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‘हम तो पंजाब से पीड़ितों को राशन देने गए थे, ऐसा लगा जैसे बीजेपी दलितों से बदला निकाल रही हो’

नई दिल्ली। नेशनल जनमत ब्यूरो

पंजाब के शेरपुर निवासी सामाजिक कार्यकर्ता दर्शन सिंह बाजवा अपने साथियों के साथ सहारनपुर जातीय दंगों के पीड़तों से मिलने और उनके राशन पहुंचाने 11 जून को सहारनपुर पहुंचे. इस दौरान बाजवा और उनकी टीम के साथ ऐसा कुछ घटा कि लौटते हुए उनकी टीम का अनुभव था कि बीजेेपी दलितों से उन्हें वोट ना देने का बदला निकाल रही है.

पढ़िए दर्शन की बाजवा की जुबानी शब्बीपुर की पूरी कहानी- 

योगी आदित्यनाथ की सरकार के दौरान मुसलमानों और दलितों को निशाना बनाया जा रहा है. 5 मई को सहारनपुर में राजपूत समुदाय द्वारा महाराणा प्रताप की जयंती के दौरान निकाली गई शोभायात्रा के समय शबीरपुर गांव में हुए टकराव के कारण राजपूतों ने दलितों के घरों पर हमला किया। इस हमले में 56 दलितों के घर जलाए गए.

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कौन-कौन शामिल था टीम में- 

कल 11 जून को पंजाब से एक ग्रुप दलितों की मदद करने के लिए सहारनपुर गया. जिसमें दर्शन सिंह बाजवा, कुलवंत सिंह टिब्बा, तनोज टिब्बा, हरविंदर सिंह सरां, करमजीत सिंह हरीगढ़,  गुरजंट सिंह कौहरियां,  जिला बरनाला से एकम सिंह छीनीवाल और उनके दो बजुर्ग साथी, चंडीगढ़ से बलवंत सिंह डायरेक्टर प्लानिंग, सुनील बदधन और उनके साथी आदि शामिल थे.

हम तो राहत सामग्री लेकर पहुंचे थे लेकिन….

पीड़ित परिवारों की मदद के लिए हमारे पास हमारे साथियों के द्वारा इकट्ठा किए हुए नए पुराने कपड़े, आटा, चावल, गेहूं, दाल, चीनी, चाय पती, खाने का तेल आदि वस्तुओं का एक टेंपो था। नजदीकी कस्बे बड़गांव के पुलिस प्रशासन ने इसे वितरित करने की हमें इजाजत नहीं दी। पुलिस का रवैया भी ठीक नहीं था. .

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किसी तरह पहुंचे शब्बीरपुर-  

शबीरपुर गांव में धारा 144 लागू है. हमारी भी जिद थी कि हमें उस गांव में जरूर जाना है, और पीड़ित लोगों से मिलना है. हमारे साथ कई साथी सरकारी मुलाजिम थे. उनका नौकरी का मामला था. इसलिए पीड़ित परिवारों से खुद मिलने के लिए रिस्क लेकर मैं और मेरा साथी मोती लाल छाछिया ग्राम प्रधान के भतीजे की मोटरसाइकिल पर बैठकर गांव शबीरपुर गए.

बाकी साथियों को बड़गांव में ही रहने दिया। हम दोनों पीड़ित परिवारों से मिले। उनका दुख सुना। जले हुए घर देखे। युवाओं, बजुर्गों, महिलाओं और बच्चों को मिले। सब ने “जय भीम” कहकर हमारा सवागत किया। उनसे मिल कर पता चला कि प्रशासन की ओर से अभी तक उन्हें कोई मदद नहीं दी गई है. उलटा उन्हें धमकाया जा रहा है. कई व्यक्ति जेल में बंद हैं.

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पुलिस का रवैया ऐसा था जैसे हम कोई अपराधी हों- 

फिर हमने फोन कर के हमारे साथी कुलवंत सिंह टिब्बा को बुला लिया ताकि सारी बातें कैमरे में रिकॉर्ड की जा सकें. अभी वो दो लोग पहुंचे ही थे कि सीआईडी का एक सिपाही पहुंच गया. कुलवंत सिंह टिब्बा को हमने इशारा कर दिया और वो वहां से चले गए. पुलिस वाले ने इन साथियों के बारे में पूछताछ की लेकिन हमने उन्हें पहचानने से इंकार कर दिया. इतनी देर में बर्दी में कुछ पुलिस मुलाजिम आ गए. मौका देखकर हमने वहां से निकलना ही बेहतर समझा और हम खिसक गए. इतनी देर में हम पीड़ित लोगों से काफी बातचीत कर चुके थे.

दूसरे गांव में उतारनी पड़ी राहत सामग्री- 

जाते जाते हमने वहां के कुछ साथियों को पास के ही गांव चंदपुर में आने के लिए कह दिया ताकि उन्हें सहायता का सामान दिया जा सके. हमारे वहां से निकलते ही पुलिस आ गई. बड़गांव जहां हमारे साथी खड़े थे वहां पर भी पुलिस जमा हो रही थी. हमारे साथियों ने अपना बचाव किया और वो पुलिस को आता देखकर वहां से पंजाब की ओर चल दिए. हमने भी हालात देखकर वहां से निकलना ठीक समझा. हमारे चलने से पहले पीड़ित परिवारों के कुछ साथी पहुंच चुके थे. हमने पास के गांव चंदपुर में जाकर अपने एक जानकार साथी महेंद्र के घर में सारा सामान उतरवा दिया.

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ऐसा लगा जैसे बीजेपी बदला निकाल रही हो- 

हमें महसूस हुआ कि भले ही शब्बीरपुर के हमारे कुछ भाई इस समय मुसीबत में हैं लेकिन उनकी एकता गजब की है. आस पड़ोस के गांवों के साथी उनके साथ हैं.  वापिस आते समय हमारे चेहरों पर खुशी थी कि सरकार चाहे दलितों द्वारा भाजपा को वोट ना देने का बदला ले रही है या वो मनु स्मृति लागू करने के लिए शूद्र और अति शूद्र लोगों को दबा रही है लेकिन हमारे लोग अपने साहस से आरएसएस और सरकार की नीतियों का मुकाबला कर रहे हैं.

इस बात की भी खुशी थी कि हम ने अपने पीड़ित भाईयों की मदद के लिए कुछ किया।

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