अब लालू से जिनको चिढ़ है तो आपके जैसे तिकड़मी आदमी भी उन्हें भाएंगे।

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लालू यादव के बारे में क्या पहले से पता नहीं था- 

लालू प्रसाद, उनकी मीडिया-निर्मित छवि और उनके दल के बारे में सारी जानकारी के साथ आपने गठबंधन किया था। आपको कहीं से अंधेरे में नहीं रखा गया था। दूर बैठकर और बंद कमरे में मज़े लेने की आपको पुरानी लत है। यह अकारण नहीं कि तेजप्रताप को छोड़कर तेजस्वी निशाने पर हैं, क्योंकि आप भलीभांति जानते हैं कि भविष्य में आपके लिए कोई चुनौती पेश करेगा तो वह शख़्स तेजस्वी है, तेजप्रताप नहीं। नीतीश जी अपनी छवि ज़ेब में रखे रखिए, भले सिद्धांत बंगाल की खाड़ी में विसर्जित हो जाए। अपनी इन्हीं आदतों के चलते आप बस मुख्यमंत्री ही रह गए।

फिर कहूंगा सुशासन बाबू कि बिहार उड़ती चिड़िया को हल्दी लगाता है। बढ़िया से चिन्हा गए हैं आप जनता की नज़र में। एक बार इधर से अलग तो होइए, और उधर की तरफ अपनी मुड़ी तो घुमाइए। मीडिया में तमाम लानत-मलानत के बावजूद लालू का वोटर टस से मस नहीं हुआ है।

इसलिए नहीं कि उनके तमाम समर्थक येन-केन-प्रकारेण धनार्जन के पक्षधर हैं, बल्कि इसलिए कि उन्हें मालूम है कि यह बदले की राजनैतिक कार्रवाई है। गिन-चुन कर निशाना बनाया जा रहा है, ये वो समझते हैं, और शायद इसीलिए वे और मज़बूती से लालू के पक्ष में गोलबंद होंगे। बेनामी संपत्ति पर हमला बोलना है, तो हो जाए सभी सांसदों, विधायकों और मंत्रियों की यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरी ज़ायदादों की जांच।

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बिहार में जननेता दो ही हुए कर्पूरी ठाकुर-लालू यादव- 

बिहार में जननेता कोई हुए, तो बस दो ही आदमी – एक कर्पूरी ठाकुर, दूसरे लालू प्रसाद। कर्पूरी जी में कभी धनलिप्सा नहीं रही, इसलिए उन्हें लोग जननायक के रूप में याद करते हैं। और, लालू प्रसाद विशाल जनाधार के बावजूद किंचित संचय की प्रवृत्ति के चलते बहुत बड़े वर्ग के जनमानस से उतरते चले गए, और उन्हें पता भी नहीं चला।

अपने आरंभिक दिनों में कुछ काम ही ऐसा वो कर गए कि इतिहास के पन्ने से उन्हें मिटाया नहीं जा सकेगा। शायद इसीलिए उनकी ग़लतियों को बहुसंख्यक जनता भुलाती रही है, बार-बार मौक़े देती रही है।

पर, यह वक़्त उनके पुत्र के लिए बेदाग़ रहने का है। वो ग़लतियाँ कतई न दुहराएं, जो अतीत में लालू जी से हुईं। फूंक-फूंक कर क़दम रखना होगा। चालें चली जा चुकी हैं। असली लड़ाई 2019 और 20 में होगी। चंद मीडिया घराना उकसाएगा, पर मीडिया से उलझने का नहीं है।

अभी सारे अच्छे लोग समाप्त नहीं हो गए हैं या कि इस सत्ता के आगे घुटने नहीं टेक दिए हैं। कड़वे से कड़वा सवाल क्यों न हो, पत्रकारों के प्रश्नों से क़ायदे से ही गुज़रना है, और माकूल जवाब देना चाहिए। समर्थकों को नाज़ुक घड़ी में भी संभले रहने का संदेश देना होगा। तेजस्वी

सब्र से जनता के मैदान में बने रहें, जूझते रहें।
लड़ने वाले को ही ज़माना याद रखती है।

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