जेएनयू: क्रिकेट में भी ‘हिस्सेदारी’ की मांग, छात्रों ने कहा सवर्णों के बस का नहीं है मेहनत का खेल

नई दिल्ली। सोबरन कबीर यादव।

कल पाकिस्तान के हाथों चैम्पियंस ट्रॉफी के फाइनल में बुरी तरह हारने के बाद सवर्ण समुदाय के खिलाड़ियों से भरी भारतीय टीम की योग्यता पर सवाल खड़े हो गए हैं.

जेएनयू के छात्र संगठन यूनाइटेड ओबीसी फोरम के नेताओं मुलायम सिंह, विशम्भर प्रजापति , कविता पटेल, सौरभ पटेल, अनूप कुमार, अमित कुमार और दिलीप यादव ने संयुक्त वक्तव्य जारी करते हुए भारतीय क्रिकेट टीम में दलितों पिछड़ों और आदिवासियों को रिजर्वेशन देने की मांग की. फोरम के नेता मुलायम सिंह ने कहा है कि क्रिकेट मेहनत का खेल है और मेहनत करना सवर्ण खिलाड़ियों के बस का नहीं है.

कविता पटेल ने भारतीय क्रिकेट टीम में सवर्ण खिलाड़ियों की भरमार पर सवाल उठाते हुए कहा कि ‘ जब 90 फीसदी से अधिक जन्मजात योग्यता वाले सवर्ण खिलाड़ी क्रिकेट टीम में हैं तो फिर भारतीय टीम पाकिस्तान से मैच कैसे हार गई.

विशम्भर प्रजापति ने कहा कि जो भी खेल मेहनत या ताकत का है वहां सवर्ण पिछड़ा जाते हैं. जैसे बॉक्सिंग मेहनत और ताकत का खेल है तो वहां एक आदिवासी एम सी मेरीकॉम ने नाम रोशन किया या फिर इस खेल में मेहनत जाट जाति का ही दबदबा है. इसी तरह से कबड्डी मेहनत और ताकत का खेल है तो यहां भी भारतीय समाज की अहीर, जाट, गूजर, पटेल और कई आदिवासी उपजातियों का दबदबा है.

कुश्ती में भी अहीर, जाट, गूजर, पटेल मराठा आदि जातियों समेत और अन्य खेतीहर जातियों का ही दबदबा है. भारत मेहनत वाले खेल में अच्छा कर रहा है. जैसे कबड्डी में भारत विश्व विजेता है. यहां तक कि ह़ॉकी भी मेहनत का खेल है औऱ इस मेहनत के खेल में भी जाट और मेहनतकश सिख समुदाय का दबदबा है. हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद भी मेहनतकश कुशवाहा जाति से ही थे और उन्होंने अपनी हॉकी से दुनिया में भारत का नाम रोशन किया.

फोरम की तरफ से बोलते हुए यूनाइटेड ओबीसी फोरम गुजरात इकाई के अध्यक्ष अमित कुमार ने कहा कि भारत में जितने भी मेहनत के खेल हैं वहां सवर्णों का दबदबा नहीं हैं. इस मामले में क्रिकेट ही अपवाद है. यहां लगभग 90 फीसदी सवर्णों का ही दबदबा है.

इसी तरह फोरम के नेता सौरभ पटेल ने भारतीय टीम में खिलाड़ियों के चयन में घोर जातिवाद होने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि भारतीय समाज के अन्य क्षेत्रों की तरह भारतीय क्रिकेट टीम में भी खिलाड़ियों के चयन में घोर जातिवाद होता है. दलित , पिछड़े और आदिवासी समुदाय के खिलाड़ियों को चयन के दौरान नजरअंदाज किया जाता है.

दक्षिण अफ्रीका की क्रिकेट टीम में अश्वेत खिलाड़ियों को मिलता है रिजर्वेशन- 

आपको बता दें कि क्रिकेट टीम में वंचित समूहों को भागीदारी देने की मांग कोई नई मांग नहीं हैं. भारत में ये मांग अभी उठ रही है पर दक्षिण अफ्रीका की क्रिकेट ने अपने यहां अश्वेत खिलाड़ियों को भागीदारी देने की व्यवस्था भी कर दी है. दक्षिण अफ्रीका की जनता के महानायक नेल्शन मंडेला के अथक प्रयासों से वहां क्रिकेट टाीम में अश्वेत खिलाड़ियों को रिजर्वेशन दिया गया. दुर्भाग्य से भारत में इस तरह का कोई राजनीतिक प्रयास अभी तक नहीं किया गया है. पर भारत में भी अब क्षेत्रों में आबादी के अनुपात में भागीदारी की मांग जोर पकड़ रही है. क्रिकेट भी इससे अछूता नहीं है.

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