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खबरदार ! छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की मदद करने जाओगे बीजेपी सरकार जेल में ठूंस देगी !

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

केन्द्र में पीएम नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार बनते ही पूरे देश के बीजेपी शासित राज्यों में अजीब से निर्णय देखने को मिल रहे हैं। भीड़ तो खानपान के नाम पर मुस्लिमों-दलितों को निशाना बना ही रही है। कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वालों की भी कार्यशैली में बदलाव आ गया है। ऐसा लग रहा है जैसे अधिकारियों में जानबूझकर संघी मानसिकता डालने की कोशिश की जा रही हो।

छत्तीसगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ऐसे ही रोंगटे खड़े कर देने वाले एक मामले का जिक्र कर रहे हैं पढ़िए-

अगर पैसे वालों से रिश्वत लेकर पुलिस अधिकारी जनता के ऊपर अत्याचार करने लगे तो उसकी शिकायत जनता अदालत में कर सकती है।एक जगह के नागरिकों के ऊपर अगर कहीं अत्याचार होता है तो दूसरी जगह से नागरिक जाकर पीड़ित नागरिकों की मदद कर सकते हैं। छत्तीसगढ़ के बस्तर में ऐसा ही हुआ है जो देश के लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक अच्छा कदम है।

समाजसेवियों और पत्रकारों को जेल में डाल दिया पुलिस ने- 

पीड़ित आदिवासियों का हाल जानने और उन्हें कानूनी मदद देने के लिए जब आंध्र प्रदेश से हाईकोर्ट के कुछ समाजसेवी वकील और पत्रकार बस्तर के आदिवासियों का हाल जानने के लिए वहां पर आए तो बस्तर के भ्रष्ट पुलिस अधिकारी आईजी कल्लूरी ने हाईकोर्ट के वकील और पत्रकारों की 7 सदस्यीय टीम को पकड़ कर जेल में डाल दिया।

कल्लूरी ने इन सभी समाजसेवियों पर झूठा इल्जाम लगाया कि यह लोग नोटबंदी के बाद पुराने एक लाख रुपए के नोट लेकर बस्तर के आदिवासियों के पास बदलवाने के लिए आए थे।

7 महीने रहना पड़ा जेल में – 

इन सभी वकील और पत्रकारों को करीब 7 महीने जेल में रहना पड़ा। कोई भी सामान्य बुद्धि का इंसान भी समझ सकता है कि हैदराबाद से बस्तर तक सफर करके सिर्फ एक लाख रुपया बदलवाने के लिए 7 वकील और पत्रकार बस्तर आएंगे क्या? वह भी गरीब आदिवासियों से यह कहने के लिए कि हमारा एक लाख रुपया बदल दीजिए। हिमांशु कुमार सवाल करते हैं आदिवासियों के पास जैसे नए नोटों का बैंक खुला हुआ हो।

खैर अब कल्लूरी को बस्तर से हटा दिया गया है- 

2 दिन पहले इन सातों वकील और पत्रकारों को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट बिलासपुर ने जमानत पर रिहा कर दिया है। इनकी पैरवी मानवाधिकार संगठन ‘ह्यूमन राइट्स ला नेटवर्क’ से जुड़े प्रसिद्ध अधिवक्ता अमरनाथ पांडेय और किशोर नारायण ने की।

पुलिस द्वारा यह पूरा फर्जी मामला इसलिए बनाया गया ताकि अब बाहर से कोई भी समाजसेवी या मानवाधिकार कार्यकर्ता या वकील आदिवासियों की मदद करने के लिए छत्तीसगढ़ ना जा सके।

आदिवासियों को अलग-थलग करके मारने और उनकी जमीन छीनने का यह सरकारी अभियान अब एक अपराध की शक्ल ले चुका है,
इसमें भाजपा सरकार ने कानून संविधान और लोकतंत्र को पूरी तरह कुचल दिया है और सरकार एक सड़क छाप गुंडे की तरह व्यवहार कर रही है।

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