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बुद्धि का ठेका रखने वालों ने हमेशा से खुद अपनी चोटियां लंबी कीं और दूसरों की चोटी काटी है

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो 

मुंहनोचवा और चोटीकटवा जैसी अफवाहें फैलाकर पंडे-पुरोहित और सरकार की गोद में बैठे पोगापंथी बीच-बीच में ये जांचने की कोशिश करते हैं कि अब इस देश की जनता का मानसिक स्तर कहां तक पहुंचा है। इस भ्रम जाल को बनाकर देश के जरूरी मुद्दों को पीछे छोड़ने के लिए जातिवादी सवर्ण मीडिया उनका साथ देता है।

इस प्रयोग से वो निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि अविकसित दिमाग वाले लोग अभी भी समाज में बहुतायत में मौजूद हैं। अभी इस समाज में मुंहनोचवा और चोटीकटवा जैसे भ्रम फैलाना बहुत आसान है।

पंडे, पुरोहितों, बाबा, पोगापंथी फैलाने वाले तांत्रिकों, पाखंडियों के भ्रमजाल में पड़े मानसिक गुलामों के लिए इस समय देश की सबसे बड़ी समस्या चोटीकटवा ही है।

इसे बारे में अन्तर्राष्ट्रीय शोघकर्ता और सामाजिक चिंतक संजय श्रमण जोठे व्यंग्य के अंदाज में लिखते हैं कि-

भक्त: ऋषिवर ये चोटी और चोटिकटवा का क्या रहस्य है? बड़ा कौतूहल निर्मित हो रहा है भारतवर्ष में।

ऋषिवर:  इसके गहरे निहितार्थ हैं वत्स, चोटी और चोटिकटवा के प्रतीक को समझो तनिक। चोटी का अर्थ होता है शिखर, इंसान की चोटी सिर पर होती है अर्थात बुद्धि। बुद्धि ही मनुष्य का शिखर या चोटी है। बुद्धि का ठेका अपने पास सुरक्षित रखने वालों ने हमेशा से खुद अपनी चोटियां लंबी कीं और दूसरों की चोटी काटी है। तभी वे भारतवर्ष पर सहस्त्रों वर्ष शासन कर सके।

आज जब वैज्ञानिक तर्कबुद्धि के प्रभाव से चोटीधारियों की सत्ता कमजोर हुई जा रही है तो लोगों की बुद्धि को लँगड़ी मारने की प्राचीन तकनीक अपनाई जा रही है। यही चोटिकटवा के प्रतीक का सार है वत्स।

भक्त: थोड़ा और विस्तार कीजिये ऋषिश्रेष्ठ कुछ स्पष्ट न हुआ!

ऋषिवर: इस विषय का तत्व बहुत सूक्ष्म है वत्स, पुनः समझो। अंग्रेजी शिक्षा, विज्ञान तकनीक और वैश्वीकरण ने लोगों को शंकालु और उद्दंड बना दिया है। इससे धर्म और प्राचीन समाज व्यवस्था को खतरा हो गया है। ये उद्दंडता अगर बढ़ती गयी तो भीड़ को भेड़ की तरह खदेड़ना असंभव हो जाएगा।

भीड़ में सम्मिलित मनुष्य इंसान बनने लगेंगे। अपने व्यक्तित्व और विचार की घोषणा करने लगेंगे। तब इस धर्म का प्राचीन रथ कौन उठाएगा? कौन एक आवाज में दंगा, लूट, हत्या और आगजनी के लिए खड़ा होगा। तब कौन भक्त बनेगा? तब कौन गोमूत्र में स्वर्ण और गोबर में वज्र की खोज करेगा?

भीड़ में भेड़ की पूंछ का गुण होना चाहिए वत्स, भीड़ में मनुष्य की चोटी का गुण राष्ट्रवाद और धर्म के लिए घातक होता है। इसलिए भारत मे धर्म और राष्ट्रवाद के दीवाने नाना उपायों से भारतीय भीड़ की बुद्धिरूपी चोटी काट रहे हैं और चोटिकटवा को राष्ट्रीय विमर्श का मुद्दा बना रहे हैं।

भक्त: अहो ऋषिवर!!! राष्ट्रयज्ञ का यह कैसा अद्भुत अनुष्ठान है, और कैसी गहन इसकी व्याख्या है, अनुपम, अनुपम!!!

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