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आखिर दलित-पिछड़ा बाहुल्य इलाकों से ही मायावी बाबा धर्म का काला धंधा क्यों शुरू करते हैं ?

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो। 

डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को सीबीआई अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद देश में अफरा-तफरी का महौल है। बाबा राम रहीम के उन्मादी समर्थकों द्वारा फैलाई गई हिंसा में अभी तक 32 लोगों की मौत की खबरें आ रहीं हैं। पंजाब-हरियाणा में आपाकाल जैसे हालात हैं। हिंसा के चलते सैकड़ों रेलगाड़ियों को रद्द करना पड़ा है। वहीं पंजाब हरियाणा के कई शहरों में कर्फ्यू लगा दिया गया है।

बाबाओं की अंधभक्ति को अन्तर्राष्ट्रीय शोधार्थी और समाज विज्ञानी संजय श्रमन जोठे ने कड़ी आलोचना की है। उनके मुताबिक बाबा लोग उसी क्षेत्र में रहते हैं जहां पर दलित आबादी ज्यादा होती है। उन्होंने लिखा-

पंजाब हरियाणा का दुर्भाग्य पुराना है गुरुभक्ति और सन्तभक्ति के नाम पर जिस तरह का भक्तिभाव फैलाया गया है वो एक कैंसर बन चुका है। जितने भी धूर्त बाबा हैं वे या तो दलित इलाके से शुरू करते हैं या फिर कहीं और शुरू करके इस इलाके में बस जाते हैं। इस इलाके में दलितों शूद्रों का बहुमत है। उनमें धर्मभीरुता और अंधविश्वास बनाये रखने के लिए सन्त साहित्य और भक्तिकाव्य का खूब ढोल बजाया जाता है।

दलितों के अपने सन्तों का साहित्य उनके खिलाफ इस्तेमाल हो रहा है। गुरुपूर्णिमा आते ही कबीर की साखियों से गुरु महात्म्य छानकर पिलाया जाने लगता है। रविदास और कबीर द्वारा की गई राम और हरि की प्रशंसा और भक्ति अब दलितों के खिलाफ इस्तेमाल हो रही है। उन्ही के पद गाकर उन्हें कावड़ यात्री बनाया जा रहा है।

दूसरी तरफ बुध्द के नाम पर ध्यान समाधि मोक्ष की चर्चा चलती है। बुध्द के साथ भी परलोक और पुनर्जन्म जोड़ दिए गए हैं। खुद दलित समुदाय के अधिकांश व्यक्ति बुध्द को वेदांती पंडित की तरह परलोक के प्रस्तोता की तरह ही देखते हैं।

आप गौर से देखियेगा तो समझ आएगा कि कोई भी सन्त, भक्त, गुरु, बुद्ध, अवतार या उनका कोई भी ग्रन्थ दलितों के हित का नहीं बचा है। हर ऐतिहासिक नायक में वेदांत का जहर घोला जा चुका है।

इसीलिए अंतिम रूप से दलितों बहुजनों स्त्रियों को हर धर्मगुरु, सन्त, भक्त, अवतार या बुद्ध की बजाय संविधान, लोकतंत्र, वैज्ञानिक चेतना, मौलिक अधिकार आदि पर फोकस करना चाहिए।

आप जिस भी धर्म, शास्त्र, या परंपरा से उम्मीद रखेंगे उसी में आसाराम, ओशो, रामपाल, रामवृक्ष और राम रहीम पैदा हो जाएंगे। फिर भी अंतिम रूप से लौटकर आपको कानून, संविधान, लोकतंत्र और वैज्ञानिक चेतना का ही आश्रय लेना होगा। जैसा कि अभी करना पड़ रहा है।
इतनी लंबी यात्रा क्यों करनी?

अवतारों, तीर्थंकरों, बुद्धों, सन्तों, योगियों, बाबाओं, भक्तों को हटाकर सीधे संविधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों पर आइये। मोक्ष और भक्ति की बकवास को निकाल बाहर कीजिये। इस जमीन पर जो जिंदगी आपको मिली है उसे सब तरह के धर्मधूर्त लूट लेना चाहते हैं। अंतिम रूप से उनसे भी बचना होगा – संविधानिक अधिकारों और वैज्ञानिक चेतना के द्वारा।

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