You are here

नजरिया: 2 G घोटाले के समय जैसी नैतिकता कांग्रेस ने दिखाई थी,अब वैसी नैतिकता की उम्मीद BJP से है

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो।

बात 2014 की है। लोकसभा चुनाव का शोर था और इस शोर में हल्ला 2 जी घोटाले का था। 1 लाख 76 हजार करोड़ रुपये का महाकाय घोटाला। अंकों में लिखना पड़े तो जीरो लिखने से पहले सोचना पड़े।

घोटाला इतना बड़ा भी हो सकता है, देश ये सोच कर ही अवाक था…स्तब्ध था। लिहाजा, भाजपा की आक्रामकता चरम पर पहुंची और कांग्रेस अपने बचाव में मिमिया भी नहीं पायी। कहना नहीं होगा कि जनता की अदालत ने मनमोहन सरकार को भ्रष्टतम माना।

नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने। घोटाले के ब्रम्हास्त्र से सत्ता पलट हो गया। लेकिन घोटाला हुआ भी था क्या…? अफसोस ये कि सवाल अब खड़ा हुआ। सीबीआई कोर्ट द्वारा सभी आरोपियों को बरी किये जाने के बाद। अब तमाम तर्कशास्त्री घोटाले जैसी बात से इनकार कर रहे हैं। सिर्फ अनियमितता मान रहे हैं।

सीबीआई अदालत में पेश नहीं कर पाई सबूत- 

ये बात सच के करीब लगती है और शायद इसीलिए सीबीआई इस संबंध में पर्याप्त सबूत अदालत में पेश नहीं कर पाई। फरवरी 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पेक्ट्रम आवंटन को रद्द करते हुए आवंटन प्रक्रिया पर ही सवाल उठाये थे। यानी कि अनियमितता। वास्तव में ये आंकलन से उपजा नुकसान भर था।

तत्कालीन कैग विनोद राय ने आंकलन किया कि अगर आवंटन में सामान्य निविदा प्रक्रिया अपनाई जाती तो सरकार को अधिक राजस्व मिलता। पहले आओ-पहले पाओ की नीति के कारण 1 लाख 76 हजार करोड़ का नुकसान हुआ। नुकसान के इसी आकलन को घोटाला बना दिया गया…महाघोटाला बना दिया गया, जो गलत है।

अनियमितता हुई थी जिसे घोटाला बना दिया गया- 

सच तो ये है कि उस समय की नीतियों के मुताबिक ही प्रक्रिया अपनाई गई। हालांकि इसमें कुछ गड़बड़ियां जरूर थीं, जो अनियमितता की श्रेणी में आती हैं। रही बात कम कीमत पर स्पेक्ट्रम के आवंटन की तो ये सरकार का विशेषाधिकार होता है।

और, सरकारें ये कीमत उस समय के आर्थिक हालात, संबंधित सेक्टर की स्थिति और जनता के लिए उत्पाद की कीमत को ध्यान में रखकर करती हैं। इसमें शक नहीं कि स्पेक्ट्रम की अधिक कीमत आसानी से मिल सकती थी लेकिन तब इंटरनेट की कीमत जनता की जेब पर भी भारी पड़ती।

भाजपा ने चुनाव के वक्त कैग विनोद राय की एकाउंटेसी पर अपना हुनर तो खूब दिखाया पर अब उसके जवाब देने की बारी है। कोर्ट के इस फैसले से उसकी नैतिकता ही कटघरे में आ खड़ी हुई है।

उसकी नैतिकता पर इसलिए भी सवाल खड़ा होता है क्योंकि ज्वाइंट पार्लियामेंट्री कमेटी की रिपोर्ट पर भी उसने बहस करने से इनकार कर दिया था क्योंकि इसकी रिपोर्ट में भी इसे घोटाला नहीं, बस अनियमितता ही माना गया था।

भाजपा यह कह सकती है कि मामले की जांच यूपीए सरकार ने करवाई, मुकदमा उसने करवाया, आरोप पत्र भी उसी के समय हुआ फिर वह क्या करे? लेकिन भाजपा को यह समझना और मानना होगा कि ये कांग्रेस की नैतिकता थी कि उंगली उठते ही उसने ये कदम उठा लिए और अब ऐसी ही नैतिकता की उम्मीद भाजपा से की जाती है।

( लेखक संजय कटियार, कानपुर निवासी वरिष्ठ पत्रकार हैं )  

न्यायिक सेवा में हिन्दी माध्यम के प्रतियोगियों के साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ सड़क पर उतरे छात्र

धर्म के नाम पर लुटने का सिलसिला जारी, भागवत कथा के बहाने बनाता था बंधक, फिर करता था रेप

BJP ने बेईमानी से जीता सिकंदरा उपचुनाव, EVM से लोकतंत्र खतरे में- सपा प्रदेश अध्यक्ष नरेश उत्तम पटेल

नीतीश के करीबी JDU नेता की बगावत, जो लोग घुटने नहीं टेकते, BJP उन्हे जांच एजेंसियों के जरिए फंसाती है

विधायक जिग्नेश मेवाणी का PM मोदी को चैलेंज, हार्दिक पटेल से चुनाव जीत कर दिखाएं, छोड़ दूंगा राजनीति

मोदी के मंत्री बोले-हम संविधान बदलने आए हैं, लोगों की पहचान धर्म और जाति के आधार पर होनी चाहिए

 

Related posts

Share
Share