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भूख से तड़पकर मरना कितना कठिन होता होगा… सरकारी तंत्र पर सवाल उठाती धर्मेन्द्र पटेल की कविता

नई दिल्ली, नेशनल जनमत ब्यूरो।

सरकारी सिस्टम के नकारेपन को लेकर जनता में आक्रोश है। सभी अपने-अपने ढ़ंग से इस गुस्से को व्यक्त भी करते हैं। कोई बोलकर, कोई लिखकर कोई कहानी के माध्यम से तो कोई कविता से।

झारखंड के बाद उत्तर प्रदेश के रामराज में भी भूख से तड़पकर मरने की खबरें आईं। ऐसी ही हृदय विदारक घटनाओं पर शिक्षक धर्मेन्द्र पटेल ने अपनी लेखनी चलाई है।

भूख से तड़पकर मरना
कितना कठिन होता होगा

जान निकलने के पहले
कितना रुदन किया होगा

शरीर का एक एक अंग ।
कितने बहें होंगे आंसू

कितना छटपटाये होंगे हाथ
एक अदद सूखी रोटी के लिये ।

भूखे आत्मबल ने
कितनी की होगी कोशिश

पड़ोसी के घर
एक कटोरी भात के खातिर ।

मरते वक्त याद आये होंगे
दुनिया भर में झंडे गाड़ने वाले
महानायक

जो छलकाते रहे जाम
निजाम हैदराबाद की
विलासिता भरी कोठी में ।

नहीं छलका एक बूंद भी आंसू
उनका तेरी दर्दनाक मौत पर ।

सत्ता कितनी निष्ठुर होती जा रही है
खुद चलाती है मूल्यों के बगेचे में कुल्हाड़ी

इंसानियत की रोज करती है हत्या
कत्लखाने सी क्यों नजर आ रही है सत्ता

क्या यह देश
वोट , चोट और नोट से ही चलेगा ?

क्या कल्याणकारी राज्य की संकल्पना
की हत्या कर डाल दी जायेगी मिट्टी ।

मत भूलना वहीं से उगेंगे
फिर कुछ बेखौफ़ पौधे ।

( रचनाकार धर्मेन्द्र सिंह पटेल पेशे से शिक्षक हैं, मूलत: उत्तर प्रदेश बुंदेलखंड क्षेत्र के बांदा के रहने वाले हैं )

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