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चाइनीज झालर वाले देशभक्तों, आपकी योगी सरकार स्कूलों में लगवा रही है MADE IN CHINA बायोमैट्रिक मशीन

नई दिल्ली। नेशनल  जनमत ब्यूरो 

देश में हिस्सेदारी, रोजगार, शिक्षा जैसे जरूरी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए बीच-बीच में, सरकार पोषित देशभक्त चाइना की 15 से 25 रुपये की झालरों का विरोध करने सड़कों पर उतर पड़ते हैं। चाइनीज झालर का विरोध करने वाले राष्ट्रवादी टाइप के वीर, चाइना मोबाइल से ही फोटो खींचकर सोशल साइट्स पर डालते हैं और फिर अपनी महान देशभक्ति का बखान करते हैं।

इस छद्म देशभक्ति से बनाए गए माहौल के पीछे सरकार चुप होकर तमाशा देखती है और बाजारू राष्ट्रवादी अपना खेल खेलते रहते हैं। इस नौटंकी के बीच ही मोदी सरकार में चाइना ने भारत में अपना निवेश तीन गुना से भी ज्यादा बढ़ा लिया है। इसी विरोध के खेले के बीच नागपुर मेट्रो के लिए चीन को 851 करोड़ का ठेका भी दे दिया जाता है।

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लेकिन राष्ट्रवाद का चोला ओढ़े सरकार की देशभक्ति पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था पर फर्क तो चाइना मेड 15 से 25 रुपये की झालरों से पड़ता है। अब खबर आ रही है कि उत्तर प्रदेश में माध्यमिक स्कूलों में लगाई जाने वाली बायोमैट्रिक मशीनें भी चाइनीज ही लगवाई जा रही हैं। यानि सरकार ने आपका डाटा चाइनीज मशीनों में डलवाने की तैयारी कर ली है।

गोंडा के स्कूल में लगी चाइनीज मशीनें- 

ये तस्वीर उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के एक सहायता प्राप्त सरकारी स्कूल की है। जिसे वहीं के एक कर्मचारी ने उपलब्ध कराया है। जिसमें स्पष्ट देखा जा रहा है बायोमैट्रिक मशीन मेड इन चाइना है। फिर भाजपाई चाइना विरोध का ढ़ोंग क्यों करते घूमते हैं।

दरअसल गोंडा के जिला विद्यालय निरीक्षक की ओर से जिले के सहायता प्राप्त सरकारी माध्यमिक स्कूलों में बायोमैट्रिक अटेंडेंस के लिए मशीनें लगवाने का ठेका जिस फर्म को दिया गया है वो सस्ती होने के कारण चाइनीज मशीनें उठा लाया लगवाने के लिए। अब साहब भी खुश और विद्यालय के प्रबंधक भी खुश।

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सोशल एक्टिविस्ट अनिल कुमार पटेल लिखते हैं कि योगी सरकार भारत के सबसे बड़े दुश्मन चीन को अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित करके देश विरोधी कार्य जाने अनजाने कर रही है। जब सरकारी संस्थान ही चाइनीज सामानों की खरीददारी को बढ़ावा दे रहे हैं तो ऐसे में आम जनता से चाइनीज वस्तुओं के बहिष्कार की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

चाइनीज सामान के बहिष्कार के पीछे छिपी हुई तुच्छ राजनीतिक मंशा- 

चीनी सामान का बहिष्कार करो, चीनी झालर का बहिष्कार करो, मिट्टी वाले दिया जलाओ, स्वदेशी अपनाओ विदेशी भगाओ आदि। पिछले कुछ सालों से इस तरह की राजनीति खूब चमकाई जा रही है। जैसे ही दीपावली नजदीक आती है तो कुछ सरकार प्रायोजित देशभक्त चीनी झालर का विरोध करने लगेंगे, होली के आते ही चीनी रंगों का विरोध करने लगेंगे, रक्षाबंधन के अवसर पर चाइना की राखियों का विरोध करने लगेंगे। राष्ट्रभक्ति ज्यादा उमड़ पड़ी तो बच्चों के खेलने के लिए बनी चाइनीज टेडी बियर का विरोध करने लगेंगे।

वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक चिंतक दिलीप मंडल लिखते हैं – 

मुझे लग रहा है, और इसके पर्याप्त संकेत मिल रहे हैं कि मोदी जी तमाम राष्ट्रीय हित चीन को बेच देंगे। पेटीएम के रास्ते चीन को भारत में लाने के अलावा नागपुर मेट्रो और कई बड़े प्रोजेक्ट चीन को सौंप चुके हैं, जिनमें गुजरात का SEZ शामिल है। उनका चीन आना-जाना भी बहुत रहा है।

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अब यूपी के तमाम सरकारी माध्यमिक स्कूलों में बायोमैट्रिक अटेंडेंस के लिए चीन की बनी मशीन लगाई जा रही है। ऐसा डाटा चीन की मशीन में क्यों डाला जा रहा है?

सरकार को एक श्वेतपत्र लाकर बताना चाहिए कि मोदी के मुख्यमंत्री रहते गुजरात में और प्रधानमंत्री रहने के दौरान चीन की कंपनियों की दख़लंदाज़ी कितनी बढ़ी है।

मोदी ख़ुद चीन में बने मोबाईल का इस्तेमाल करते हैं। चीनी सामान के बहिष्कार का उन्होंने कभी समर्थन नहीं किया है। इससे संदेह बढ़ रहा है।

मोदी सरकार में तीन गुना बढ़ गया चीन का भारत में व्यापार- 

भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामले में चीन वर्ष 2011 के 35वें स्थान और 2014 के 28वें स्थान से ऊंची छलांग लगाते हुए दिसंबर 2016में 17वें स्थान पर आ गया है। अप्रैल से दिसंबर 2014 के बीच चीन ने भारत में 0.453 बिलियन डॉलर निवेश किया था जो कि दिसंबर 2017 में बढ़कर 1.61 बिलियन डॉलर हो गया। गौरतलब है कि चीन द्वारा भारत में निवेश उसके कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का मात्र 0.5% हिस्सा है।

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मोदीराज में चाइना को दिए जा रहे हैं बड़े-बड़े ठेके- 

1,500 करोड़ रुपए की लागत से बनाई जा रही भारत की पहली नागपुर मेट्रो रोलिंग स्‍टॉक मैनुफैक्‍चरिंग यूनिट का निर्माण के लिए भारत ने चीनी कंपनी चाइनीज रेलवे स्‍टॉक कॉर्पोरेशन के साथ एमओयू साइन किया है। जिसमें प्रारम्भिक तौर पर  581 करोड़ का ठेका दे दिया गया है।

सरदार  पटेल की स्टेचू ऑफ यूनिटी के निर्माण के लिए 3000 करोड़ रुपए के इस प्रोजेक्‍ट का ठेका लार्सन एंड टब्रो (एलएनटी) नाम की कंपनी को दिया है वो सारा काम चीन से ही करवा रही है। ऑटोमोबाइल और स्मार्टफोन के क्षेत्र में भी चाइनीज कंपनियों का बोलबाला है। लेनेवो, श्योमी, अप्पो, वीवो, हायर, जिओनी आदि।

जनता बॉर्डर क्रॉस करके चीन नही जाती – 

सामाजिक कार्यकर्ता सूरज कुमार बौद्ध लिखते हैं कि आम जनता को बोला जाता है चीनी सामान का बहिष्कार करो लेकिन कोई ये बताएगा की ये सामान देश में ला कौन रहा है? असली सवाल पर चोट कब होगी। हम भारतीय तो बॉर्डर क्रॉस करके चीनी सामान खरीदने चीन नही जाते हैं। अगर सच में चीनी सामान का विरोध करना है तो असली जड़ चीनी निवेश का विरोध करना चाहिए क्योंकि पत्ते तोड़ने से पेड़ नहीं सूखते हैं। क्या चीनी निवेश का बहिष्कार भारत सरकार कर सकती है? क्या चाइनीज चिप्स और नूडल्स का विरोध करने वाले चीनी निवेश का बहिष्कार करने के लिए केंद्र सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरेंगे?

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