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कांग्रेस-बीजेपी की गुलामी में जाटों के घुटने घिस गए, चौधरी साहब को नहीं मिला भारत रत्न

दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

कांग्रेस और बीजेपी की दलाली करते-करते जाटों के घुटने घिस गये, लेकिन अब भी राष्ट्रनायक-किसान मसीहा चौधरी चरण सिंह को बीजेपी और कांग्रेस भारत रत्न के क़ाबिल नहीं समझतीं. ये कहना है राजस्थान के युवा पत्रकार और समाजसेवी जितेन्द्र महला का.

दरअसल आज 29 मई को चौधरी चरण सिंह की पुण्यतिथि है. ऐसे में उनके समर्थक चौधरी साहब को भारत रत्न देने की मांग को लेकर मुखर हैं. जितेन्द्र महला आगे कहते हैं.

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सामाजिक न्याय के पक्षधर थे चौधरी साहब- 

जो क़ौम अपने इतिहास और महापुरुषों की नहीं हो सकती वो किसी की नहीं हो सकती, वह अपने आप को धोखा दे रही है. चौधरी साहेब ने बार-बार हमें बताया कि ये लोग सुविधा भोगी और अमीर लोग हैं ये गाँव, किसान, गरीब और मजदूरों की पीड़ा कभी नहीं समझ सकते. इनसे बचकर रहना ये सिर्फ धोखा देते हैं. इसी सोच के साथ उन्होंने ग़रीबों, किसानों, पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों के हित में अलग से सामाजिक न्याय की राजनीति की शुरूआत की.

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फिर भी जाट बीजेपी और कांग्रेस की दलाली करना नहीं छोड़ते. क़म्बखत, हद दर्जे के एहसानफरामोश हैं. वो लोगों से सवाल करते हैं बताओ है. की नहीं ?

आदर्श जाट महासभा ने भी की भारत रत्न देने की मांग-

किसान नेता चौधरी चरण सिंह की पुण्यतिथि पर उनके कार्यों के नमन करके हुए अखिल भारतीय जाट महासभा ने किसानों के नेता चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न देने की मांग की.  अखिल भारतीय आदर्श जाट महासभा के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. जेएस जाट ने कहा कि अगर सरकार चौधरी साहब को भारत रत्न नहीं  देती तो फिर किसान अपने नेता के सम्मान में सड़को पर भी उतर सकता है.

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चौधरी चरण सिंह का सफरनामा- 

कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित हुआ था, जिससे प्रभावित होकर युवा चौधरी चरण सिंह राजनीति में सक्रिय हो गए. उन्होंने गाजियाबाद में कांग्रेस कमेटी का गठन किया. 1930 में जब महात्मा गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया तो उन्होंने हिंडन नदी पर नमक बनाकर उनका साथ दिया. जिसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा।

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वो किसानों के नेता माने जाते रहे है. उनके द्वारा तैयार किया गया जमींदारी उन्मूलन विधेयक राज्य के कल्याणकारी सिद्धांत पर आधारित था. एक जुलाई 1952 को यूपी में उनके बदौलत जमींदारी प्रथा का उन्मूलन हुआ और गरीबों को अधिकार मिला. उन्होंने लेखपाल पद का सृजन भी किया. किसानों के हित में उन्होंने 1954 में उत्तर प्रदेश भूमि संरक्षण कानून को पारित कराया.

मंडल कमीशन की स्थापना की – 

वो 3 अप्रैल 1967 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. 17 अप्रैल 1968 को उन्होंने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया. मध्यावधि चुनाव में उन्हेअच्छी सफलता मिली और दोबारा 17 फ़रवरी 1970 को वे मुख्यमंत्री बने. उसके बाद वो केन्द्र सरकार में गृहमंत्री बने तो पिछड़ी जातियों के विकास का खांका तैयार करने के किलए उन्होंने मंडल और अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की. 28 जुलाई 1979 को चौधरी चरण सिंह समाजवादी पार्टियों तथा कांग्रेस (यू) के सहयोग से प्रधानमंत्री बने.

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