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देश तो ‘अर्धगुलामी’ के ‘प्रजा-भाव’ में जी ही रहा है, कहां गए ‘हक’ छीनकर लेने वाले नेता,जिंदा तो हैं ना !

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

देश में भीड़तंत्र किसी की भी हत्या कर दे रहा है. हम शांत हैं. आरक्षण खत्म किया जा रहा है हम शांत हैं. ओबीसी-एससी-एसटी के लोगों के साथ शैक्षणिक तौर पर साजिश हो रही है. हमें पता भी लग रहा है लेकिन हम शांत हैं. हम शांत हैं क्योंकि हम अर्धगुलामी के भाव में जीकर खुद को प्रजा और प्रधानमंत्री को सम्राट समझ चुके हैं.

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ऐसे हालात में ना प्रजा सोशल मीडिया के दम पर जान तो सबकुछ रही है लेकिन खामोश है. लेकिन सवाल वही है आखिर आपके सुख-दुख की बात करने वाले विपक्षी दल कहां है ? वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शेष अपनी फेसबुक वॉल पर पूछते हैं कि क्या राजनीतिक दल मर गए हैं ?

पूछना जायज भी है सामाजिक न्याय की बात करने वाले दलितों-पिछड़ों, अल्पसंख्यकों, आदिवासियों के हक की बात करने वाले,आरक्षण की बात करने वाले नेता कहां हैं. जो बीजेपी में हैं उनकी तो खैर कोई हिम्मत नहीं लेकिन जो अपने दलो के अध्यक्ष हैं और इसी नाम पर राजनीति करते हैं उनको फेसबुक पर या ट्विटर पर विरोध जताने भर से काम चलने वाला नहीं है.

पढ़िए अरविंद शेष के लोकतांत्रिक विचार- 

जिस देश की ज्यादातर आबादी ‘प्रजा-भाव’ यानी अर्धगुलामी के माइंडसेट में जीती है, वहां ‘राजतंत्र’ का आभामंडल परोस कर लोकतंत्र को खत्म करना आसान है..!

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RSS ने औसत हिंदू समझदार को भांप लिया है- 

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आरएसएस-भाजपा और खुद मोदी के सारे कार्यक्रम का आयोजन अगर भयावह और आक्रामक राजतंत्रीय चकाचौंध के साए में होते हैं तो इसकी वजह यही है। आरएसएस के कोर-ग्रुप ने इस समाज की औसत हिंदू समझदारी के स्तर का अध्ययन ठीक से किया है और उसी के मुताबिक अपनी राजनीतिक रणनीति तय की है।

गाय या धार्मिक आस्था के नाम पर होने वाले सारे हड़बोंग की जानलेवा मार उन्हीं पर पड़ने वाली है, जो इसमें सबसे ज्यादा बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते या समर्थन करते दिखते हैं। लेकिन फिर भी आरएसएस-भाजपा की राह में कोई बड़ा रोड़ा नहीं है, जिसकी वह फिक्र करे।

विपक्षी पार्टियां क्या मर गई हैं- 

सवाल वही है ऐसा क्यों हुआ है ? आरएसएस-भाजपा या उसकी एजेंट पार्टियों को अगर छोड़ भी दें तो बाकी तमाम दलों की हैसियत क्या इतनी भी नहीं बची कि कुल एक लाख लोगों को लेकर सड़क पर सिर्फ दस दिनों के लिए बैठ जाएं? केवल एक लाख का जमावड़ा फिलहाल किसी तानाशाह को भी कुछ देर सोचने की हालत में डाल सकता है। लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि दिखावे के विरोधी राजनीतिक स्वर सिर्फ अपनी हाजिरी दर्ज कर रहे हैं।

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बाकी नोटबंदी हो या केंद्रीय सरकारी नौकरियों में 89% की कटौती हो या फिर वे तमाम राजनीतिक-आर्थिक फैसले, जिनसे साधारण लोगों की कमर टूट जानी है, पिछले तीन दशकों में किसी तरह बढ़े हुए कदम पीछे लौट जाने हैं, आरक्षण जैसी न्याय की व्यवस्था को सवर्ण जातियों के हक में दे दिया जाना है, एक तरह से मनु-स्मृतीय समाज की रचना होनी है।  इन सब पर किसी तरह का ठोस प्रतिरोध सामने जमीन पर नहीं है, किसी भी राजनीतिक पार्टी की ओर से।

कहां चली गईं विपक्ष की सारी राजनीतिक पार्टियां..! क्या वे मर गई हैं..!!! या फिर वे सब एक ही सत्ता के सिरे से भारत की आम साधारण जनता से खेल रही हैं..!!!

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